क्या आप जानते है नवधा भक्ति दो बार कहीं गयी? Navdha bhakti - हमारी विरासत
क्या आप जानते है नवधा भक्ति दो बार कहीं गयी। जाने श्रीमद्भागवत पुराण और रामचरितमानस में किसने नवधा भक्ति को कहा ?

क्या आप जानते है नवधा भक्ति दो बार कहीं गयी। जाने श्रीमद्भागवत पुराण और रामचरितमानस में किसने नवधा भक्ति को कहा ?

‘नवधा’ का अर्थ है ‘नौ प्रकार से या नौ भेद’। अतः ‘नवधा भक्ति’ यानी ‘नौ प्रकार से भक्ति’। नवधा भक्ति दो युगों में दो लोगों द्वारा कही गयी थी। सतयुग में भक्त प्रहलाद द्वारा और त्रेतायुग में श्रीराम द्वारा। श्रीराम कि नवधा भक्ति प्रहलाद द्वारा कही गयी नवधा भक्ति से थोड़ा भिन्न है। आइये जानते हैं कैसे

नवधा भक्ति को दो युगों सतयुग और त्रेतायुग में बताया गया है। सतयुग में भक्त प्रहलाद ने अपने पिता हिरन्यकश्यप को नवधा भक्ति का उपदेश दिया था और त्रेतायुग में भगवान श्रीराम ने माता शबरी को नवधा भक्ति का उपदेश दिया था।
ये हम सभी जानते है की प्रह्लाद जी द्वारा कही गयी नवधा भक्ति श्रीमद्भागवत पुराण के सातवें स्कंध के पांचवे अध्याय में है। और श्री रामचरितमानस के अरण्यकाण्ड में श्रीराम ने माता शबरी को नवधा भक्ति का उपदेश दिया था। जब माता शबरी स्वयं को नीच और अधम कहते हुए प्रभु की स्तुति करने में झिझक रहीं थीं।

चलिए जानते हैं श्रीमद्भागवत महापुराण और रामचरितमानस नवधा भक्ति के बारे में क्या कहता है-

श्रीमद्भागवत महापुराण में नवधा भक्ति 

श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनम्।
अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम्।।
(श्रीमद्भा० 7 । 5। 23 ) 

श्रीमद्भागवत महापुराण में बताया गया है कि किस प्रकार नौ प्रकार से ईश्वर की आराधना कर मोक्ष प्राप्त किया जा सकता है। यदि कोई व्यक्ति इन नौ में से किसी भी एक प्रकार की भक्ति को अपने जीवन में हमेशा के लिए अपना लेता है तो मात्र इससे ही वो प्रभु के बैकुण्ठ धाम की प्राप्ति कर सकता है। यह नौ उपाय अत्यंत सरल और कारगर है। जो भक्ति पथ पे आगे बढ़ना। उनके लिए ये बहुत ही काम आता है। क्युकी शास्त्रों में ऐसा बताया जाता है कि मनुष्य जन्म का एकमात्र लक्ष्य प्रभु की प्राप्ति करना है। ऐसे में नवधा भक्ति के बहुत सरल भावों को अपनाकर आप भी भगवत्तप्राप्ति कर सकते है। आइए जानते है नवधा भक्ति के नौ भाव-navdha bhakti ke prakar

  1. श्रवण:- भगवान के चरित्र, लीला, महिमा, गुण, नाम तथा उनके प्रेम एवं प्रभावों की बातों का श्रद्धापूर्वक सदा सुनना और उसी के अनुसार आचरण करने की चेष्टा करना, श्रवण भक्ति है। भगवान के चरित्र, लीला, महिमा, गुण, नाम तथा उनके प्रेम एवं प्रभावों की बातों का श्रद्धापूर्वक सदा सुनना और उसी के अनुसार आचरण करने की चेष्टा करना, श्रवण भक्ति है। भक्ति मार्ग में श्रवण का बहुत महत्व है , क्युकी जब तक हम भगवान के बारे में सुनेंगे नहीं तब तक उनकी महिमा उनकी करुणा उनका विराट स्वरुप को कैसे जान पाएंगे।
  2. कीर्तन:- भगवान की लीला, कीर्ति, शक्ति, महिमा, चरित्र, गुण, नाम आदि का प्रेमपूर्वक करना कीर्तन भक्ति है। भगवन के नाम में अनंत शक्तियाँ है। जो भक्त को परिस्थिति में संभाल कर रखता है। नाम का कीर्तन उच्च स्वर में करते करते मन पवित्र हो जाता है।
  3. स्मरण- कहते है जो सदा अन्नय भाव से भगवान के गुण प्रभाव सहित उनके स्वरूप का चिन्तन करता है और बारम्बार उनपर मुग्ध होता है वो स्मरण भक्ति है।
  4. चरण सेवन:- भगवान के जिस रूप की उपासना करते हो, उसी का चरण सेवन करना या सब में ईश्वर को देखकर उन्हें प्रणाम करना। इस भक्ति में भगवान के चरणों की आराधना का महत्व है।
  5. पूजन:- पनी रुचि के अनुसार भगवान की किसी मूर्ति या मानसिक स्वरूप का नित्य भक्तिपूर्वक पूजन करना। नित्य दीप प्रज्जवलित कर भगवान की आरती व पूजा करना इस भक्ति के अंतर्गत आता है।
  6. वन्दन:- ईश्वर या समस्त जग को ईश्वर का स्वरूप समझकर वन्दन करना वन्दन भक्ति है।
  7. दास्य:- ईश्वर को अपना मालिक मन से स्वीकार कर स्वयं को उनका दास मान लेना दास्य भक्ति है।
  8. सख्य:-भगवान को अपना परम हितकारी मानकर उन्हें अपना दोस्त मान लेना सख्य भाव की भक्ति है।
  9. आत्मनिवेदन या समर्पण- अंहकार रहित होकर अपना सर्वस्व ईश्वर को अर्पण कर देना। स्वयं को ईश्वर को मन से सौप देना आत्मनिवेदन या समर्पण भक्ति कहलाता है।

