संप्रदाय

संप्रदाय का अनुवाद 'परंपरा', 'आध्यात्मिक वंश' या 'धार्मिक प्रणाली' के रूप में किया जा सकता है।

संप्रदाय(Sampradaya) का अनुवाद 'परंपरा', 'आध्यात्मिक वंश' या 'धार्मिक प्रणाली' के रूप में किया जा सकता है। spiritual lineage is a tradition in Hinduism.

राधावल्लभ सम्प्रदाय((Radhavallabh sampradaya)) एक वैष्णव संप्रदाय है जो वैष्णव धर्मशास्त्री हित हरिवंश महाप्रभु के साथ शुरू हुआ था। दक्षिण के आचार्य निम्बार्कजी ने सर्वप्रथम राधा-कृष्ण की युगल उपासना का प्रचलन किया था निम्बार्क संप्रदाय कहता है कि श्याम और श्यामा का एक ही स्वरूप हैं। राधावल्लभ सम्प्रदाय के प्रवर्तक गोस्वामी श्री हरिवंश( हितहरिवंश ) जी थे। राधावल्लभ संप्रदाय के लोग कहते हैं कि राधावल्लभ संप्रदाय के प्रवर्तक श्रीकृष्ण वंशी अवतार थे। राधावल्लभ संप्रदाय सबसे अद्वितीय और प्रमुख संप्रदाय में से एक है, जिसकी शुरुआत 500 साल पहले अनंत श्री विभूषित, वंशी अवतार, प्रेम स्वरूप श्री हित हरिवंश चंद्र महाप्रभु जी ने की थी।


राधा वल्लभ श्री हरिवंश का अर्थ क्या है?:-

हित् ” शुद्ध प्रेम ” का प्रतीक है जो प्रिया प्रीतम के चरण कमलों में भक्ति सेवा की आधारशिला है। हरिवंश का अर्थ और भी सरल है: ह(ह) हरि के लिए, र(र) राधा रानी का प्रतीक है, व(व) वृंदावन को दर्शाता है और स(श) सहचरी के लिए है।

राधावल्लभ सम्प्रदाय आराध्य (Radhavallabh sampradaya) :-

राधावल्लभ सम्प्रदाय में श्री राधारानी की भक्ति पर जोर दिया है। श्री राधावल्लभ जी (Radha vallabh mandir) मंदिर वृन्दावन, मथुरा में एक बहुत प्रसिद्ध मंदिर है। यह मंदिर वृंदावन के ठाकुर के सबसे प्रसिद्ध 7 मंदिरों में से एक है, जिसमें श्री राधावल्लभ जी, श्री गोविंद देव जी, श्री बांके बिहारी जी और चार अन्य शामिल हैं। इस मंदिर में, राधारानी का विग्रह नहीं है, लेकिन उनकी उपस्थिति का संकेत देने के लिए कृष्ण जी के बगल में एक मुकुट रखा गया है। क्युकी श्री राधा श्री कृष्णा की आत्मा है जो उनमे ही है।

प्रेमा भक्ति:-

राधावल्लभ सम्प्रदाय ने प्रेमा भक्ति ’के मार्ग की उपासना के वंश को जन्म दिया, जिससे निकुंज की दुनिया में आगे बढ़ती है। ‘निकुंज’ पवित्र दुनिया जहां श्री राधा कृष्ण यमुना नदी के किनारे वृंदावन में साखियों के साथ रहते हैं। श्री हित हरिवंश महाप्रभु, पवित्र बांसुरी (वंशी अवतार) के अवतार होने के नाते, कमल की अंतरंग सेवा में आध्यात्मिक अमृत का स्वाद चखने की तरह, श्री राधा- कृष्ण के सुंदर कोमल पवित्र चरणों जैसे परम प्रेम में परमात्मा के रूप में जोड़ा। श्री राधा कृष्ण-श्री राधावल्लभ ” की भक्ति, समर्पण और प्रेमपूर्ण होकर ही भक्ति-रस की पवित्रता का स्वाद लिया जा सकता है। श्री राधावल्लभ की आध्यात्मिक पारदर्शिता की गहराई में प्रवेश करने की कोई संभावना नहीं है। जब इंसान अपने स्वार्थ की दुनिया को नहीं छोड़ता। श्री राधा की अवधारणा पूरी तरह से अधिकांश लोगों द्वारा गलत बताई गई थी, और यह श्री हित हरिवंश महाप्रभु थे जिन्होंने रास्ता दिखाया था। उनकी (हित हरिवंश महाप्रभु की) भक्ति की विधि को समझना आसान नहीं है;

भक्ति की विधि :-

परंपरा और शाही परिवार:-

परंपराएं और विरासत राधावल्लभ मंदिर को वृंदावन की सबसे पुरानी विरासत बनाते हैं। संस्थापक श्री हरिवंश महाप्रभु को भगवान राधावल्लभ का दूत माना जाता है। वह व्यक्ति हैं, जिन्होंने आम आदमी की भक्ति के अर्थ का प्रचार किया और उन्हें निर्देशित किया कि श्री राधावल्लभ का आशीर्वाद कैसे प्राप्त किया जा सकता है। श्री हरिवंश के परिवार को श्री राधावल्लभ के सम्मान में उनके कर्तव्यों का भुगतान करने के लिए उपहार दिया गया है। अब पीढ़ियों के बाद, सदस्य सार्वजनिक रूप से खुद को गोस्वामी के रूप में दर्शाते हैं। परिवार के सबसे बड़े पुरुष को ‘आदिकारी’ के रूप में सम्मानित किया जाता है और यह खिताब युवराज के पास होगा।

दिनचर्या:-

हर पुजारी या गोस्वामी अपनी परंपराओं का पालन करते हैं। हर सुबह वे भगवान को जगाते हैं, भोग चढ़ाते हैं, अभिषेक करते हैं, आरती करते हैं और ‘अष्टयाम सेवा’ के नियमों का पालन करते हैं। वे मंदिर की साफ-सफाई, प्रभु की सुख-सुविधाओं और प्रसादम के वितरण का लेखा-जोखा रखते हैं, क्योंकि प्रत्येक कार्यकर्ता उनके निर्देशों के तहत काम करता है। अपना काम पूरा करने के बाद वे लोगों को उपदेश देते हैं और श्री राधावल्लभजी की महानता को समझाने के लिए कथाएँ सुनाते हैं।

वर्त्तमान में तिलकायत अधिकारी जी:-

गोस्वामी श्री हित मोहित मराल जी महाराज

श्री हित हरिवंश महाप्रभु के दर्शन और सर्वशक्तिमान की दृष्टि, “राधा वल्लभ संप्रदाय” के निर्माण और स्थापना, इसके मंदिर और अन्य कई मुद्दों में परिणत हुई। सदियों से राधावल्लभ संप्रदाय अपने प्रमुख “तिलकायत अधिकारी” का पद श्री हित हरिवंश महाप्रभु के वंश के सबसे बड़े पुत्र को सौंपता रहा है। तदनुसार परंपरा उन्मुख निर्देश का पालन करते हुए पिछले वर्ष “चैत्र” के महीने में “शुक्ल नवमी” के शुभ दिन 17वें तिलकायत अधिकारी “श्रीहित राधेश लाल गोस्वामीजी महाराज” ने “श्री हित हरिवंश महाप्रभु” की विरासत को आगे बढ़ाने के लिए अपने सबसे बड़े पुत्र श्री मोहित मराल गोस्वामी को बागडोर सौंपी।

राधावल्लभ संप्रदाय तिलक (Radhavallabh sampradaya tilak):-

श्री राधावल्लभ सम्प्रदाय में गुरु दीक्षा(adha vallabh sampradaya guru mantra) :-

किसी भी संप्रदाय में गुरु दीक्षा हमे उस संप्रदाय के वंश परंपरा में जो गुरु हो उनसे गुरु मंत्र और दीक्षा लेनी चाहिए। क्युकी वो उस सम्प्रदया के वंश परंपरा से है उनकी वंश परंपरा में उस मंत्र की कई पीढ़ियों से जप साधना की गयी है वो मंत्र अपने आप में आराध्य की आशीर्वाद और कृपा से होत प्रोत होता है।
अगर आप उस संप्रदाय के वंश परंपरा में दीक्षा नहीं ले सकते तो उसी वंश परंपरा से दीक्षित कोई सिद्ध महापुरुष जिन्होंने उस मंत्र को साध लिया हो उनकी वाणी उनके आचरण से सिर्फ राधा कृष्ण की महिमा का गुणगान हो।

राधा वल्लभ संप्रदाय के संस्थापक कौन है?

राधावल्लभ संप्रदाय, (Radha Vallabha Sampradaya) हितहरिवंश महाप्रभु द्वारा प्रवर्तित एक प्रमुख वैष्णव सम्प्रदाय है। जो 1535 में आचार्य श्री हित हरिवंश महाप्रभु (1502-1552) ने वृन्दावन में शुरू किया था।

राधा वल्लभ का अर्थ क्या है?

राधवल्लभ नाम का अर्थ भगवान कृष्ण, देवी राधा की प्रिया होता है। 

राधा वल्लभ श्री हरिवंश क्या है?

श्री राधा वल्लभ मंदिर की स्थापना हित हरिवंश महाप्रभु ने की थी, जिनकी पूजा राधा वल्लभ के निकटवर्ती मंदिर में की जाती है, जो पहले राधावल्लभ का मंदिर था, लेकिन मुगल सम्राट औरंगजेब के वृंदावन पर हमले के कारण उन्हें अन्य स्थान पर स्थानांतरित कर दिया गया और फिर नया मंदिर बनाया गया।

राधा वल्लभ संप्रदाय किसकी शाखा है?

राधावल्लभ सम्प्रदाय ( संस्कृत : राधावल्लभसम्प्रदाय , रोमनकृत : राधावल्लभसम्प्रदाय ) एक वैष्णव हिंदू संप्रदाय है जो 1535 में भक्ति संत हित हरिवंश महाप्रभु (1502-1552) के साथ वृन्दावन में शुरू हुआ था। हरिवंश के विचार कृष्णवाद से संबंधित हैं, लेकिन सर्वोच्च सत्ता के रूप में देवी राधा की भक्ति पर जोर देते हैं।

Read More:- Radha vallabh mandir

Note:– यह हमारी विरासत(Hamari virasat) की छोटी सी कोशिश है जो हमारे भारतीय संतों की, सम्प्रदाय की महानता को आने वाली पीढ़ियों को दिखा सके। वह पढ़ सके कि वह जिस भूमि पर रहते हैं वहां के संत महापुरुष ने कितने त्याग किए हैं उनके जीवन को भारतीय संस्कृति से जोड़ने के लिए आध्यात्मिकता से जोड़ने के लिए। आध्यात्मिकता हमारे जीवन का प्राण है जिससे हमारे जीवन सही दिशा की ओर अग्रसर होता है। हमारी विरासत भारत के सभी सम्प्रदाय के बारे में लिस्टिंग कर रही है ,जिससे कि वर्तमान और आने वाली भावी पीढ़ियों को आसान से अपने संत महापुरुषों के बारे में जान सकें और अपना हृदय परिवर्तन कर सकें। सभी काम करते हुए ईश्वर को न भूले।…please share, Gives Rating and review

ये सखी संप्रदाय, निम्बार्क सम्प्रदाय के अंतर्गत है इसे हरिदासी सम्प्रदाय भी कहते हैं। जिसकी स्थापना स्वामी हरिदास (जन्म सम० 1535 वि०) ने की थी। इसमें भक्त अपने आपको श्रीकृष्ण की सखी मानकर उसकी उपासना तथा सेवा करते हैं।

सखी भाव :-

श्रीकृष्ण को सखी भाव से रिझाने का अर्थ है इसमें पुरुष हो या स्त्री हो खुद को कृष्णा की सखी मानकर उनकी आराधना करते है उनसे प्रेम भाव रखते है। कुछ साधु सोलह श्रृंगार करते है तो कुछ भाव से अपने सखी रुपी श्रृंगार करते है। और प्रायः स्त्रियों के भेष में रहकर उन्हीं के आचारों, व्यवहारों आदि का पालन करते हैं। सखी संप्रदाय के साधु विषेश रूप से भारत वर्ष में उत्तर प्रदेश के ब्रजक्षेत्र वृन्दावन, मथुरा, गोवर्धन में निवास करते हैं।

श्यामा-कुंजबिहारी :-

स्वामी हरिदास जी के द्वारा निकुंजोपासना के रूप में श्यामा-कुंजबिहारी की उपासना-सेवा की पद्धति विकसित हुई, यह बड़ी विलक्षण है। निकुंजोपासना में जो सखी-भाव है, वह गोपी-भाव नहीं है। निकुंज-उपासक प्रभु से अपने लिए कुछ भी नहीं चाहता, बल्कि उसके समस्त कार्य अपने आराध्य को सुख प्रदान करने हेतु होते हैं। श्री निकुंजविहारी की प्रसन्नता और संतुष्टि उसके लिए सर्वोपरि होती है। यह संप्रदाय “जिन भेषा मोरे ठाकुर रीझे सो ही भेष धरूंगी ” के आधार पर अपना समस्त जीवन “राधा-कृष्ण सरकार” को निछावर कर देती है।

जीवन परिचय swami haridas :

