सुन्दर रज तिलक भाल, बाँकी भृकुटी बिसाल, रतनारे नैंन नेह भरे दरस पाऊँ।

वारौं छवि चंद वदन, सोभा सुख सिंधु सदन, नासावर कीर कोटि काम को लजाऊँ॥

अधर अरुन दसन पाँति, कुंदकलिका बिसाँति, कमल कोस आनन दृग मधुप लै बसाऊँ॥

मधुर वचन मंद हास, होत चाँदनी प्रकास, जै जै श्रीहरिदास रसिक भगवत गुन गाऊँ॥

कंबु कंठ मंजु दाम, गौर अंग छवि सुधाम, कुंदन तैं सरस मृदुल मोहन मन-भायौ।

नाल सहित कंज पान देत सदा अभय दान, तजिकैं अभिमान साह अकबर सिर नायौ॥

चरन – कमल कामधेनु, सकल कामना सुदेनु, दरसैं दृग होत चैन आपदा भगायौ।

करवा गूदरा पास, वृन्दावन करैं बास, जै जै श्री हरिदास रसिक भगवत अपनायौ॥

कुंजबिहारी एक आस, और सकल तजि निरास, असन बसन तें उदास बाँके ब्रतधारी।

गान दयागुन निधान, रसिक मुकुट्मनि-प्रधान, राग-भोग बखत जानि तोषत पिय प्यारी॥

तिमिर – हरन कौं दिनेस, ताप – हरन कौं निसेस, पाप – दहन पावकेस गुरुत्ता मुखचारी।

निधिवन आसीन नित्त, वर बिहार सरस चित्त, जै जै श्रीहरिदास रसिक भगवत बलिहारी॥

कूंची नित्यविहार की; श्रीहरिदासी हाथ।

सेवत साधक सिद्ध सब, जाँचत नावत माथ॥

सुजस सदा हरिदास कौ, श्रवन होइ कै गान।

ताकौं प्यारी लालजू, बिहँसि देहिं सिर पान॥

श्रीवृन्दावन दंपति, जो चाहै रस-रीति।

श्री स्वामी हरिदासके, चरनन सौं करि प्रीति॥

 

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