माध्व सम्प्रदाय- ब्रह्म सम्प्रदाय(brahma sampradaya) के बारे में जाने - हमारी विरासत
माध्व सम्प्रदाय

माध्व सम्प्रदाय

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Description

भगवान भक्ति को ही मोक्ष का सर्वोपरि साधन मानने वाले रामानुज-सम्प्रदाय के पश्चात एक तीसरा सम्प्रदाय निकला जिसे द्वैत सम्प्रदाय-माध्व सम्प्रदायब्रह्म सम्प्रदाय(brahma sampradaya) कहते हैं। ब्रह्मसम्प्रदाय (प्रमुख आचार्य-आनन्दतीर्थ (मध्व), मत-द्वैत); इस के प्रवर्तक थे संत माधवाचार्य। संत राम सखे इन के अनुयायी थे। माधवाचार्य एक महान संत और समाज सुधारक थे। इन्होंने ब्रह्म सूत्र और दस उपनिषदों की व्याख्या लिखी। संप्रदाय को ब्रह्म संप्रदाय के रूप में भी जाना जाता है, आध्यात्मिक गुरु (गुरु) के उत्तराधिकार में अपने पारंपरिक मूल का उल्लेख करते हुए ब्रह्मा से उत्पन्न हुआ कहा है।

माधव परंपरा के अनुसार, रचनाकार सृष्टि से श्रेष्ठ है, और इसलिए मोक्ष केवल विष्णु की कृपा से मिलता है, प्रयास से नहीं। इसके अलावा मध्यकालीन उत्तरभारत में ब्रह्म(माध्व) संप्रदाय के अंतर्गत ब्रह्ममाध्वगौड़ेश्वर(गौड़ीय) संप्रदाय जिसके प्रवर्तक आचार्य श्रीमन्महाप्रभु चैतन्यदेव हुए

श्री मध्वाचार्य जी महाराज 12 वीं शताव्दी के महान सन्त हुए थे ये ब्रह्म सम्प्रदाय के प्रवर्तक माने जाते है तथा वैष्णवों के चारों सम्प्रदायों में से प्रधान सम्प्रदाय है इनका जन्म दक्षिण भारत में तुलुब देश के वेलीग्राम में मधिजी भट्ट (श्री नारायण जी भट्ट) नाम तुलु ब्राह्मण के घर संवत् 1295 माघ शुल्क सप्तमी को हुआ था इनकी माता का नाम बेदवती था, इनके बचपन का नाम वासुदेव (भीम) था इनके लिए खिा गया कि ये पवन देवता की आज्ञा से धर्मपालन के लिए संसार में आए थे आपने बचपन में अनन्तेस्वर मठ में वेदों का अध्ययन किया व नौ वर्ष की आयु में सन्यास ग्रहन कर लिया । प्रारम्भ में ये जगद् गुरू शंकराचार्य जी के शिष्य बन गए व इनका मध्व नाम दिया गया ।

इन्होंने छोटी सी उम्र में ‘गीता भाष्य‘ का निर्माण कर बद्रिकाश्रम में वेदव्यास जी को अर्पण किया जिससे खुश होकर वेदव्यास जी ने इनको राम व शालिग्राम की मूर्तियां दी जिनको इन्होंने सुबह्मण्य, उदीपी और मध्यतल के तीनों स्थानों में स्थापना की ।

गुरू आज्ञानुसार :-

जगद्गुरू शंकराचार्य ने अपने चारों शिष्यों को मायावाद-सप्तक्त अद्वैत सिद्वान्त शिक्षा सूत्र रहित एक दण्ड देकर सन्यास का उपदेश व धर्म प्रचार की आबश्य्कता बतलाकर विदा किया । उपरोक्त चारों शिष्यों में मधु नामक एक षिष्य था । गुरू आज्ञानुसार जब वह रात्रि में सोया तब भगवान श्री राम ने स्वप्न में दर्षन देकर उसे अपने कतग्वय का बोध कराते हुए कहा ‘‘माधो तुम तो मेरे सेवक अनुमार के वंशावतार हो व वैष्णव धर्मान्तर्गत सेव्य सेवक स्वरूप भक्ति के प्रचारार्थ भूतल पर तुम्हारा अवतार हुआ है अतः इस शंकर के मायावाद का त्याग कर तुम्हें भक्ति के सिद्वान्तों का प्रचार करना चाहिए । प्रभु की आज्ञा षिषेधार्य कर मधु ने भक्ति मग के प्रचार की प्रतिज्ञा कर शंकरचार्य के शिष्योंत्व का त्याग कर दिया व स्वयं आचार्य बन भक्तिमार्ग के प्रचार में लग गए ।