श्री स्वामी हरिदास जी के प्रेम भाव ह्रदय से समर्पण ने बात सिद्ध कर दिया. श्री स्वामी हरिदास जी(swami haridas ji) का जन्म राधा अष्टमी(Radha Ashtami) के दिन हुआ था और कहते है वो ललिता सखी के अवतार थे वही ललिता सखी जो राधा रानी कृष्णा भगवन की सखी थी. क्यूंकि उनका बचपन से ही ध्यान और ग्रंथों में रूचि अधिक थी और कृष्णा भगवान से उनका स्नेह भी अधिक था जबकि उनकी उम्र के अन्य बच्चे व्यस्त खेल रहे थे। हरिदास(swami shri haridas) युवा सांसारिक सुख से दूर रहे और ध्यान पर केंद्रित हो गए। हरीमती जी के साथ समय से ही उनकी शादी हो गयी पर वो  बिलकुल ही अलग थे स्वामी हरिदास जी सांसारिक सुख से कोई मोह माया नहीं था।
और बहुत जल्द हरीमती जी समझ गयी उनका प्रेम प्रभु के प्रति बहुत है. धीरे धीरे समय बीता और वो दिन आ गया जब श्री स्वामी हरिदास जी वृन्दावन के लिए निकल पड़े

रचनाएँ :

  1. सिद्धांत  (अठारह पद )
  2. केलिमाल (माधुर्य भक्ति का महत्वपूर्ण ग्रन्थ )

माधुर्य भक्ति :

स्वामी  हरिदास के  उपास्य युगल राधा-कृष्ण ,नित्य-किशोर ,अनादि एकरस और एक वयस हैं। यद्यपि ये स्वयं प्रेम-रूप हैं तथापि भक्त को को प्रेम का आस्वादन कराने के लिए ये नाना प्रकार की लीलाओं का विधान करते हैं। इन लीलाओं का दर्शन एवं भावन करके जीव अखण्ड   प्रेम का आस्वादन करता है।

‘कुञ्ज बिहारी बिहारिनि जू को पवित्र रस ‘~~ 

कहकर स्वामी जी स्पस्ट सूचित किया है कि राधा-कृष्ण का विहार अत्यधिक पवित्र है। उस विहार में प्रेम की लहरें उठती रहती हैं,जिनमें मज्जित होकर जीव आनन्द में विभोर हो जाता है। इस प्रेम की प्राप्ति उपासक विरक्त भाव से वृन्दावन-वास करते हुए भजन करने से हो सकती है। स्वामी हरिदास जी का जीवन इस साधना का मूर्त रूप कहा जा सकता है। राधा -कृष्ण की इस  अद्भुत  मधुर-लीला  का वर्णन स्वामी हरिदास ने  वन -विहार ,झूलन ,नृत्य आदि   विभिन्न रूपों में किया है। इस लीला का महत्व संगीत की दृष्टि से अधिक है। नृत्य का निम्न वर्णन दृष्टव्य है :

अद्भुत गति उपजत अति नाचत , दोउ मंडल कुँवर किशोरी। 
  सकल सुधंग अंग अंग भरि भोरी ,
                              पिय नृत्यत मुसकनि मुखमोरि परिरंभन रस रोरी।। (केलिमाल :कवित्त ३४ )

रसिक भक्त होने के कारण राधा-कृष्ण की लीलाओं को ही वह अपना सर्वस्व समझते हैं और सदा यही अभिलाषा करते हैं ~~
ऐसे   ही    देखत   रहौं   जनम   सुफल   करि   मानों। 
   प्यारे की भाँवती भाँवती के प्यारे जुगल किशोरै जानौं।।
  छिन  न  टरौं   पल  होहुँ  न  इत  उत  रहौं एक तानों। 
                              श्री हरिदास के स्वामी स्यामा ‘कुंज बिहारी ‘मन रानौं।।(केलिमाल :पद ३ )

स्वामी हरिदास ने केलिमाल में केवल राधा-कृष्ण की विविध लीलाओं का वर्णन किया है। राधा-कृष्ण की भक्ति ही माधुर्य भक्ति है .

680 पृष्ठों की एक छोटी पोथी हैं, जिसमें संस्थापक से लेकर इस हस्तलेख की तिथि संवत 1825 तक के समस्त महन्तों की तथा उनके लेखों की तालिका है। सूची यह है-

  1. स्वामी हरिदास
  2. विट्ठलविपुलदेव
  3. बिहारिनदास
  4. नागरीदास
  5. सरसदास
  6. नवलदास
  7. नरहरदास
  8. रसिकदास
  9. ललितकिशोर (ललितमोहनीदास)

स्वामी हरिदास की वंश परंपरा :-

स्वामी हरिदास की वंश परंपरा में वर्त्तमान में अभी छठी पीढ़ी पे श्रद्धेय आचार्य श्री मृदुल कृष्ण गोस्वामीजी और सातवीं पीढ़ी पे श्रद्धेय आचार्य श्री गौरव कृष्ण गोस्वामी जी है।

  1. स्वामी हरिदास
  2.        
  3. श्री मूल बिहारी गोस्वामीजी
  4. श्रद्धेय आचार्य श्री मृदुल कृष्ण गोस्वामीजी( Mridul krishna goswami ji)
  5. श्रद्धेय आचार्य श्री गौरव कृष्ण गोस्वामी जी (Gaurav krishna goswami)           

सखी संप्रदाय के संस्थापक है? 

स्वामी हरिदास (जन्म सम० 1535 वि०) ने की थी।

सखी संप्रदाय के प्रसिद्द मंदिर ?

श्री बांके बिहारी जी, निधिवन, राधा वल्लभ

सखी संप्रदाय में कैसी भक्ति की जाती है ?

माधुर्य भक्ति ,प्रेम भक्ति

निम्बार्क सम्प्रदाय, वैष्णवों सम्प्रदाय के अंतर्गत आता है। वैष्णवों के चार सम्प्रदायों में अत्यन्त प्राचीन सम्प्रदाय है। इस सम्प्रदाय को ‘हंस सम्प्रदाय’ ‘कुमार सम्प्रदाय’, ‘चतुः सन सम्प्रदाय’, और ‘सनकादि सम्प्रदाय’ भी कहते हैं। इस सम्प्रदाय का सिद्धान्त ‘द्वैताद्वैतवाद’ कहलाता है। इसी को ‘भेदाभेदवाद’ भी कहा जाता है।  इस सम्प्रदाय के आद्याचार्य श्रीसुदर्शनचक्रावतार जगद्गुरु श्रीभगवन्निम्बार्काचार्य है । वैष्णव चतु:सम्प्रदाय में श्रीनिम्बार्क सम्प्रदाय अत्यन्त प्राचीन अनादि वैदिक सत्सम्प्रदाय है। इस सम्प्रदाय का प्राचीन मन्दिर मथुरा में ध्रुव टीले पर स्थित बताया जाता है।

निम्बार्क सम्प्रदाय का इतिहास :-

श्री विष्णु भगवान के चौबीस अवतारों में प्रथम श्रीहंसावतार से प्रारम्भ होती है। श्रीहंस भगवान्‌ से जिस परम दिव्य श्रीगोपाल-मन्त्रराज का गूढतम उपदेश जिन महर्षिवर्य चतु: सनकादिकों को प्राप्त हुआ, उसी का दिव्योपदो देवर्षिप्रवर श्रीनारदजी को मिला और वही उपदेश द्वापरान्त में महाराज परीक्षित के राज्यकाल में श्रीनारदजी से श्रीनिम्बार्क भगवान्‌ को प्राप्त हुआ। सर्वेश्वर भगवान्‌‌ श्रीकृष्ण की मंगलमयी पावन आज्ञा शिरोधार्य कर चक्रराज श्रीसुदर्शन ने ही इस धराधाम पर भारतवर्ष के दक्षिण में महर्षिवर्य श्रीअरूण के पवित्र आश्रम में माता जयन्तीदेवी के उदर से श्रीनियमानन्द के रूप में अवतार धारण किया।

अल्पवय में ही माता जयन्ती, महर्षि अरूण के साथ उत्तर भारत में व्रजमण्डल स्थित गिरिराज गोवर्धन की तलहटी में आपने निवास किया। देवर्षिप्रवर श्रीनारदजी से वैष्णवी दीक्षा लिया और वही पंचपदी विद्यात्मक श्रीगोपालमन्त्रराज का पावन उपदो तथा श्रीसनकादि संसेवित श्रीसर्वेश्वर प्रभु, जो सूक्ष्म शालग्राम स्वरूप दक्षिणावर्ती चक्रांकित है, उनकी अनुपम सेवा प्राप्त हुई। यह सेवा श्रीहंस भगवान्‌ से श्रीसनकादिकों को और इनसे श्रीनारदजी को मिली, जो आगे चलकर द्वापरान्त में श्रीनिम्बार्क भगवान्‌ को प्राप्त हुई। वही सेवा अद्यावधि अखिल भारतीय श्रीनिम्बार्काचार्यपीठ में आचार्य परम्परा से चली आरही है। श्रीसुदर्शनचक्रराज ही नियमानन्द के रूप में इस भूतल पर प्रकट हुए और आप ही श्रीनिम्बार्क नाम से परम विख्यात हुए।

संस्थापक:- निम्बार्काचार्य

उपास्य देव:-

इस संप्रदाय के परमाराध्य और परमोपास्य युगल रूप राधा-कृष्ण हैं। श्रीकृष्ण सर्वेश्वर है और राधा सर्वेश्वरी। श्रीकृष्ण आनन्द स्वरूप है और राधा आल्हाद-स्वरूपिणी। राधा का स्वरूप श्रीकृष्ण के स्वरूप के सर्वथा अनुरूप माना गया है। धर्मोपासना में राधा की यह महत्ता निम्बार्क संप्रदाय में ही प्रथम बार स्वीकृति हुई थी। श्री निम्बार्काचार्य के दशश्लोकी के प्रसिद्ध श्लोक में राधा के इसी महत्तम स्वरूप का स्मरण किया गया है-

अंगे तु वामे वृषभानुजा मुदा विराजमाना मनुरूपसौभगा।
सख्यै सहस्रै: परिसेवितां सदा, स्मरेमि देवीं सकलेष्ट कामदां॥

इस संप्रदाय में राधाकृष्ण की युगल मूर्ति के प्रतीक सर्वेश्वर शालिग्राम की प्रमुख रूप से सेवा पूजा होती है। इस संप्रदाय का प्रमुख केन्द्र राजस्थान का सलेमाबाद है। मथुरा के ध्रुव टीला और नारद टीला नामक प्राचीन स्थलों पर इस संप्रदाय के मन्दिर और आचार्यों की समाधियाँ है। वृन्दावन इसका केन्द है।

व्यापकता:- निम्बार्क सम्प्रदाय के लोग विशेषकर उत्तर भारत में ही रहते हैं।

श्रीनिम्बार्क नाम :-

श्रीब्राजी ने व्रज में गिरिराज के निकटवर्ती आश्रम में सूर्यास्त होने पर भी नियमानन्द से निम्बवृक्ष पर सूर्य दर्शन कराके उनका भोजनादि से आतिथ्य ग्रहण किया, जिससे श्रीब्राजी ने उन्हें श्रीनिम्बार्क नाम से सम्बोधित किया। इसी से श्रीनिम्बार्क नाम से ही विश्व विख्यात हुए। नारद जी ने श्रीनिम्बार्क को राधाकृष्ण की युगल उपासना एवं स्वाभाविक द्वैताद्वैत सिद्धान्त का परिज्ञान कराया और स्वयं-पाकिता एवं अखण्ड नैष्ठिक ब्रह्मचर्य व्रतादि नियमों का विधिपूर्वक उपदेश किया 

 द्वैताद्वैत नामक सिद्धान्त :-

निम्बार्काचार्य ने प्रस्थानत्रयी पर भाष्य रचना कर स्वाभाविक द्वैताद्वैत नामक सिद्धान्त का प्रतिष्ठापन किया । राधाकृष्ण की श्रुति-पुराणादि रसमयी मधुर युगल उपासना का आपने सूत्रपात कर इसका प्रचुर प्रसार किया ।

श्रीनिम्बार्क के पट्टशिष्य पाञ्चजन्य शंखावतार श्री श्रीनिवासाचार्यजी ने निम्बार्काचार्य कृत वेदान्तपारिजातसौरभ नाम से प्रसिद्ध ब्रह्मसूत्र भाष्य पर वेदान्तकौस्तुभभाष्य की वृहद् रचना की । श्रीनिम्बार्क भगवान् द्वारा विरचित वेदान्तकामधेनु दशश्लोकी पर आचार्य श्रीपुर्षोत्तमाचार्य जी ने वेदान्तरत्नमंजूषा नामक वृहद भाष्य को रचा जो परम मननीय है ।

आचार्य श्रीदेवाचार्यजी :-

सोलहवें आचार्य श्रीदेवाचार्यजी से इस सम्प्रदाय में दो शाखाए चलती है – एक श्रीसुन्दरभट्‌टाचार्यजी की, जिन्होंने आचार्यपद अलंकृत किया और दूसरी श्रीव्रजभूषणदेवजी की जिनकी परम्परा में गीतगोविन्दकार श्रीजयदेव जी तथा महान रसिकाचार्य स्वामी श्रीहरिदास जी महाराज प्रकट हुए। पूर्वाचार्य परम्परा में जगद्विजयी श्रीकेशवकाशमीरीभट्‌टाचार्यजी महाराज ने वेदान्त-कौस्तुभ-भाष्य पर कौस्तुभ-प्रभा नामक विस्तृत व्याख्या का प्रणयन किया । श्रीमद्भगवद्गीता पर भी आप द्वारा रचित तत्व-प्रकाशिका नामक व्याख्या भी पठनीय है ।

