श्री वक्रतुण्ड गणेश-प्रमाद से मुक्ति Ganesh ji story

श्री वक्रतुण्ड गणेश-प्रमाद से मुक्ति Ganesh ji story

श्री वक्रतुण्ड गणेश जी की आराधना करने से प्रमाद से मुक्ति मिलती है। भगवान् श्री गणेश के प्रथम वक्रतुण्ड अवतार के सम्बन्ध में एक शलोक मिलता है जो इस प्रकार है –

वक्रतुण्डावताराश्च देहानां ब्रह्मधारकः |
मत्सरासुरहन्ता स सिंहवाहनगः स्मृतः ||

(भगवान् श्री गणेश का वक्रतुण्ड अवतार ब्रह्म स्वरुप से सम्पूर्ण शरीरों को धारण करने वाला है, मत्सर असुर का वध करने वाला तथा सिंह वाहन पर चलने वाला है |)

कथा:- भगवान् श्री गणेश का पहला अवतार वक्रतुण्ड का है । इसकी कथा इस प्रकार है की एक बार देवराज इन्द्र के प्रमाद से मत्सरासुर का जन्म हुआ। उसने दैत्यों के गुरु शुक्राचार्य से भगवान् शिव के पंचाक्षरी मंत्र (ॐ नमः शिवाय) की दीक्षा प्राप्त करके भगवान शिव की कठोर तपस्या की । भगवान् शिव ने उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर उसे अभय होने का वरदान दिया । वरदान प्राप्त करके जब मत्सरासुर घर लौटा तो दैत्य गुरु शुक्राचार्य ने उसे दैत्यराज नियुक्त कर दिया ।

मत्सरासुर ने दैत्यों का राजा बनते ही पद शक्ति के मद में चूर होकर प्रथ्वी पर आक्रमण कर दिया । समस्त राजा मत्सरासुर के अधीन हो गये तथा पृथ्वी पर मत्सरासुर का शासन हो गया । मत्सरासुर ने पृथ्वी के बाद पाताल और स्वर्गलोक पर भी आक्रमण करके समस्त देवो को पराजित करके अपना शासन स्थापित कर लिया |

समस्त पराजित देवता गण:-

समस्त पराजित देवता गण ब्रह्मा जी और विष्णु जी को साथ लेकर भगवान शिव की शरण में पहुचे और मत्सरासुर के अत्याचारों की गाथा सुनाई । परन्तु अहंकारी मत्सरासुर ने भगवान् शिव के कैलाश पर भी आक्रमण कर दिया मत्सरासुर और शिव जी में घोर युद्ध हुआ परन्तु शिव जी भी मत्सरासुर से समक्ष न टिक सके और उन्हें भी दैत्यराज ने अपने पाश में बाँध लिया । अब दुखी देवताओं के पास दैत्यराज के विनाश का कोई मार्ग नहीं बचा उसी समय भगवान् दत्तात्रेय वहां पहुँच गये और उन्होंने देवताओं को अक वक्रतुण्ड के एकाक्षरी मंत्र (गं) का उपदेश दिया । समस्त देवतागण भगवान् वक्रतुण्ड के उस अकाक्षरी मंत्र का जाप करने लगे । समस्त देवताओं की आराधना से संतुष्ट होकर भगवान् वक्रतुंड प्रकट हुए और समस्त देवताओं से मत्सरासुर का अहंकार तोड़ने और उसका विनाश करने का वरदान दिया ।

भगवान् वक्रतुंड ने अपने गणों के साथ मत्सरासुर के नगरो पर आक्रमण कर दिया । 5 दिनों तक भयंकर युद्ध चला इस युद्ध में मत्सरासुर के दोनों पुत्र “सुन्दरप्रिय” और “विषयप्रिय” दोनों मारे गए । इससे मत्सरासुर अधीर हो उठा और उसने युद्धभूमि में आकर भगवान् वक्रतुंड को बहुत अपशब्द कहे । भगवान् वक्रतुंड ने मत्सरासुर से कहा की तुझे अगर अपने प्राण प्रिय है तो शास्त्र त्यागकर मेरी शरण में आजा अन्यथा तेरी मृत्यु निश्चित है ।      वक्रतुंड का क्रोध रूप देख मत्सरासुर मारे भय के कापने लगा और उसकी सारी शक्ति क्षीण हो गई और विनयपूर्वक वक्रतुंड की स्तुति करने लगा इससे दयामय भगवान् वक्रतुंड प्रसन्न हुए और मत्सरासुर को अभयदान देकर अपनी भक्ति का वरदान किया तथा पाताल जाकर शांत जीवन बिताने का आदेश दिया । मत्सरासुर से निश्चित होकर देवगण वक्रतुण्ड की स्तुति करने लगे । देवतओं को स्वतन्त्र कर भगवान वक्रतुण्ड ने उन्हें भी अपनी भक्ति प्रदान की।

Leave your comment
Comment
Name
Email