सिद्वान्त :-

मध्वाचार्य जी ने अपने सम्प्रदाय की गुरू परम्परा में लोक पितामह ब्रह्माजी को गुरू मान कर अपने सिद्वान्त को ‘‘द्वैताद्वेत‘‘ नाम से प्रख्यात किया । भक्ति के महा प्रचारक होने के कारण वे वैष्ण्प धर्म के सामान्य आचार्य माने जाने लगे उनके सम्प्रदाय द्वारा भारत में भक्ति का अधिक प्रचार हुआ । इस सम्प्रदाय को मानने वाले एक विष्णु भगवान को ही परमेश्वर जगत सष्टा व स्वतंत्र मानते है और विष्णु को स्वतंत्र परमेश्वर और जीव को परतंत्र सेवक और जगत को उसकी रचना मानते है इसलिए यह मत द्वैतवादी प्रसिद्ध हुआ । ये अन्त्यज जातियों को उपदेष देते थे परन्तु सन्यास का अधिकार ब्राह्मण का ही मानते थे ।

शास्त्र रचना:-

आपने प्रारम्भ में ‘ब्रह्म सूत्र‘ व भागवत गीता पर भाष्य लिखा व सभी प्रमुख उपनिषदों में ‘‘द्वैव वाद‘ का ही प्रतिपादन किया तथा अपने जीवन काल में लगभग 37 ग्रन्थों की रचना की जिनमें ‘प्रस्थानन्नयी‘ पर भाष्य, सूत्र भाष्य, ऋग भाष्य, इषोपनिषद भाष्य, अनुवेन्दान्त, रस प्रकरण आदि प्रमुख है।

शिष्य  :-

मध्वाचार्य जी ने कई शिष्य बनाय जिनमें 1. सत्यतीर्थ जी, 2. श्री शोभन जी भट्ट 3. श्री त्रिविक्रम जी 4. श्री रामभ्रद जी, 5. विष्णुतीर्थ, 6. श्री गोविन्द जी शास्त्री, 7. पद्मनाभाचार्य जी, 8. जयतीर्थाचार्य, 9. व्यासराज स्वामी, 10. श्री रामाचार्य जी 11. श्री राघवेन्द्र स्वामी, 12. श्री विदेह तीर्थ जी आदि कई शिष्य ने वैष्णव धर्म का प्रचार किया ।

द्वारे:-

श्री मध्याचार्य जी सम्प्रदाय के वर्तमान द्वारा एक पश्चिम बंगाल में नदिया शान्तिपुर के नित्यानंदी द्वारे में श्री माधवेन्द्र पुरी जी स्थित है व दुसरा वृन्दावन (मथुरा) के श्यामानन्दी द्वार में हृदयचेत्यन जी स्थित है ।

हरिदासा आंदोलन:-

कर्नाटक के हरिदास के भक्ति आंदोलन में माधव की धार्मिक सोच की अभिव्यक्ति थी। माधव द्वारा शुरू किए गए हरिदास आंदोलन का देश के विभिन्न हिस्सों में लोगों पर गहरा प्रभाव पड़ा है। हरिदास ज्यादातर माधव थे और लगभग विशेष रूप से ब्राह्मण समुदाय के थे।

अन्य आंदोलन:-

बंगाल वैष्णववाद के चैतन्य स्कूल पर द्वैत वेदांत विचारों का प्रभाव सबसे अधिक रहा है, जिनके भक्तों ने इंटरनेशनल सोसाइटी फॉर कृष्णा कॉन्शसनेस (इस्कॉन)  International Society for Krishna Consciousness (ISKCON) शुरू किया – जिसे हरे कृष्ण आंदोलन के रूप में जाना जाता है। और असम में भी। गुजरात वैष्णव संस्कृति भी माधव दर्शन से प्रभावित है।

संस्था :-

संस्थान मध्वाचार्य ने विभिन्न आचार्यों के विभिन्न संप्रदायों को हराकर कई मठों की स्थापना की। माधव के अनुयायी मुख्य रूप से तीन अलग-अलग समूहों में हैं, शिवल्ली ब्राह्मण, देशस्थ ब्राह्मण और गौड़ सारस्वत ब्राह्मण। इस प्रकार माधव-वैष्णव आस्था के चौबीस अलग-अलग संस्थान हैं। 17 वीं शताब्दी की पहली तिमाही में, विद्यादिशा तीर्थ (उत्तराधिकारी मठ का 16 वां मंडप) ने बिहार के गवाल ब्राह्मणों को माधव गुना में परिवर्तित कर दिया, जो अभी भी उत्तराधिकारी मठ के प्रति निष्ठा रखते हैं।