परम प्रख्यात प्रमुख शिष्य रसिकाचार्य श्री श्रीभट्टदेवाचार्य जी महाराज ने व्रजभाषा में सर्वप्रथम श्रीयुगलशतक की रचना कर व्रजभाषा का उत्कर्ष बढाया। यह सुप्रसिद्ध रचना ‘व्रजभाषा की आदिवाणी’ नाम से लोक विख्यात है। इनके ही पट्टशिष्य श्रीहरिव्यासदेवाचार्यजी महाराज ने व्रजभाषा में ही श्रीमहावाणी की रचना कर जिस दिव्य निकुंज युगल मधुर रस को प्रवाहित किया वह व्रज-वृन्दावन के रसिकजनों का सर्व शिरोमणि देदीप्यमान कण्ठहार के रूप में अतिशय सुशोभित है । आपश्री ने जम्बू में जीव बलि लेने वाली देवी को वैष्णवी दीक्षा देकर उसे प्राणियों की बलि से मुक्त कर सात्विक वैष्णवी रूप प्रदान किया।

बंधन और मुक्ती:-

जीव का अज्ञान से उत्पन्न कर्म के संपर्क में आने के कारण उसका वास्तविक रूप विकृत और अस्पष्ट हो गया है, जो कि शुरुआती है, लेकिन जो भगवान के अनुग्रह से पूरी तरह से प्रकट हो सकता है। अज्ञानता ईश्वर का अंश है और ब्रह्मांडीय अभिव्यक्ति का आधार है अर्थात् गुणों के साथ ईश्वर का उदय होता है। उद्धार प्राप्त करने के लिए, जीव को परमपद, या प्रपत्ति, जिसकी छह(6) तरीके हैं, जो इस तरह से है :-

भगवान की कृपा उन लोगों तक ही पहुँचती है जो इन 6 घटकों के जो प्रपन्ना हैं जीवन में उतारा है ; और उस कृपा से भक्ति उत्पन्न होती है, जिसमें भगवान के प्रति विशेष प्रेम होता है, जो अंततः परमात्मन की प्राप्ति (संस्कार) होती है। भक्त के लिए निम्नलिखित 5 बातों का ज्ञान होना आवश्यक है:

पाँच साधनाएँ:-

मूल साधना में श्री राधा माधव की पूजा होती है, जिसमें श्री राधा को श्री कृष्ण के अविभाज्य अंग के रूप में देखा जाता है। निम्बार्क मुक्ति के पाँच तरीकों को संदर्भित करता है,

कर्म :-

लगातार धर्म सेवा के प्रति समर्पित रहना और आश्रम में ज्ञान प्रपात करना। जो मोक्ष का साधन है।

विद्या (ज्ञान):-

विद्या जो अपने आराध्य के करीब ले जाये। उस ज्ञान की प्राप्ति करना जीवन को सही दिशा में ले चले और जीवन सार्थक बन जाये।

उपासना या ध्यान:-

यह तीन प्रकार का होता है। सबसे पहले भगवान का ध्यान स्वयं के रूप में किया जाता है, अर्थात् भाव के आंतरिक नियंत्रक के रूप में भगवान पर ध्यान। दूसरा गैर-संवेदक के आंतरिक नियंत्रक के रूप में प्रभु का ध्यान है। अंतिम एक भगवान और स्वयं पर ध्यान है, जो भावुक और गैर-भावुक से अलग है।

प्रपत्ति (प्रभु के प्रति समर्पण ):-

श्री राधा कृष्ण के रूप में भगवान की भक्ति और आत्म-समर्पण। मोक्ष प्राप्ति की यह विधि, जिसे प्रपत्ति साधना के रूप में जाना जाता है इसे साधना (या अपरा) भक्ति – नियमों के माध्यम से भक्ति के रूप में जाना जाता है। यह बदले में पार्थ भक्ति की ओर जाता है – मधुर रस की विशेषता – भक्ति की मधुर भावनाएं जो साधना भक्ति में सिद्ध होती हैं।

गुरुपत्सति :-

गुरु के प्रति समर्पण और आत्म समर्पण। क्युकी गुरु के कृपा से ही युगल सरकार की प्राप्ति होती है।

श्री निम्बार्काचार्य ने निम्नलिखित पुस्तकें लिखीं:

निम्बार्क सम्प्रदाय देवचार्य”-

निम्बार्क सम्प्रदाय के प्रमुख सम्प्रदाय :-

  1. हरिदासी सम्प्रदाय( सखी संप्रदाय )
  2. राधावल्लभ संप्रदाय

आचार्य पीठ परम्परा:-

आचार्य पीठ परम्परा में अब तक 48 आचार्य हुये है। जो निम्नप्रकार से है:-

1 श्री हंस भगवान्‌ कार्तिक शुक्ल नवमी

2 श्री सनकादिक भगवान्‌ कार्तिक शुक्ल नवमी

3 श्री नारद भगवान्‌ मार्गशीर्ष शुक्ल द्वादशी

4 श्री निम्बार्काचार्य जी कार्तिक शुक्ल पूर्णिमा

5 श्री श्रीनिवासाचार्य जी माघ शुक्ल पञ्चमी

6 श्री विश्वाचार्य जी फाल्गुन शुक्ल चतुर्थी

7 श्री पुरुषोत्तमाचार्यजी चैत्र शुक्ल षष्ठी

8 श्री विलासाचार्य जी वैशाख शुक्ल अष्टमी

9 श्री स्वरूपाचार्य जी ज्येष्ठ शुक्ल सप्तमी

10 श्री माधवाचार्य जी आषाढ़ शुक्ल दशमी

11 श्री बलभद्राचार्य जी श्रावण शुक्ल तृतीया

12 श्री पद्माचार्य जी भाद्रपद शुक्ल द्वादशी

13 श्री श्यामाचार्य जी आश्विन शुक्ल त्रयोदशी

14 श्री गोपालाचार्य जी भाद्रपद शुक्ल एकादशी

15 श्री कृपाचार्य जी मार्गशीर्ष शुक्ल पूर्णिमा

16 श्री देवाचार्य जी माघ शुक्ल पञ्चमी

17 श्री सुन्दर भट्‌टाचार्य जी मार्गशीर्ष शुक्ल द्वितीया

18 श्री पद्मनाभ भट्‌टाचार्य जी वैशाख कृष्ण तृतीया

19 श्री उपेन्द्र भट्‌टाचार्य जी चैत्र कृष्ण तृतीया

20 श्री रामचन्द्र भट्‌टाचार्य जी वैशाख कृष्ण पञ्चमी

21 श्री वामन भट्‌टाचार्य जी ज्येष्ठ कृष्ण षष्ठी

22 श्री कृष्ण भट्‌टाचार्य जी आषाढ़ कृष्ण नवमी

23 श्री पद्माकर भट्‌टाचार्य जी आषाढ़ कृष्ण अष्टमी

24 श्री श्रवण भट्‌टाचार्य जी कार्तिक कृष्ण नवमी

25 श्री भूरि भट्‌टाचार्य जी आश्विन कृष्ण दशमी

26 श्री माधव भट्‌टाचार्य जी कार्तिक कृष्ण एकादशी

27 श्री श्याम भट्‌टाचार्य जी चैत्र कृष्ण द्वादशी

28 श्री गोपाल भट्‌टाचार्य जी पौष कृष्ण एकादशी

29 श्री बलभद्र भट्‌टाचार्य जी माघ कृष्ण चतुर्दशी

30 श्री गोपी नाथ भट्‌टाचार्य जी श्रावण शुक्ल सप्तमी

31 श्री केशव भट्‌टाचार्य जी चैत्र शुक्ल प्रतिपदा

32 श्री गांगल भट्‌टाचार्य जी चैत्र कृष्ण द्वितीया

33 श्री केशव काशमीरी भट्‌टाचार्य ज्येष्ठ शुक्ल चतुर्थी

34 श्री श्रीभट्‌ट देवाचार्य जी आश्विन शुक्ल द्वितीया

35 श्री हरिव्यास देवाचार्यजी कार्तिक कृष्ण द्वादशी

36 श्री परशुराम देवाचार्य जी भाद्रपद कृष्ण पञ्चमी

37 श्री हरिवंश देवाचार्य जी मार्गशीर्ष कृष्ण सप्तमी

38 श्री नारायण देवाचार्य जी पौष शुक्ल नवमी

39 श्री वृन्दावन देवाचार्य जी भाद्रपद कृष्ण त्रयोदशी

40 श्री गोविन्द देवाचार्य जी कार्तिक कृष्ण पञ्चमी

41 श्री गोविन्द शरण देवाचार्य जी कार्तिक कृष्ण अष्टमी

42 श्री सर्वेश्वर शरण देवाचार्य जी पौष कृष्ण षष्ठी

43 श्री निम्बार्क शरण देवाचार्य जी ज्येष्ठ शुक्ल षष्ठी

44 श्री ब्रजराज शरण देवाचार्य जी ज्येष्ठ शुक्ल पञ्चमी

45 श्री गोपीश्वर शरण देवाचार्य जी माघ कृष्ण दशमी

46 श्री घनश्याम शरण देवाचार्य जी आश्विन कृष्ण षष्ठी

47 श्री बालकृष्ण शरण देवाचार्य जी चैत्र कृष्ण द्वादशी

48 श्री राधासर्वेश्वर शरण देवाचार्य जी ज्येष्ठ शुक्ल द्वितीया

इस सम्प्रदाय का प्राचीन नाम रुद्र सम्प्रदाय है और वर्तमान में इसे वल्लभसम्प्रदाय या पुष्टिमार्ग(pushtimarg) सम्प्रदाय के नाम से जाना जाता है। और वल्लभसम्प्रदाय वैष्णव सम्प्रदाय अन्तर्गत आते हैं। यह 16 वीं शताब्दी की शुरुआत में वल्लभाचार्य (1479-1531) द्वारा स्थापित किया गया था और कृष्ण भगवान की आराधना पे आधारित है।

पुष्टिमार्ग भक्ति स्कूल (pushti marg) :-

एक भक्ति स्कूल , पुष्टिमार्ग(pushtimarg) का विस्तार वल्लभाचार्य के वंशजों द्वारा किया गया था, विशेष रूप से ज्ञानजी। और इसमें विशेष रूप से श्री कृष्णा की अद्भुत लीला गाथाओ का भागवत पुराण में पाए गए और पर्वत गोवर्धन से संबंधित हैं। और इसके केंद्र में उस अमृत भरे सार्वभौमिक-प्रेम-विषय को समझाया गया है।

पुष्टिमार्ग सम्प्रदाय में श्री कृष्ण के नाम :-

पुष्टिमार्ग सम्प्रदाय श्री कृष्ण को कई नामों और उप नामों से पहचानता है, जैसे श्री नाथजी, श्री नवनीतप्रियाजी, श्री मदनमोहनजी, श्री मथुरेशजी, श्री गोकुलजी, श्री विट्ठलनाथजी और श्री द्वारकाधीशजी।

इस दर्शन के अनुसार :-

पुष्टिमार्ग अवतरण वल्लभाचार्य के शुद्धाद्वैत वेदान्तिक उपदेशों की सदस्यता लेता है, जो अद्वैत वेदांत, विशिष्टाद्वैत और द्वैत वेदांत के साथ कुछ विचारों को साझा करता है। इस दर्शन के अनुसार, कृष्ण सर्वोच्च हैं, जो कुछ भी मौजूद है, उसका स्रोत, मानव आत्मा कृष्ण की दिव्य ज्योति से प्रभावित है, और आध्यात्मिक मुक्ति का परिणाम कृष्ण की कृपा से है। श्री कृष्णा ने तपस्वी जीवन शैली को अस्वीकार कर दिया और गृहस्थ जीवन शैली को पोषित किया, जिसमें अनुयायी स्वयं को कृष्ण के सखी प्रेमिका और सहचरी के रूप में और उनके दैनिक जीवन को उनकी रचना की चल रही रासलीला के रूप में देखते हैं। पुष्टिमार्ग अष्टछाप के काम और काव्य के नेत्रहीन भक्त-कवि सूरदास सहित आठ भक्ति आंदोलन के कवि साथ बढ़ता गया .