उडुपी(udupi ) का अष्ट मठ:-

माधवाचार्य के प्रत्यक्ष शिष्यों द्वारा स्थापित उडुपी के अष्ट मठ है। उडुपी का तुलु अष्ट मठ माधवाचार्य द्वारा स्थापित आठ मठों या हिंदू मठों का एक समूह है, जो हिंदू विचार के द्वैत विद्यालय के पूर्वदाता हैं। आठ मठों में से प्रत्येक के लिए, माधवाचार्य ने अपने प्रत्यक्ष शिष्यों में से एक को पहला स्वामी नियुक्त किया।

संप्रदाय आचार्यों की सूची, स्वयं कृष्ण भगवान से शुरू हुए :

  1. कृष्णा
  2. ब्रह्मा
  3. नारद मुनि
  4. व्यासदेवा
  5. मध्वाचार्य
  6. पद्मनाभ तीर्थ
  7. नरहरि तीर्थ
  8. माधव तीर्थ
  9. अक्षोभ्य तीर्थ
  10. जया तीर्थ
  11. झानासिंधु
  12. दयानिधि
  13. विद्यानिधि
  14. राजेंद्र
  15. जयधर्म
  16. पुरुसोत्तामा
  17. ब्रह्मन्य तीर्थ
  18. व्यास तीर्थ
  19. लक्ष्मीपति तीर्थ
  20. माधवेन्द्र पुरी
  21. a) ईश्वर पुरी, b) नित्यानंद प्रभु, c) अद्वैत आचार्य
  22. श्री चैतन्य महाप्रभु (गौड़ीय वैष्णववाद यहाँ से शुरू होता है) a) रूपा गोस्वामी, b) स्वरूपा दामोदर गोस्वामी, c) सनातन गोस्वामी
  23. a) रघुनाथ दास गोस्वामी, b) जीवा गोस्वामी
  24. कृष्णदासा कविराज गोस्वामी
  25. नरोत्तम दास ठाकुरा
  26. विश्वनाथ वक्रवती ठाकुर
  27. a) बलदेव विद्याभूषण, b) जगन्नाथ दास बाबाजी
  28. भक्तिविनोद ठकुरा
  29. गौरकिसोर दास बाबाजी
  30. भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठकुरा
  31. सी। भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (A.C. Bhaktivedanta Swami Prabhupada)

ज्ञान :-

मध्वाचार्य ने जीवन की वास्तविकता समझते हुए उसे व्यावहारिक और रूचिपूर्ण बनाने का आधार अपने द्वैतवाद में प्रस्तुत किया। इनके अनुसार दो पदार्थ या तत्व प्रमुख हैं, जो स्वतंत्र और अस्वतन्त्र हैं। स्वतन्त्र तत्व परमात्मा है, जो विष्णु नाम से प्रसिद्ध है और जो सगुण तथा सविशेष है। अस्वतन्त्र तत्व जीवात्मा है। ये दोनों तत्व नित्य और अनादि हैं, जिनमें स्वाभाविक भेद है। यह भेद पाँच प्रकार का हैं, जिसे शास्त्रीय भाषा में प्रपंच कहा जाता है।

  • ईश्वर अनादि और सत्य हैं, भ्रान्ति-कल्पित नहीं।
  • ईश्वर जीव और जड़ पदार्थों से भिन्न है।
  • जीव और जड़ पदार्थ अन्य जीवों से भिन्न है एवं एक जड़ पदार्थ दूसरे पदार्थों से भिन्न है।
  • जब तक यह तात्विक भेद बोध उदित नहीं होता, तब तक मुक्ति संभव नहीं।

मध्वाचार्य के सिद्धान्त की रूपरेखा निम्नाँकित श्लोकों में व्यक्त की गई है- श्री मन्मध्वमते हरि: परितर: सत्यं जगत् तत्वतो,
भेदो जीवगणा हरेरनुचरा नीचोच्च भावं गता।1।
मुक्तिर्नैव सुखानुभूतिरमला भक्तिश्च तत्साधने,
ह्यक्षादि त्रितचं प्रमाण ऽ खिलाम्नावैक वेद्मो हरि:॥2॥

  1. विष्णु सर्वोच्च तत्व है।
  2. जगत सत्य है।
  3. ब्रह्म और जीव का भेद वास्तविक है।
  4. जीव ईश्वराधीन है।
  5. जीवों में तारतम्य है।
  6. आत्मा के आन्तरिक सुखों की अनुभूति ही मुक्ति है।
  7. शुद्ध और निर्मल भक्ति ही मोक्ष का साधन है।
  8. प्रत्यक्ष, अनुमान और शब्द तीन प्रमाण हैं।
  9. वेदों द्वारा ही हरि जाने जा सकते हैं।
नोट : अगर आप कुछ और जानते है तो सुझाव और संशोधन आमंत्रित है। please inbox us.

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