इसके अनुयायी:-

इसके अनुयायी जिन्हें पुष्टिमार्गिस कहा जाता है आमतौर पर उत्तरी और पश्चिमी भारत में पाए जाते हैं, विशेष रूप से राजस्थान में और इसके आसपास, साथ ही दुनिया भर में इसके क्षेत्रीय प्रवासी हैं। उदयपुर के उत्तर में नाथद्वारा में श्रीनाथजी मंदिर – उनका मुख्य मंदिर है, जो 1669 में अपनी उत्पत्ति का पता लगाता है, यह पुष्टिमार्ग मंदिर भारत में कृष्ण के सबसे धनी और अधिक विस्तृत मंदिरों में से एक है।

संस्थापक-वल्लभाचार्य:-

वल्लभाचार्य का जन्म दक्षिण भारत में एक तेलुगु ब्राह्मण परिवार में हुआ था, एक माँ थी और पिता विजयनगर साम्राज्य के शाही दरबार में पुजारी थे। वल्लभ का परिवार वाराणसी से भाग गया निकला था जब उन्होंने शहर पर एक आसन्न इस्लामी हमले की अफवाहें को सुना था, फिर शुरुआती में उनके माता पिता छोटे वल्लभ के साथ छत्तीसगढ़ के जंगलों में कुछ दिन बिताये .वल्लभाचार्य का जन्मस्थान, प्राकट्य बैठक, चम्पारण

वल्लभ की वैदिक साहित्य और अन्य हिंदू ग्रंथों में पारंपरिक शिक्षा थी।उन्होंने आदि शंकराचार्य, अद्वैत वेदांत के विद्वानों, रामानुज की विश्वात्पाद, माधवाचार्य के द्वैत वेदांत के साथ-साथ बंगाल के अपने समकालीन चैतन्य महाप्रभु से मुलाकात की। उत्तर में वृंदावन की उनकी यात्रा ने उन्हें स्वीकार करने के लिए राजी कर लिया और खुद को कृष्ण की भक्ति में समर्पित कर दिया और संस्कृत में अपना दार्शनिक परिसर और ब्रज भाषा में कुछ लिखा। उनका भक्ति मंत्र “श्री कृष्ण शरणम मम” ) पुष्टिमार्गी का दीक्षा मंत्र बन गया। वल्लभ शब्द पुष्य ने “आध्यात्मिक पोषण” दिया, जो कृष्ण की कृपा का रूपक था।

मान्यताएं:-

शास्र :-

ब्रह्मसम्बन्ध(दीक्षा):-

पुष्टिमार्ग में औपचारिक दीक्षा को ब्रह्मसम्बन्ध कहा जाता है। अनुग्रह के मार्ग में “ब्रह्मसम्बन्ध” देने का पूर्ण और अनन्य अधिकार। जो चाहते है इस राह पे चलना। “गोस्वामी” का शाब्दिक अर्थ है – वह जो सभी इंद्रियों पर नियंत्रण रखता है), जिसे वल्लभ वैष्णव आदरपूर्वक और प्यार से इस रूप में संदर्भित करते हैं: “गोस्वामी”, “बावा” या “जय जय”। वे वल्लभाचार्य महाप्रभु के वास्तविक और प्रत्यक्ष वंशज हैं। गोस्वामी उनके द्वारा शुरू किए गए सभी शिष्यों के “पुष्ट” (शाब्दिक अर्थ सही आध्यात्मिक मार्ग ) के लिए जिम्मेदार हैं।

उपासना :-

कृष्ण भगवान इस संप्रदाय के प्रमुख देवता हैं। श्री यमुनाजी को उनके (चतुर्थ पटरानी) के रूप में पूजा जाता है। और वह देवी हैं जिन्होंने श्री वल्लभाचार्य को श्रीमद् भागवत (श्रीमद् भागवत पारायण) का पाठ करने का आदेश दिया था। यह श्री यमुनाजी के लिए है, श्री वल्लभाचार्यजी ने श्री यमुनाष्टकम( yamunashtakam ) की रचना की।

श्री कृष्ण के कई रूपों / प्रतीकों को संप्रदाय में पूजा जाता है। यहाँ मुख्य रूप हैं, उनका विवरण और वर्तमान में वे कहाँ रहते हैं।

पुष्टिमार्ग सेवा भाव (पुष्टिमार्ग में भक्ति):-

पुष्टिमार्ग सेवा के कुछ महत्वपूर्ण पहलू हैं:

सेवा पुष्टिमार्ग में पुष्टि को प्राप्त करने का सबसे महत्वपूर्ण तरीका है और इसे वल्लभाचार्य द्वारा मौलिक सिद्धांत के रूप में निर्धारित किया गया है। शुद्धाद्वैत वैष्णववाद के सभी सिद्धांत और सिद्धांत यहाँ से निकलते हैं।

त्योहार और उत्सव:-

हवेली संगीत (कीर्तन):-

कीर्तन भक्तों के लिए और श्रीनाथजी के बारे में अष्ट सिद्धियों द्वारा लिखे गए भजन हैं। कीर्तन के दौरान बजाए जाने वाले वाद्ययंत्रों में ज़ांज़, मंजीरा, ढोलक, पखावज / मृदंग, डफ, तम्पुरा, वीणा, हारमोनियम, तबला आदि शामिल हैं।

वल्लभाचार्य की रचनाएँ:-

वल्लभाचार्य की रचनाएँ पुष्टिमार्ग के मुख्य केंद्र हैं। उन्होंने संस्कृत के ग्रंथों, ब्रह्म-सूत्र , और श्रीमद भागवतम् (श्री सुबोधिनी जी, तत्त्वार्थ दीप निबन्ध) पर टीकाएँ लिखीं।

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ब्रह्मसम्प्रदाय (प्रमुख आचार्य-आनन्दतीर्थ (मध्व), मत-द्वैत); इस के प्रवर्तक थे संत माधवाचार्य। गौड़ीय वैष्णव सम्प्रदाय(Gaudiya Vaishnavism) ब्रह्म सम्प्रदाय (brahma sampradaya) के अंतर्गत आता है। गौड़ीय वैष्णववाद (इसे बंगाली वैष्णववाद, [1] या चैतन्य वैष्णववाद [2]) भी कहते है। भारत में चैतन्य महाप्रभु (1486-1534) से प्रेरित एक वैष्णव हिंदू धार्मिक आंदोलन है। “गौड़ीय” का तात्पर्य बंगाल के गौआ क्षेत्र (वर्तमान पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश) में वैष्णववाद से है जिसका अर्थ है “विष्णु भगवान की पूजा”। इसका धार्मिक आधार मुख्य रूप से भगवद गीता और भागवत पुराण है, जिसकी व्याख्या चैतन्य के प्रारंभिक शिष्यों जैसे कि सनातन गोस्वामी , रूप गोस्वामी , जीव गोस्वामी, गोपाल गोस्वामी, और अन्य लोगों के रूप में की गई है।

आराध्य :-

गौड़ीय वैष्णव राधा कृष्ण को अपना आराध्य मानते है। ये हरे कृष्ण मंत्र में मगन रहते है तथा इसी नाम से नृत्य करके भगवान को रिझाते है। गौड़ीय वैष्णव संप्रदाय (Gaudiya Vaishnavism) की आधारशिला चैतन्य महाप्रभु के द्वारा रखी गई। उनके द्वारा प्रारंभ किए गए महामंत्र नाम संकीर्तन का अत्यंत व्यापक व सकारात्मक प्रभाव आज पश्चिमी जगत तक में है। कृष्णकृपामूर्ती श्री श्रीमद् अभयचरणारविन्द भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद को गौड़ीय वैष्णव संप्रदाय के पश्चिमी जगत के आज तक के सर्वश्रेष्ठ प्रचारक माने जाते हैं।

महामंत्र :-

हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे ||

Hare Kṛṣṇa Hare Kṛṣṇa
Kṛṣṇa Kṛṣṇa Hare Hare
Hare Rāma Hare Rāma
Rāma Rāma Hare Hare

सुप्रसिद्ध मन्दिर:-

राधा रमण मन्दिर वृंदावन में श्री राधा रमण जी का मन्दिर श्री गौड़ीय वैष्णव सम्प्रदाय (Gaudiya Vaishnavism) के सुप्रसिद्ध मन्दिरों में से एक है। श्री गोपाल भट्ट जी शालिग्राम शिला की पूजा करते थे। एक बार उनकी यह अभिलाषा हूई की शालिग्राम जी के हस्त-पद होते तो मैं इनको विविध प्रकार से सजाता एवं विभिन्न प्रकार की पोशाक धारण कराता। भक्त वत्सल श्री कृष्ण जी ने उनकी इस मनोकामना को पूर्ण किया एवं शालिग्राम से श्री राधारमण जी प्रकट हुए। श्री राधा रमण जी के वामांग में गोमती चक्र सेवित है। इनकी पीठ पर शालिग्राम जी विद्यमान हैं।

भक्ति की गतिविधियाँ:-

भक्ति योग(Bhakti Yoga):- भक्ति को जीवन में इस तरह सामना है जैसे बाकि कार्य आप करते है भक्ति या भक्ति-योग के रूप में वर्णित किया गया है। भक्ति-योग प्रक्रिया के दो मुख्य तत्व हैं, वैदिक भक्ति, जो नियमों और विनियमों (साधना) और रागानुग भक्ति के अभ्यास के माध्यम से भक्ति सेवा है

आहार और जीवन शैली:-

गौड़ीय वैष्णव मछली और अंडे सहित सभी प्रकार के जानवरों के मांस से परहेज करते है और ये सख्ती के रूप में बिकुल वार्चित है। दूध जैसे शाकाहारी (या सख्त शाकाहारी ) आहार का पालन करते हैं। प्याज और लहसुन से भी बचा जाता है क्योंकि माना जाता है कि बड़ी मात्रा में ये लेने पर खाने वाले में चेतना के अधिक तामसिक रूप को बढ़ावा मिलता है। गौड़ीय वैष्णव भी कैफीन के सेवन से बचते हैं, क्योंकि उनका मानना है कि यह नशे की लत और नशीला है। कई गौड़ीय वैष्णव अपने जीवन में कम से कम कुछ समय के लिए भिक्षुओं (ब्रह्मचर्य) के रूप में रहते है।

28 प्रसिद्द गौड़ीय वैष्णव संप्रदाय के सम्बन्ध :-

  1. चंडीदास
  2. चैतन्य महाप्रभु
  3. दूतकाव्य
  4. नरसिंह
  5. नित्यानंद प्रभु
  6. प्रियादास
  7. बल्लभ रसिक
  8. ब्रह्मसंहिता
  9. ब्रजबुलि
  10. माधुरीदास
  11. मायापुर
  12. राधा कृष्ण
  13. लोकनाथ गोस्वामी
  14. श्री पाद केशव भारती
  15. श्री विद्या, षड्गोस्वामी
  16. षण्गोस्वामी
  17. सूरदास मदनमोहन
  18. हरिराम व्यास
  19. जगन्नाथ मन्दिर
  20. पुरी
  21. जीव गोस्वामी
  22. वीरचन्द्र प्रभु
  23. गदाधर भट्ट
  24. गिरिराज स्वामी
  25. गौड़
  26. कविराज कृष्णदास
  27. कैफ़ीन
  28. अभयचरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद

चंडीदास:-

चंडीदास राधकृष्ण लीला संबंधी साहित्य का आदिकवि माने जाते हैं। इनका बंगाली वैष्णव समाज में बड़ा मान है। बहुत दिनों तक इनके बारे में कुछ विशेष ज्ञात नहीं था। चंडीदास को द्विज चंडीदास, दीन चंडीदास, बडु चंडीदास, अनंतबडु चंडीदास इन कई नामों से युक्त पद प्राप्त थे। चैतन्यचरितामृत में बताया गया है कि चैतन्य महाप्रभु चंडीदास एवं विद्यापति की रचनाएँ सुनकर प्रसन्न होते थे। जीव गोस्वामी ने भागवत की अपनी टीका “वैष्णव तोषिनी” में जयदेव के साथ चंडीदास का उल्लेख किया है।

चैतन्य महाप्रभु:-

चैतन्य महाप्रभु (१८ फरवरी, १४८६-१५३४) वैष्णव धर्म के भक्ति योग के परम प्रचारक एवं भक्तिकाल के प्रमुख कवियों में से एक हैं। इन्होंने वैष्णवों के गौड़ीय संप्रदाय की आधारशिला रखी, भजन गायकी की एक नयी शैली को जन्म दिया तथा राजनैतिक अस्थिरता के दिनों में हिंदू-मुस्लिम एकता की सद्भावना को बल दिया, जाति-पांत, ऊंच-नीच की भावना को दूर करने की शिक्षा दी तथा विलुप्त वृंदावन को फिर से बसाया और अपने जीवन का अंतिम भाग वहीं व्यतीत किया। उनके द्वारा प्रारंभ किए गए महामंत्र नाम संकीर्तन का अत्यंत व्यापक व सकारात्मक प्रभाव आज पश्चिमी जगत तक में है।

दूतकाव्य:-

यह लेख संस्कृत के महाकवि भास की रचना ‘दूतवाक्य’ के बारे में नहीं है। —- दूतकाव्य, संस्कृत काव्य की एक विशिष्ट परंपरा है  दूसरी और इस परंपरा के बीज लोककाव्यों में भी स्थित जान पड़ते हैं, जहाँ विरही और विरहिणियाँ अपने अपने प्रेमपात्रों के पति भ्रमर, शुक, चातक, काक आदि पक्षियों के द्वारा संदेश ले जाने का विनय करती मिलती हैं। .

नरसिंह:-

प्रहलाद एवं उसकी माता ”’नरसिंहावतार”’ को हिरण्यकश्यप के वध के समय नमन करते हुए नरसिंह नर + सिंह (“मानव-सिंह”) को पुराणों में भगवान विष्णु का अवतार माना गया है। भारत में, खासकर दक्षिण भारत में वैष्णव संप्रदाय के लोगों द्वारा एक देवता के रूप में पूजे जाते हैं जो विपत्ति के समय अपने भक्तों की रक्षा के लिए प्रकट होते हैं। .

नित्यानंद प्रभु:-

नित्यानंद प्रभु (जन्म:१४७४) चैतन्य महाप्रभु के प्रथम शिष्य थे। इन्हें निताई भी कहते हैं। इन्हीं के साथ अद्वैताचार्य महाराज भी महाप्रभु के आरंभिक शिष्यों में से एक थे। इन दोनों ने निमाई के भक्ति आंदोलन को तीव्र गति प्रदान की। निमाई ने अपने इन दोनों शिष्यों के सहयोग से ढोलक, मृदंग, झाँझ, मंजीरे आदि वाद्य यंत्र बजाकर व उच्च स्वर में नाच-गाकर हरि नाम संकीर्तन करना प्रारंभ किया।

प्रियादास:-

प्रियादास नाभाजी द्वारा रचित भक्तमाल की कवित्तोंवाली प्रसिद्ध टीका ‘भक्तिरसबोधिनी’ के रचयिता हैं। इनका उपनाम रसरासि था। इनके दीक्षागुरु मनोहरराम चैतन्य संप्रदाय की राधारमणी शिष्यपरंपरा में थे। भक्तिरसबोधिनी की रचना संवत १७६९ में पूर्ण हुई थी। इनकी अन्य रचनाएँ रसिकमोहिनी (सं. 1794), अनन्यमोहिनी, चाहवेली तथा भक्तसुमिरनी हैं।

बल्लभ रसिक:-

बल्लभ रसिक गौड़ीय सम्प्रदाय के भक्त कवि हैं।

ब्रह्मसंहिता

ब्रह्मसंहिता एक संस्कृत पंचरात्र ग्रन्थ है जिसमें सृष्टि के आरम्भ में ब्रह्मा द्वारा भगवान कृष्ण या गोविन्द की स्तुति की गयी है। गौड़ीय वैष्णव संप्रदाय में इस ग्रन्थ की बहुत प्रतिष्ठा है। ब्रह्मसंहिता में कहा है- .

ब्रजबुलि:-

ब्रजबुलि उस काव्यभाषा का नाम है जिसका उपयोग उत्तर भारत के पूर्वी प्रदेशों अर्थात् मिथिला, बंगाल, आसाम तथा उड़ीसा के भक्त कवि प्रधान रूप से कृष्ण की लीलाओं के वर्णन के लिए करते रहे हैं।

माधुरीदास:-

माधुरीदास गौड़ीय सम्प्रदाय के अंतर्गत ब्रजभाषा के अच्छे कवियों में गणना है।

मायापुर:-

मायापुर (মায়াপুর) पश्चिम बंगाल के नदिया जिला में गंगा नदी के किनारे, उसके जलांगी नदी से संगम के बिंदु पर बसा हुआ एक छोटा सा शहर है। यह नवद्वीप के निकट है। यह कोलकाता से १३० कि॰मी॰ उत्तर में स्थित है। यह हिन्दू धर्म के गौड़ीय वैष्णव सम्प्रदाय के लिए अति पावन स्थल है। यहां उनके प्रवर्तक श्री चैतन्य महाप्रभु का जन्म हुआ था। इन्हें श्री कृष्ण एवं श्री राधा का अवतार माना जाता है।

राधा कृष्ण:-

राधा कृष्ण (IAST, संस्कृत राधा कृष्ण) एक हिंदू देवता हैं। कृष्ण को गौड़ीय वैष्णव धर्मशास्त्र में अक्सर स्वयं भगवान के रूप में सन्दर्भित किया गया है और राधा एक युवा नारी हैं, एक गोपी जो कृष्ण की सर्वोच्च प्रेयसी हैं। कृष्ण के साथ, राधा को सर्वोच्च देवी स्वीकार किया जाता है और यह कहा जाता है कि वह अपने प्रेम से कृष्ण को नियंत्रित करती हैं। यह माना जाता है कि कृष्ण संसार को मोहित करते हैं, लेकिन राधा “उन्हें भी मोहित कर लेती हैं। इसलिए वे सभी की सर्वोच्च देवी हैं। राधा कृष्ण”.

लोकनाथ गोस्वामी:-

लोकनाथ गोस्वामी गैड़ीय वैष्णव सन्त थे। उनका जन्म यशोहर (जैसोर) के तालखडि ग्राम में सं.

श्री पाद केशव भारती:-

श्री पाद केशव भारती गौड़ीय वैष्णव संप्रदाय के प्रवर्तक श्री चैतन्य महाप्रभु के गुरु थे। इन्होंने गौरांग को २४ वर्ष की आयु में १५१० में दीक्षा दी। उनका नाम बदल कर कृष्ण चैतन्य कर दिया। 

षड्गोस्वामी:-

षड्गोस्वामी (छः गोस्वामी) से आशय छः गोस्वामियों से है जो वैष्णव भक्त, कवि एवं धर्मप्रचारक थे। इनका कार्यकाल १५वीं तथा १६वीं शताब्दी था। वृन्दावन उनका कार्यकेन्द्र था। चैतन्य महाप्रभु ने जिस गौड़ीय वैष्णव सम्प्रदाय की आधारशिला रखी गई थी, उसके संपोषण में उनके षण्गोस्वामियों की अत्यंत अहम् भूमिका रही। इन सभी ने भक्ति आंदोलन को व्यवहारिक स्वरूप प्रदान किया। 

षण्गोस्वामी:-

वृंदावन में चैतन्य महाप्रभु द्वारा भेजे गए छः शिष्य थे। इन्हें ही षण्गोस्वामी कहा गया। ये इस प्रकार हैं। . सूरदास मदनमोहन :- सूरदास मदनमोहन की गौड़ीय सम्प्रदाय के प्रमुख भक्त कवियों में गणना की जाती है। हरिराम व्यास:- राघावल्लभीय संप्रदाय के हरित्रय में इनका विशिष्ट स्थान है।

नोट : अगर आप कुछ और जानते है तो सुझाव और संशोधन आमंत्रित है। please inbox us.

भगवान भक्ति को ही मोक्ष का सर्वोपरि साधन मानने वाले रामानुज-सम्प्रदाय के पश्चात एक तीसरा सम्प्रदाय निकला जिसे द्वैत सम्प्रदाय-माध्व सम्प्रदायब्रह्म सम्प्रदाय(brahma sampradaya) कहते हैं। ब्रह्मसम्प्रदाय (प्रमुख आचार्य-आनन्दतीर्थ (मध्व), मत-द्वैत); इस के प्रवर्तक थे संत माधवाचार्य। संत राम सखे इन के अनुयायी थे। माधवाचार्य एक महान संत और समाज सुधारक थे। इन्होंने ब्रह्म सूत्र और दस उपनिषदों की व्याख्या लिखी। संप्रदाय को ब्रह्म संप्रदाय के रूप में भी जाना जाता है, आध्यात्मिक गुरु (गुरु) के उत्तराधिकार में अपने पारंपरिक मूल का उल्लेख करते हुए ब्रह्मा से उत्पन्न हुआ कहा है।

माधव परंपरा के अनुसार, रचनाकार सृष्टि से श्रेष्ठ है, और इसलिए मोक्ष केवल विष्णु की कृपा से मिलता है, प्रयास से नहीं। इसके अलावा मध्यकालीन उत्तरभारत में ब्रह्म(माध्व) संप्रदाय के अंतर्गत ब्रह्ममाध्वगौड़ेश्वर(गौड़ीय) संप्रदाय जिसके प्रवर्तक आचार्य श्रीमन्महाप्रभु चैतन्यदेव हुए

श्री मध्वाचार्य जी महाराज 12 वीं शताव्दी के महान सन्त हुए थे ये ब्रह्म सम्प्रदाय के प्रवर्तक माने जाते है तथा वैष्णवों के चारों सम्प्रदायों में से प्रधान सम्प्रदाय है इनका जन्म दक्षिण भारत में तुलुब देश के वेलीग्राम में मधिजी भट्ट (श्री नारायण जी भट्ट) नाम तुलु ब्राह्मण के घर संवत् 1295 माघ शुल्क सप्तमी को हुआ था इनकी माता का नाम बेदवती था, इनके बचपन का नाम वासुदेव (भीम) था इनके लिए खिा गया कि ये पवन देवता की आज्ञा से धर्मपालन के लिए संसार में आए थे आपने बचपन में अनन्तेस्वर मठ में वेदों का अध्ययन किया व नौ वर्ष की आयु में सन्यास ग्रहन कर लिया । प्रारम्भ में ये जगद् गुरू शंकराचार्य जी के शिष्य बन गए व इनका मध्व नाम दिया गया ।

इन्होंने छोटी सी उम्र में ‘गीता भाष्य‘ का निर्माण कर बद्रिकाश्रम में वेदव्यास जी को अर्पण किया जिससे खुश होकर वेदव्यास जी ने इनको राम व शालिग्राम की मूर्तियां दी जिनको इन्होंने सुबह्मण्य, उदीपी और मध्यतल के तीनों स्थानों में स्थापना की ।

गुरू आज्ञानुसार :-

जगद्गुरू शंकराचार्य ने अपने चारों शिष्यों को मायावाद-सप्तक्त अद्वैत सिद्वान्त शिक्षा सूत्र रहित एक दण्ड देकर सन्यास का उपदेश व धर्म प्रचार की आबश्य्कता बतलाकर विदा किया । उपरोक्त चारों शिष्यों में मधु नामक एक षिष्य था । गुरू आज्ञानुसार जब वह रात्रि में सोया तब भगवान श्री राम ने स्वप्न में दर्षन देकर उसे अपने कतग्वय का बोध कराते हुए कहा ‘‘माधो तुम तो मेरे सेवक अनुमार के वंशावतार हो व वैष्णव धर्मान्तर्गत सेव्य सेवक स्वरूप भक्ति के प्रचारार्थ भूतल पर तुम्हारा अवतार हुआ है अतः इस शंकर के मायावाद का त्याग कर तुम्हें भक्ति के सिद्वान्तों का प्रचार करना चाहिए । प्रभु की आज्ञा षिषेधार्य कर मधु ने भक्ति मग के प्रचार की प्रतिज्ञा कर शंकरचार्य के शिष्योंत्व का त्याग कर दिया व स्वयं आचार्य बन भक्तिमार्ग के प्रचार में लग गए ।

सिद्वान्त :-

मध्वाचार्य जी ने अपने सम्प्रदाय की गुरू परम्परा में लोक पितामह ब्रह्माजी को गुरू मान कर अपने सिद्वान्त को ‘‘द्वैताद्वेत‘‘ नाम से प्रख्यात किया । भक्ति के महा प्रचारक होने के कारण वे वैष्ण्प धर्म के सामान्य आचार्य माने जाने लगे उनके सम्प्रदाय द्वारा भारत में भक्ति का अधिक प्रचार हुआ । इस सम्प्रदाय को मानने वाले एक विष्णु भगवान को ही परमेश्वर जगत सष्टा व स्वतंत्र मानते है और विष्णु को स्वतंत्र परमेश्वर और जीव को परतंत्र सेवक और जगत को उसकी रचना मानते है इसलिए यह मत द्वैतवादी प्रसिद्ध हुआ । ये अन्त्यज जातियों को उपदेष देते थे परन्तु सन्यास का अधिकार ब्राह्मण का ही मानते थे ।

शास्त्र रचना:-

आपने प्रारम्भ में ‘ब्रह्म सूत्र‘ व भागवत गीता पर भाष्य लिखा व सभी प्रमुख उपनिषदों में ‘‘द्वैव वाद‘ का ही प्रतिपादन किया तथा अपने जीवन काल में लगभग 37 ग्रन्थों की रचना की जिनमें ‘प्रस्थानन्नयी‘ पर भाष्य, सूत्र भाष्य, ऋग भाष्य, इषोपनिषद भाष्य, अनुवेन्दान्त, रस प्रकरण आदि प्रमुख है।

शिष्य  :-

मध्वाचार्य जी ने कई शिष्य बनाय जिनमें 1. सत्यतीर्थ जी, 2. श्री शोभन जी भट्ट 3. श्री त्रिविक्रम जी 4. श्री रामभ्रद जी, 5. विष्णुतीर्थ, 6. श्री गोविन्द जी शास्त्री, 7. पद्मनाभाचार्य जी, 8. जयतीर्थाचार्य, 9. व्यासराज स्वामी, 10. श्री रामाचार्य जी 11. श्री राघवेन्द्र स्वामी, 12. श्री विदेह तीर्थ जी आदि कई शिष्य ने वैष्णव धर्म का प्रचार किया ।

द्वारे:-

श्री मध्याचार्य जी सम्प्रदाय के वर्तमान द्वारा एक पश्चिम बंगाल में नदिया शान्तिपुर के नित्यानंदी द्वारे में श्री माधवेन्द्र पुरी जी स्थित है व दुसरा वृन्दावन (मथुरा) के श्यामानन्दी द्वार में हृदयचेत्यन जी स्थित है ।

हरिदासा आंदोलन:-

कर्नाटक के हरिदास के भक्ति आंदोलन में माधव की धार्मिक सोच की अभिव्यक्ति थी। माधव द्वारा शुरू किए गए हरिदास आंदोलन का देश के विभिन्न हिस्सों में लोगों पर गहरा प्रभाव पड़ा है। हरिदास ज्यादातर माधव थे और लगभग विशेष रूप से ब्राह्मण समुदाय के थे।

अन्य आंदोलन:-

बंगाल वैष्णववाद के चैतन्य स्कूल पर द्वैत वेदांत विचारों का प्रभाव सबसे अधिक रहा है, जिनके भक्तों ने इंटरनेशनल सोसाइटी फॉर कृष्णा कॉन्शसनेस (इस्कॉन)  International Society for Krishna Consciousness (ISKCON) शुरू किया – जिसे हरे कृष्ण आंदोलन के रूप में जाना जाता है। और असम में भी। गुजरात वैष्णव संस्कृति भी माधव दर्शन से प्रभावित है।

संस्था :-

संस्थान मध्वाचार्य ने विभिन्न आचार्यों के विभिन्न संप्रदायों को हराकर कई मठों की स्थापना की। माधव के अनुयायी मुख्य रूप से तीन अलग-अलग समूहों में हैं, शिवल्ली ब्राह्मण, देशस्थ ब्राह्मण और गौड़ सारस्वत ब्राह्मण। इस प्रकार माधव-वैष्णव आस्था के चौबीस अलग-अलग संस्थान हैं। 17 वीं शताब्दी की पहली तिमाही में, विद्यादिशा तीर्थ (उत्तराधिकारी मठ का 16 वां मंडप) ने बिहार के गवाल ब्राह्मणों को माधव गुना में परिवर्तित कर दिया, जो अभी भी उत्तराधिकारी मठ के प्रति निष्ठा रखते हैं।

उडुपी(udupi ) का अष्ट मठ:-

माधवाचार्य के प्रत्यक्ष शिष्यों द्वारा स्थापित उडुपी के अष्ट मठ है। उडुपी का तुलु अष्ट मठ माधवाचार्य द्वारा स्थापित आठ मठों या हिंदू मठों का एक समूह है, जो हिंदू विचार के द्वैत विद्यालय के पूर्वदाता हैं। आठ मठों में से प्रत्येक के लिए, माधवाचार्य ने अपने प्रत्यक्ष शिष्यों में से एक को पहला स्वामी नियुक्त किया।

संप्रदाय आचार्यों की सूची, स्वयं कृष्ण भगवान से शुरू हुए :

  1. कृष्णा
  2. ब्रह्मा
  3. नारद मुनि
  4. व्यासदेवा
  5. मध्वाचार्य
  6. पद्मनाभ तीर्थ
  7. नरहरि तीर्थ
  8. माधव तीर्थ
  9. अक्षोभ्य तीर्थ
  10. जया तीर्थ
  11. झानासिंधु
  12. दयानिधि
  13. विद्यानिधि
  14. राजेंद्र
  15. जयधर्म
  16. पुरुसोत्तामा
  17. ब्रह्मन्य तीर्थ
  18. व्यास तीर्थ
  19. लक्ष्मीपति तीर्थ
  20. माधवेन्द्र पुरी
  21. a) ईश्वर पुरी, b) नित्यानंद प्रभु, c) अद्वैत आचार्य
  22. श्री चैतन्य महाप्रभु (गौड़ीय वैष्णववाद यहाँ से शुरू होता है) a) रूपा गोस्वामी, b) स्वरूपा दामोदर गोस्वामी, c) सनातन गोस्वामी
  23. a) रघुनाथ दास गोस्वामी, b) जीवा गोस्वामी
  24. कृष्णदासा कविराज गोस्वामी
  25. नरोत्तम दास ठाकुरा
  26. विश्वनाथ वक्रवती ठाकुर
  27. a) बलदेव विद्याभूषण, b) जगन्नाथ दास बाबाजी
  28. भक्तिविनोद ठकुरा
  29. गौरकिसोर दास बाबाजी
  30. भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठकुरा
  31. सी। भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद (A.C. Bhaktivedanta Swami Prabhupada)

ज्ञान :-

मध्वाचार्य ने जीवन की वास्तविकता समझते हुए उसे व्यावहारिक और रूचिपूर्ण बनाने का आधार अपने द्वैतवाद में प्रस्तुत किया। इनके अनुसार दो पदार्थ या तत्व प्रमुख हैं, जो स्वतंत्र और अस्वतन्त्र हैं। स्वतन्त्र तत्व परमात्मा है, जो विष्णु नाम से प्रसिद्ध है और जो सगुण तथा सविशेष है। अस्वतन्त्र तत्व जीवात्मा है। ये दोनों तत्व नित्य और अनादि हैं, जिनमें स्वाभाविक भेद है। यह भेद पाँच प्रकार का हैं, जिसे शास्त्रीय भाषा में प्रपंच कहा जाता है।

मध्वाचार्य के सिद्धान्त की रूपरेखा निम्नाँकित श्लोकों में व्यक्त की गई है- श्री मन्मध्वमते हरि: परितर: सत्यं जगत् तत्वतो,
भेदो जीवगणा हरेरनुचरा नीचोच्च भावं गता।1।
मुक्तिर्नैव सुखानुभूतिरमला भक्तिश्च तत्साधने,
ह्यक्षादि त्रितचं प्रमाण ऽ खिलाम्नावैक वेद्मो हरि:॥2॥

  1. विष्णु सर्वोच्च तत्व है।
  2. जगत सत्य है।
  3. ब्रह्म और जीव का भेद वास्तविक है।
  4. जीव ईश्वराधीन है।
  5. जीवों में तारतम्य है।
  6. आत्मा के आन्तरिक सुखों की अनुभूति ही मुक्ति है।
  7. शुद्ध और निर्मल भक्ति ही मोक्ष का साधन है।
  8. प्रत्यक्ष, अनुमान और शब्द तीन प्रमाण हैं।
  9. वेदों द्वारा ही हरि जाने जा सकते हैं।
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श्री सम्प्रदाय अति प्राचीन नाम है लेकिन अब इस संप्रदाय को इसके प्रमुख आचार्य के नाम से जाना जाता है। रामानुज सम्प्रदाय . वर्तमान में वैष्णव संप्रदाय के चारो संप्रदाय ये सभी संप्रदाय अपने प्रमुख आचार्यो के नाम से जाने जाते हैं। रामान्दाचार्य जी ने सर्व धर्म समभाव की भावना को बल देते हुए कबीर, रहीम सभी वर्णों (जाति) के व्यक्तियों को भक्ति का उपदेश किया। आगे रामानन्द संम्प्रदाय में गोस्वामी तुलसीदास हुए जिन्होने श्री रामचरितमानस की रचना करके जनसामान्य तक भगवत महिमा को पहुँचाया। इसमें श्री राम जी की पूजा होती है।

प्राचीन नाम

श्री सम्प्रदाय

वर्तमान नाम

रामानुज सम्प्रदाय

जनक और आचार्य

महालक्ष्मीदेवी – आचार्य रामानुजाचार्य

रामानुज सम्प्रदाय(श्री सम्प्रदाय)क्या है ?

श्री सम्प्रदाय (रामानुज सम्प्रदाय) हिन्दू धर्म के अन्दर वैष्णव के चार सम्प्रदायों में से एक है। यह शास्त्रीय मत हैं कि इसकी उत्पत्ति लक्ष्मीनाथ एवं श्रीमहालक्ष्मी जी की ईच्छा से हुई है। श्री विष्णु जी श्री निवास है। इससे ज्ञात होता है कि महालक्ष्मी और श्री विष्णु एक ही है। इस सम्प्रदाय में श्री शब्द का प्रयोग किया गया है। यह शब्द श्रीदेवी और महालक्ष्मी के लिए आता है। श्रीदेवी भगवान् विष्णु और मनुष्य के बीच मध्यस्थ है। विष्णुप्रिया महालक्ष्मी भक्त, भक्ति, भगवन्त, गुरु चारों को जोड़ती है। जीव को शरणागति कराकर तीनों दु:खों से मुक्ति कर देती है।

इस दिव्य परम्परा में दिव्य सोच एवं विशिष्ट ऐतिहासिक महत्व है। श्री सम्प्रदाय विशिष्टाद्वैत की दार्शनिक व्यवस्था में विश्वास करती है। स्वामी रामानुजाचार्य श्रीमन्नारायण से लेकर संसार के मानवों के बीच तक माला के सुमेर स्थान में वर्तमान है। 

लक्ष्मीनाथसमारम्भां नाथयामुनमध्यमाम्।
अस्मदाचार्यपर्यन्तां वन्दे गुरुपरम्पराम् ।।

श्री सम्प्रदाय’ ही सबसे पुरातन है। इसके अनुयायी ‘श्री वैष्णव’ कहलाते हैं। इन अनुयायियों की मान्यता है कि भगवान् । नारायण ने अपनी शक्ति श्री (लक्ष्मी) को अध्यात्म ज्ञान प्रदान किया। तदुपरांत लक्ष्मी ने वही अध्यात्मज्ञान विष्वक्सेन को और विष्क्सेन ने नम्माळवार को दिया। इसी आचार्य-परम्परा से कालांतर में रामानुज ने वह अध्यात्मज्ञान प्राप्त किया। इसके फलस्वरूप श्री रामानुज ने ‘श्री वैष्णव’ मत को प्रतिष्ठापितकर इसका प्रचार किया।

12 प्रमुख शिष्य:-

स्वामी श्रीरामानंदाचार्यजी के कुल 12प्रमुख शिष्य थे:- 1.संत श्रीअनंतानंदजी, 2.संत श्रीसुखानंदजी, 3.संत श्रीसुरासुरानंदजी, 4.संत श्रीनरहरीयानंदजी, 5.संत श्रीयोगानंदजी, 6.संत श्रीपिपानंदजी, 7.संत श्रीकबीरदासजी, 8.संत श्रीसेजान्हावीजी, 9.संत श्रीधन्नादासजी, 10.संत श्रीरविदासजी, 11.संत श्रीपद्मावतीजी और 12. संत श्रीसुरसरीजी ।।

विद्धवानों के अनुसार स्वामी श्रीरामानंदाचार्यजी की दो प्रकार की शिष्य-परम्पराएँ थीं। भक्ति का प्रचार करने वाले भक्त-कवियों में एक के प्रतिनिधि संत श्रीकबीरदासजी और दूसरी के संत श्रीतुलसीदास हुए। 

चतुः सम्प्रदाय 52द्धारा :-

यद्यपी श्रीवैष्णव सम्प्रदाय को स्वामी श्रीरामानन्दाचार्यजी ने नई पहचान प्रदान की है। उसीके तहत चतुः सम्प्रदाय 52द्धारा गोत्र प्रचलन में आए। अत एव श्रीवैष्णव सम्प्रदाय में स्वामी श्रीरामानंदाचार्यजी द्वारा स्थापित धार्मिक परम्पराओं का पालन किया जाता है। इससे पूर्व शेव एवं वैष्णव मतावलंबियों के बीच अपनी अपनी धार्मिक परम्पराओं को लेकर कई बार हिंसक विवाद भी हुए हैं। इस कड़े संघर्ष का व्यापक इतिहास रहा है।

बताया जाता है स्वामी श्रीरामानंदाचार्यजी बहुत बड़े क्रान्तीकारी विचारों के सन्त थे। जिन्होंने वर्ण व्यवस्था से परे भेदभाव रहित सर्वजनहितकारी श्रीवैष्णव सम्प्रदाय अन्तर्गत सर्वजनसुलभ उपासना पद्धति एवं नई परम्पराओं को अंगीकार किया। युगल ईष्टदेव आराधना, गुरुपरम्परा, राममंत्र, श्रीविष्णु तिलक, सिरपर चुटिया, तुलसीमाला, कंठीधारण, पित्र पादुका स्थापन सहित वैष्णवीय तीथियों, वृतोपवास उत्सव करने जैसे कई बड़े बदलाव हुए।

संप्रदाय कितने प्रकार के होते है ?

रामानंदी संप्रदाय :-

श्री(रामानुज) संप्रदाय के अंतर्गत रामानंदी संप्रदाय जिसके प्रवर्तक आचार्य श्रीरामानंदाचार्य हुए । रामान्दाचार्य जी ने सर्व धर्म समभाव की भावना को बल देते हुए कबीर, रहीम सभी वर्णों (जाति) के व्यक्तियों को भक्ति का उपदेश किया। आगे रामानन्द संम्प्रदाय में गोस्वामी तुलसीदास हुए जिन्होने श्री रामचरितमानस की रचना करके जनसामान्य तक भगवत महिमा को पहुँचाया। उनकी अन्य रचनाएँ – विनय पत्रिका, दोहावली, गीतावली, बरवै रामायण एक ज्योतिष ग्रन्थ रामाज्ञा प्रश्नावली का भी निर्माण किया। मध्यकालीन वैष्णव आचार्यों ने भक्ति के लिए सभी वर्ण और जाति के लिए मार्ग खोला, परंतु रामानंदाचार्य वर्ण व्यवस्था अनुरूप दो अलग अलग परंपरा चलायी जय हरी वैष्णव धर्म के अंदर भक्ति का प्रमुख स्थान है।

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वैष्णव सम्प्रदाय(vaishanav sampradaya), भगवान श्री विष्णु को भजने का भक्ति मार्ग का एक पथ है। जो गुरु शिष्य परंपरा के अंतर्गत आता है। कुछ का तो जन्म ही इस वंश संप्रदाय के अंतर्गत होता है फिर भी जब तक वो अपने पूर्वजो से गुरु दीक्षा मन्त्र ग्रहण नहीं करते तब तक वो पूर्ण रूप से इसमें समलित नहीं होते। इसलिए उनको सबसे पहले गुरु दीक्षा दी जाती है।

लेकिन इस संप्रदाय से कोई भी मार्गदर्शन प्राप्त कर सकता है। ये खुला द्वार है ईश्वर प्राप्ति के लिए। इस संप्रदाय के योग्य गुरु से दीक्षा प्राप्त करके वैष्णव संप्रदाय में प्रवेश मिल जाता है। क्युकी जीवन में भक्ति से भगवान पथ पे चलने के बारे में कोई योग्य गुरु ही दिशा दिखा सकते है। अगर आपका मन श्री हरि में उनके स्वरुप कृष्णा और राम जी में रमता है या श्री विष्णु के २४ अवतारों में तो इस सम्प्रदाय के गुरु आपका सही मार्गदर्शन कर सकते है।

विष्णु जी के अवतार:

शास्त्रों में विष्णु के 24 अवतार बताए हैं, लेकिन प्रमुख 10 अवतार माने जाते हैं- मत्स्य, कच्छप, वराह, नृसिंह, वामन, परशुराम, राम, कृष्ण, बु‍द्ध और कल्कि। 24 अवतारों का क्रम निम्न है-1. आदि परषु, 2. चार सनतकुमार, 3. वराह, 4. नारद, 5. नर-नारायण, 6. कपिल, 7. दत्तात्रेय, 8. याज्ञ, 9. ऋषभ, 10. पृथु, 11. मत्स्य, 12. कच्छप, 13. धन्वंतरि, 14. मोहिनी, 15. नृसिंह, 16. हयग्रीव, 17. वामन, 18. परशुराम, 19. व्यास, 20. राम, 21. बलराम, 22. कृष्ण, 23. बुद्ध और 24. कल्कि।

वर्तमान में ये सभी संप्रदाय अपने प्रमुख आचार्यो के नाम से जाने जाते हैं। यह सभी प्रमुख आचार्य दक्षिण भारत में जन्म ग्रहण किए थे। इस सम्प्रदाय के प्रधान उपास्य देव वासुदेव हैं, जिन्हें छ: गुणों ज्ञान, शक्ति, बल, वीर्य, ऐश्वर्य और तेज से सम्पन्न होने के कारण भगवान या ‘भगवत’ कहा गया है और भगवत के उपासक ‘भागवत’ कहलाते हैं।

भगवान:- विष्णु (वासुदेव) और उनके स्वरुप

 प्राचीन नाम :- ‘भागवत धर्म’ या ‘पांचरात्र मत’

वैष्णव सम्प्रदाय के प्रकार :-

रामानुजसम्प्रदाय

माध्वसम्प्रदाय

वल्लभसम्प्रदाय

निम्बार्कसम्प्रदाय

वैष्णव के बहुत से उप संप्रदाय हैं. जैसे: बैरागी, दास, रामानंद, वल्लभ, निम्बार्क, माध्व, राधावल्लभ, सखी और गौड़ीय. वैष्णव का मूलरूप आदित्य या सूर्य देव की आराधना में मिलता है.

वैष्णव संप्रदाय (विष्णु जी)

वैष्णव संप्रदाय क्या है ?

सबसे पौराणिक सम्प्रदाय है जो की भगवान विष्णु और उनके स्वरूपों को आराध्य मानने वाला सम्प्रदाय है। और ये शैव सम्प्रदाय के जितना ही दूसरा मह्त्वपूर्ण सम्प्रदाय है। इसके अन्तर्गत मूल रूप से चार संप्रदाय आते हैं। मान्यता अनुसार पौराणिक काल में विभिन्न देवी-देवताओं द्वारा वैष्णव महामंत्र दीक्षा परंपरा से इन संप्रदायों की उत्पत्ति हुए।

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वैष्णव सम्प्रदाय के प्रकार :-

इसके अन्तर्गत मूल रूप से चार संप्रदाय आते हैं।

चार संप्रदाय

श्री सम्प्रदाय

ब्रह्म सम्प्रदाय

रुद्र सम्प्रदाय

कुमार संप्रदाय

वर्तमान नाम

रामानुजसम्प्रदाय

माध्वसम्प्रदाय

वल्लभसम्प्रदाय

निम्बार्कसम्प्रदाय

इसके अलावा उत्तर भारत में आचार्य रामानन्द भी वैष्णव सम्प्रदाय के आचार्य हुए और चैतन्यमहाप्रभु भी वैष्णव आचार्य है जो बंगाल में हुए। रामान्दाचार्य जी ने सर्व धर्म समभाव की भावना को बल देते हुए कबीर, रहीम सभी वर्णों (जाति) के व्यक्तियों को सगुण भक्ति का उपदेश किया। आगे रामानन्द संम्प्रदाय में गोस्वामी तुलसीदास हुए जिन्होने श्री रामचरितमानस की रचना करके जनसामान्य तक भगवत महिमा को पहुँचाया।

चार संप्रदाय के बारे में जाने :-

वैष्णव सम्प्रदाय के ग्रंथ:-

ऋग्वेद में वैष्णव विचारधारा का उल्लेख मिलता है। 

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वैष्णव पर्व और व्रत:-

वैष्णव तीर्थ :-

वैष्णव साधु-संत:- वैष्णव साधुओं को आचार्य, संत, स्वामी आदि कहा जाता है।

वैष्णव संस्कार:- 1. वैष्णव मंदिर में विष्णु, राम और कृष्ण की मूर्तियां होती हैं। एकेश्‍वरवाद के प्रति कट्टर नहीं है। 2. इसके संन्यासी सिर मुंडाकर चोटी रखते हैं। 3. इसके अनुयायी दशाकर्म के दौरान सिर मुंडाते वक्त चोटी रखते हैं। 4. ये सभी अनुष्ठान दिन में करते हैं। 5. ये सात्विक मंत्रों को महत्व देते हैं। 6. जनेऊ धारण कर पितांबरी वस्त्र पहनते हैं और हाथ में कमंडल तथा दंडी रखते हैं। 7. वैष्णव सूर्य पर आधारित व्रत उपवास करते हैं। 8. वैष्णव दाह-संस्कार की रीति है। 9. यह चंदन का तिलक खड़ा लगाते हैं। 

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हम गौर करें तो प्रसीद्ध भक्त नरसीह मेहता के इस भजन में वैष्णव जन को बहुत ही सुन्दर तरीके से परिभाषित किया गया है-

वैष्णव जन तो तेने कहिऐ जे पीऱ पराई जाणे रे।

पर दुखे उपकार करे तो मन अभिमान न आणे रे।। वैष्णव जन …

सकल लोक मां सबहु ने वन्दे, निन्दा न करे केणी रे। 

वाच काच मन निश्चल राखे, धन-धन जननी वेणी रे।। वैष्णव जन …

समदृष्टि ने तृष्णा त्यागी, पर तीरीया जेने मात रे। 

जिव्हा थकी असत्य न बोले, पर धन न झाले हाथ रे।। वैष्णव जन …

मोह माया व्यापे नहीं जेने, दृढ़ वैराग तेने मनमा रे। 

राम नाम सू तानी लागी, सकल तीरथ तेने तनमा रे।। वैष्णव जन …

वण लोभी ने कपट रहित छे, काम क्रोध निवराया रे। 

भणे नरसि तेनु दरसन करता, कुल इकोतर तारिया रे।। वैष्णव जन …

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दशनामी संप्रदाय( dashanami sampradaya ) संन्यासी हिन्दू शैव तपस्वियों का एक सम्प्रदाय है, जिसकी स्थापना आठवीं शताब्दी के प्रसिद्ध दार्शनिक शंकराचार्य द्वारा की गई थी। यह एकांदी संन्यासियों या भटकने वाले त्यागी की परंपरा थी। जिन्होंने एक ही सहारा रखा। उन्होंने अद्वैत वेदांत परंपरा को अपने प्राकृतिक गुणों में स्वयं के अस्तित्व के रूप में वकालत करने का संकेत दिया शंकराचार्य ने दस नामों के समूह के तहत इस सम्प्रदाय की स्थापना की।

दस सम्प्रदाय :-

‘दशनामी संन्यासी’ शंकराचार्य द्वारा स्थापित 10 सम्प्रदायों (‘दशनाम’- 10 नाम) से संबंधित हैं। 10 सम्प्रदाय निम्नलिखित हैं-

  1. अरण्य
  2. आश्रम
  3. भारती
  4. गिरी
  5. पर्वत
  6. पूरी
  7. सरस्वती
  8. सागर
  9. तीर्थ
  10. वन

दस प्रकार के रोगों और उनसे जुड़े दस प्रकार की औषधियों की जानकारी के परिप्रेक्ष्य में दसनामी सम्प्रदाय को समझना चाहिये।

  1. अरण्य :- जहाँ रेन फोरेस्ट के साथ-साथ चारागाह भी होते हैं और मांसाहारी तथा हिंसक पशु भी रहते हैं वह क्षेत्र अरण्य कहा जाता है। ऐसे स्थानों पर मूत्र रोग तथा डिहाईड्रेशन से सम्बन्धित रोग अधिक होते हैं उनका निदान एवं चिकित्सा करना इनका विषय होता है।
  2. आश्रम:- आश्रम उस स्थान को कहा जाता है जहाँ अनाथों से लेकर शोधकर्ताओं तक को आश्रय दिया जाता है। इस आश्रमों को रेज़ीडेन्शियल हॉस्पिटल भी कहा जा सकता है। यहाँ असाध्य रोगों का निदान एवं चिकित्सा होती थी।
  3. भारती :- जो लोग आहार की कमी यानी कुपोषण के शिकार होते हैं उन्हें आहार में पौष्टिक तत्वों को दिये जाने की जानकारी देने वाले भारती भ्रमणशील सन्यासी होते थे। ये लोग स्वर्ण निर्माण की विद्या भी जानते थे इस विद्या का उपयोग वहाँ करते थे जहाँ पूरे क्षेत्र में अकाल पड़ जाता था।
  4. गिरी :- गिर उन पहाड़ों का कहा जाता है जो कम ऊँचे तथा हरियाली से अच्छादित होते हैं।
  5. पर्वत :- पहाड़, गिर, मेरू  इत्यादि नाम पर्यायवाची शब्द हैं। लेकिन पर्वत उन पहाड़ों को कहा जाता है जिनकी चोटियाँ ऊँची तथा पथरीली, पठारी होती है।
  6. पूरी :- जो पुर अर्थात् परकोटे यानी घिरे हुए क्षेत्र में रहने वाले बड़े गाँवों में होने वाली बीमारियों का निदान एवं चिकित्सा करते थे।
  7. सरस्वती :- जो वर्ग नृत्य, संगीत एवं वाद्य यंत्रों को बजाने वाले तथा गायक होते हैं उनमें जोड़ों एवं मांसपेशी तंत्र के रोग होते है। उनका उपचार करना इनका विषय था।
  8. सागर :- जो वर्ग सागर किनारे रहने वाला तथा समुद्री जीवों को पकड़ कर आजीविका चलाने वाली जातीय समूहों के होते हैं उनमें कुछ विशेष प्रकार के त्वचा रोग होते हैं । उनका निदान एवं चिकित्सा इनका विषय रहा है।
  9. तीर्थ :- तीर्थाटन पर आने वाले लोग विभिन्न क्षेत्र, जातीय और आर्थिक वर्गों के होते हैं। उनमें संक्रमण से होने वाले रोग होने की सम्भावना बढ़ जाती है। उनका निदान एवं चिकित्सा का विषय तीर्थ सन्यासियों का था।
  10. वन :- जहाँ रेन फोरेस्ट होता है वहाँ अत्यधिक नमी के कारण पित्त के विकार से होने वाले रोग होते हैं वहाँ के लोगों के रोगों का निदान एवं चिकित्सा का काम वन करते थे।

आज जब फोरेस्ट ईकोलोजी नष्ट हो रही है तो सर्वाधिक और सर्वोच्च ज़िम्मेदारी इसी वर्ग की बनती है आज इस वर्ग में से उन गिने-चुने लोगों को हटा दिया जाये जो वयोवृद्ध हो चुके हैं तो बाक़ी बचे लोगों में से शायद ही कोई जानता होगा कि उनकी परम्परा कितनी कठोर तप की परम्परा रही हैं। बचपन से गुरू की सेवा करते हुए वनों में घूमना और औषधीय पौधों की प्रेक्टिकल जानकारी लेना और इसके साथ-साथ सेवा भाव बनाये रखना।

कि आज की मानव सभ्यता आध्यात्मिक पतन के निम्नतम स्तर पर इसलिए है कि व्यवस्था पद्धति का प्रत्येक लेन-देन काम एवं अर्थ आधारित यानी वाणिज्य आधारित हो गया है। प्रत्येक कार्य का मिशन पक्ष समाप्त हो गया है और प्रोफेशनल पक्ष हावी हो गया है।

चार मठ :-

कहते है प्रत्येक सम्प्रदाय शंकराचार्य जी के द्वारा भारत के उत्तर, दक्षिण, पूर्व और पश्चिम भाग में स्थापित चार मठों के साथ संबंधित हैं।ये मठ हैं-

  1. ज्योति (जोशी) मठ :- हरिद्वार के निकट बद्रीनाथ, उत्तरांचल
  2. श्रंगेरी मठ :- कर्नाटक
  3. गोवर्धन मठ:- पुरी, उड़ीसा
  4. शारदा मठ:- द्वारका, गुजरात

मठों के प्रमुखों को ‘महंत‘ कहते हैं। यह ध्यान देने योग्य है कि ‘श्रंगेरी मठ‘ के प्रमुख को ‘जगद्गुरु‘ कहा जाता है। सिद्धांतों के बारे में महंतों से परामर्श किया जाता है और आम हिन्दू तथा उनके अनुयायी तपस्वी उन्हें सर्वाधिक सम्मान देते हैं।

वस्त्र या पहनावा :-

‘दशनामी संन्यासी’ विशेष प्रकार के गेरुआ वस्त्र पहनते हैं और यदि प्राप्त कर सकें तो अपने कंधे पर बाघ या शेर की खाल का आसन रखते हैं। वह माथे तथा शरीर के अन्य भागों पर श्मशान की राख से तीन धारियों का तिलक लगाते हैं और गले में 108 रुद्राक्षों की माला पहनते हैं। वे अपनी दाढ़ी बढ़ने देते हैं और बाल खुले रखते हैं, जो कंधों तक आते हैं या उन्हें सिर के ऊपर बांधते हैं।

सबसे बड़ा आकर्षण:-

कुम्भ के आयोजन में सबसे बड़ा आकर्षण दस नामी सन्यासी अखाड़ों का है। वे आदि गुरु शंकराचार्य की उस परम्परा की याद दिलाते हैं जब उन्होंने विभिन्न पन्थो में बंटे साधू समाज को संगठित किया था। कहते है तीर्थराज प्रयाग में बसी कुम्भ नगरी में धूनी रमाये बैठे दिगंबर सन्यासियों को देखकर अंदाजा लगाना मुश्किल है कि वे एक सदियों पुरानी परंपरा के स्वरूप के प्रतिनिधि हैं। वो परम्परा जिसकी नींव 9वीं सदी में आदि गुरु शंकराचार्य ने डाली थी। वही शंकराचार्य जिन्होंने ‘जगत मिथ्या, ब्रम्ह सत्यं‘ का घोष किया था। ये वो समय था जब सनातन धर्म अलग अलग इष्ट देवो के नाम पर विभिन्न सम्प्रदायों में विभाजित था और एक दूसरे से शत्रुता का भाव रखता था। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के प्रोफेसर देवी प्रसाद दुबे के मुताबिक आदि शंकराचार्य ने अद्वैत की पुनः स्थापना की और पञ्च देवोपासना में बंटे सन्यासियों को एक किया।

नागा – अखाड़ा :-

शंकराचार्य ने इन सन्यासियों को देश भर में स्थापित चारों पीठों से जोड़ा। इन्हीं सन्यासियों का एक हिस्सा नागा हो गया। उसने आकाश को अपना वस्त्र मानकर शरीर पर भभूत मला और दिगम्बर स्वरूप में रहना शुरू कर दिया। कालांतर में सन्यासियों के अलग अलग समूह बने जिन्हें अखंड कहा गया। यही अखंड शब्द बिगड़ कर अखाड़ा बन गया।

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 शिव इस नाथ सम्प्रदाय(nath Sampradaya) के प्रथम गुरु एवं आराध्य हैं। यह संप्रदाय सबसे पुराने और सबसे उल्लेखनीय संप्रदायों में से एक है। अनुयायी भगवा पहनते हैं, कभी-कभी आधे नग्न होते हैं, अपनी बाहों और शरीर को राख में धब्बा देते हैं।

नाथ शब्द :-

नाथ शब्द अति प्राचीन है । अनेक अर्थों में इसका प्रयोग वैदिक काल से ही होता रहा है । नाथ शब्द नाथृ धातु से बना है, जिसके याचना, उपताप, ऐश्वर्य, आशीर्वाद आदि अर्थ हैं –

“नाथृ नाथृ याचञोपता-पैश्वर्याशीः इति पाणिनी” ।

अतः जिसमें ऐश्वर्य, आशीर्वाद, कल्याण मिलता है वह “नाथ” है ।
‘नाथ’ शब्द का शाब्दिक अर्थ – राजा, प्रभु, स्वामी, ईश्वर, ब्रह्म, सनातन आदि भी है । इस कारण नाथ सम्प्रदाय का स्पष्टार्थ वह अनादि धर्म है, जो भुवन-त्रय की स्थिति का कारण है । श्री गोरक्ष को इसी कारण से ‘नाथ’ कहा जाता है । ‘शक्ति-संगम-तंत्र’ के अनुसार ‘ना’ शब्द का अर्थ – ‘नाथ ब्रह्म जो मोक्ष-दान में दक्ष है, उनका ज्ञान कराना हैं’ तथा ‘थ’ का अर्थ है – ‘ज्ञान के सामर्थ्य को स्थगित करने वाला’ –

नाथ सम्प्रदाय के सदस्य :-

ईश्वर अंश जीव अविनाशी की भावना रखी जाती है । नाथ सम्प्रदाय के सदस्य उपनाम जो भी लगते हों, किन्तु मूल आदिनाथ, उदयनाथ, सत्यनाथ, संतोषनाथ, अचलनाथ, कंथड़िनाथ, मत्स्येन्द्रनाथ, गोरक्षनाथ, जलंधरनाथ आदि नवनाथ चौरासी सिद्ध तथा अनन्त कोटि सिद्धों को अपने आदर्श पूर्वजों के रुप में मानते हैं । मूल नवनाथों से चौरासी सिद्ध हुए हैं और चौरासी सिद्धों से अनन्त कोटि सिद्ध हुए । एक ही ‘अभय-पंथ’ के बारह पंथ तथा अठारह पंथ हुए । एक ही निरंजन गोत्र के अनेक गोत्र हुए । अन्त में सब एक ही नाथ ब्रह्म में लीन होते हैं । सारी सृष्टि नाथब्रह्म से उत्पन्न होती है । नाथ ब्रह्म में स्थित होती हैं तथा नाथ ब्रह्म में ही लीन होती है । इस तत्त्व को जानकर शान्त भाव से ब्रह्म की उपासना करनी चाहिए ।

नाथ सम्प्रदाय के नौ मूल नाथ :-

१॰ आदिनाथ – ॐ-कार शिव, ज्योति-रुप
२॰ उदयनाथ – पार्वती, पृथ्वी रुप
३॰ सत्यनाथ – ब्रह्मा, जल रुप
४॰ संतोषनाथ – विष्णु, तेज रुप
५॰ अचलनाथ (अचम्भेनाथ) – शेषनाग, पृथ्वी भार-धारी
६॰ कंथडीनाथ – गणपति, आकाश रुप
७॰ चौरंगीनाथ – चन्द्रमा, वनस्पति रुप
८॰ मत्स्येन्द्रनाथ – माया रुप, करुणामय
९॰ गोरक्षनाथ – अयोनिशंकर त्रिनेत्र, अलक्ष्य रुप

इसमें संप्रदाय वंश को केवल गुरु और शिष्य के बीच प्रत्यक्ष दीक्षा के माध्यम से पारित किया जाता है। दीक्षा एक औपचारिक समारोह में आयोजित की जाती है और आध्यात्मिक ऊर्जा या गुरु की शक्ति का एक हिस्सा शिष्य को दिया जाता है। उन्हें औपचारिक रूप से एक नया नाम दिया गया है। नाथ सम्प्रदाय को नंदिनाथ और आदिनाथ सम्प्रदाय में व्यापक रूप से विभाजित किया गया था।

नंदिनाथ (Nandinatha Sampradaya):-

यह संत नंदिनाथ द्वारा स्थापित किया गया था जिनके बारे में कहा जाता है कि उन्होंने 8 शिष्यों को दुनिया भर में शैव सिद्धान्त दर्शन का प्रसार करने के लिए आरंभ किया था। इनमें से, दो पतंजलि और तिरुमुलर सबसे महत्वपूर्ण हैं। यह एक सिद्ध योग परंपरा है और गुरु सभी बड़ी चमत्कारिक शक्तियों के साथ सिद्ध या सात्विक आत्मा हैं। इन सिद्धों ने अपने शिष्यों की आध्यात्मिक प्रगति को तेज किया। बदले में 8 शिष्यों में हजारों शिष्य थे जिन्होंने पीढ़ियों से इस सम्प्रदाय को आगे बढ़ाया।

आदिनाथ सम्प्रदाय (Adinatha Sampradaya):-

इसे महर्षि आदिनाथ द्वारा स्थापित माना जाता है। इस परंपरा के अनुयायी संन्यास ग्रहण करते हैं, गृहस्थ जीवन का त्याग करते हैं और उसके बाद नग्न साधुओं के रूप में रहते हैं। वे लोगों द्वारा बसे हुए गुफाओं, झोपड़ियों और इमारतों में अकेले रहते हैं। वंश में ऋषि थे जिन्हें नवनाथ कहा जाता था या मत्स्येन्द्रनाथ और गोरक्षनाथ जैसे 9 शिष्य।

 मत्स्येन्द्रनाथ -:-

मत्स्येंद्रनाथ को नाथ सम्प्रदाय(nath Sampradaya) की कौला परंपरा का संस्थापक माना जाता है। उन्हें विश्व योगी कहा जाता था क्योंकि उनकी शिक्षाएँ सार्वभौमिक थीं। कहा जाता है कि भगवान शिव ने उन्हें पवित्रता बनाए रखने के लिए वायु, जल, अग्नि, पृथ्वी और आकाश के 5 तत्वों में से एक मानव रूप दिया था। उन्होंने तब उन्हें अपना सारा ज्ञान, विचार और आदर्श दिया। कौला परंपरा ईश्वर के साथ आत्मा की एकता पर केंद्रित है और आत्मज्ञान की प्राप्ति है। यह प्रेम की वकालत करता है और गुरु को समर्पण करता है, जिसमें शिष्य को अपने आत्मबल का एहसास करने के लिए अपनी शक्ति (शक्तिशाली आध्यात्मिक ऊर्जा) का प्रत्यक्ष अनुभव प्राप्त होता है। उन्होंने लया, हठ और राज योग की प्रक्रिया शुरू की।

गोरक्षनाथ या गोरखनाथ(Gorakshanath or Gorakhnath):-

वे मत्स्येंद्रनाथ के शिष्य थे और उन्हें नाथों में सबसे महान माना जाता है। उन्हें शाश्वत संत ’कहा जाता है क्योंकि उन्हें मानवता के कल्याण को देखते हुए हजारों साल तक रहने को कहा जाता है। वह इतने ऊंचे स्तर का माना जाता है कि कुछ लोग कहते हैं कि उसका स्तर उसके गुरु के मुकाबले भी है। यहां तक कि उन्हें शिव का प्रत्यक्ष अवतार भी माना जाता है। उन्होंने हठ योग का प्रचार किया जो सूक्ष्म चैनलों या नाडियों और लैया योग को सक्रिय करने के लिए आसन और सांस नियंत्रण का अभ्यास है जो ध्वनि कंपन (नाड़ी) के साथ काम करने के सिद्धांतों का उपयोग करने वाला योग है। उन्हें सर्वोच्च देवत्व की सर्वोच्च अभिव्यक्ति कहा जाता है। कुछ लोग उन्हें संत महावतार बाबाजी भी मानते हैं।

संत ज्ञानेश्वर (Sant Dnyaneshwar):-

गोरक्षनाथ को त्र्यंबकपंत पर श्रेष्ठ ज्ञान प्राप्त है, जो ज्ञानेश्वर के परदादा थे। ज्ञानेश्वर नाथ परंपरा के एक मराठी संत थे। उन्होंने आध्यात्मिक पतन, अंधविश्वास, पशु बलि और कई देवताओं की पूजा के दौरान प्रवेश किया। उन्होंने ज्ञानेश्वरी नामक मराठी में भगवद गीता लिखना शुरू किया और 15 साल की छोटी उम्र में इसे पूरा किया, ऐसा उनका आध्यात्मिक ज्ञान था। इसने गीता को आम आदमी तक पहुँचाया जो संस्कृत भाषा नहीं बल्कि केवल स्थानीय भाषा मराठी जानते थे। उन्होंने 21 वर्ष की निविदा आयु में समाधि ली।

न्होंने भक्ति आंदोलन की नींव रखी और वारकरी परंपरा का प्रचार किया, जहाँ हजारों लोग भक्ति गीत गाते हुए और पंढरपुर में नाचते हुए चले गए जहाँ भगवान विठोबा का प्रसिद्ध मंदिर स्थापित था। उन्होंने ज्ञान द्वारा निर्देशित भक्ति की वकालत की।

निम्बार्गी महाराज(Nimbargi Maharaj):-

वह भगवान दत्तात्रेय के नवनाथों में से एक, रेवननाथ के शिष्य थे। उन्होंने प्रवचन दिए और जनता के बीच भक्ति का प्रसार किया। उन्होंने निम्बार्गी सम्प्रदाय की शुरुआत की।

श्री निसरगदत्त महाराज(Shri Nisargadatta Maharaj):-

वह एक संत थे जो नवनाथ सम्प्रदाय की इंचगिरि शाखा के थे। उन्होंने माना कि मानसिक भेदभाव से व्यक्ति अंतिम वास्तविकता को जान सकता है। आध्यात्मिकता का उद्देश्य यह जानना था कि वो खुद कौन था। उन्होंने हमेशा परम प्रत्यक्षता के साथ अपने स्वयं के प्रत्यक्ष अनुभव के आधार पर सहज प्रवचन दिए। उनके अनुसार सभी समस्याओं का मूल कारण था, अहंकार के साथ मन की झूठी पहचान और किसी को गुरु के शब्दों को सुनना और वास्तविक को असत्य से अलग करने के लिए इसका अभ्यास करना है। उन्होंने कहा कि भक्ति मार्ग को प्राप्त करने के लिए सबसे अच्छा रास्ता होने की वकालत की गई थी। उनके अनुसार, ईश्वर अपनी रचना से स्वतंत्र रूप से अस्तित्व में नहीं है। उनका ज्ञान और देवत्व चमक गया क्योंकि उन्होंने जाति या पंथ के भेद के बिना जीवन के सभी क्षेत्रों से भक्तों को उपदेश दिया। उन्होंने श्रवण, मनन और निदिध्यासन की तीन गुना साधना की वकालत की- यानी गहन सत्य, तात ट्वम असि (मैं वह हूं) पर गहन श्रवण, विचार और चिंतन।

उनकी प्रसिद्ध पुस्तक famous आई एम दैट ’(I AM THAT) ने हजारों लोगों को बदल दिया, जिसमें उन्होंने उन्हें मन और भक्ति की शुद्धता के माध्यम से अंतिम वास्तविकता पर चिंतन करने के लिए कहा।

नाथ सम्प्रदाय(nath Sampradaya) के संस्थापक कौन थे?

इस सम्प्रदाय के परम्परा संस्थापक आदिनाथ स्वयं शंकर के अवतार माने जाते हैं।

नाथ सम्प्रदाय को कितनो में विभाजित किया गया था ?

नाथ सम्प्रदाय को नंदिनाथ और आदिनाथ सम्प्रदाय में व्यापक रूप से विभाजित किया गया ।

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