श्रीरामचरितमानस में नवधा भक्ति :-

प्रभु श्रीराम एवं भक्त शबरी के संवाद के माध्यम से भक्तियोग का जो उल्लेख श्रीरामचरितमानस में किया गया है, वह अपने आप में बेमिसाल है। किस तरीके से एक भकत की भगवान से भेट होती। है कैसे भगवान भक्त की आस को कभी टूटने। नवधा भक्ति की व्याख्या के द्वारा संकेत किया गया है, कि मन में यदि प्रभु को पाने की आकुलता(प्यास) हो तो लिंगभेद, जातिभेद, ऊंच-नीच का भेद कुछ भी आड़े नहीं आता। क्युकी भेद – भाव भगवान की नज़रो में कभी से नहीं था ना कभी होगा। माता शबरी को प्रभु श्री राम ने नवधा भक्ति के अनमोल वचन दिए। शबरी प्रसंग से यह पता चलता है की प्रभु सदैव भाव के भूखे हैं और अन्तर की प्रीति पर रीझते हैं।

आइए जानते है नवधा भक्ति के नौ भाव-

  1. संत सत्संग:- श्रेष्ठजनों के जिस सत्संग से जड़ता, मूढ़ मान्यताएं टूटती हैं वह सत्संग सर्वोच्च कोटि का होता है। 
  2. रति:- भक्ति साधना का सबसे सुलभ मार्ग है, भगवान के लीला-प्रसंगों का चिंतन व गुणगान करना। मन को भगवान के स्वरूप में लीन करने की इसमें जबर्दस्त शक्ति है। 
  3. गुरु की सेवा-:-भारतीय अध्यात्म में गुरु को ईश्वर का दर्जा दिया गया है। गुरु के प्रति सर्वस्व समर्पण जब तक नहीं होगा, भक्ति नहीं सधेगी। श्री अरविंद कहते थे-गुरु की चेतना का शिष्य में अवतरण तभी हो पाता है जब शिष्य की चेतना भी शिखर पर हो। 
  4. भगवद् संकीर्तन करना:-श्रीमद्भागवत में बाल यति शुकदेव जी कहते हैं कलियुग में भगवान के संकीर्तन से व्यक्ति परम गति को प्राप्त हो सकता है।
  5. भगवान का मंत्रजप:- मंत्र का माहात्म्य समझकर भावपूर्वक परमात्म सत्ता में गहन विश्वास रख जब जप किया जाता है तो वह सिद्धि का मूल बन जाता है। ईश्वर को संबोधित निवेदन ही मंत्र है। विश्वासपूर्वक किया गया जप निश्चित फल देता है।
  6. इंद्रिय निग्रह:- इस भक्ति में भगवान श्रीराम ने शील की चर्चा की है। अश्लील का उलटा है शील। शील अर्थात शालीनता। जब पति-पत्नी सद्गृहस्थ के रूप में परस्पर सहमति से संयम-पूर्वक जीवनयापन करते हैं तो इसे शीलव्रत कहते हैं। 
  7. प्रत्येक जीव को परमात्म भाव से देखना:- जैसे सोना एक धातु है। उससे बने विभिन्न आभूषणों में अंगूठी-कंगन-बाजूबंद को हम अलग-अलग रूप में देखते हैं किंतु सुनार को आभूषणों में सोना ही दिखाई देता है। उसी तरह सच्चा भक्त सभी को प्रभु में और प्रभु को सभी में देखता है।
  8. यथा लाभ संतोष:- यानी जो कुछ मिल जाए उसी में संतोष, स्वप्न में भी पराये दोषों को न देखना। इसीलिए कबीरदास जी कहते हैं, ‘साईं इतना दीजिए जामे कुटुम्ब समाय। मैं भी भूखा न रहूं साधु न भूखा जाय।’ 
  9. सरलता:- सबके साथ कपटरहित बर्ताव करना व हृदय में परमात्मा का भरोसा रख किसी भी स्थिति में हर्ष व दैन्य का भाव न होना। भगवान इस अंतिम भक्ति प्रकरण में सर्वाधिक जोर सरल व निष्कपट होने पर देते हैं। ऐसा वही हो पाता है जिसकी भावनाएं ईश्वरोन्मुख हों, कामनाएं न के बराबर हों। 

Navdha bhakti chaupai:-

श्री राम की ‘नौ प्रकार से भक्ति’ से थोड़ा-सा भिन्न है। नवधा भक्ति रामायण (श्रीरामचरितमानस) के अरण्यकाण्ड में है। जब माता शबरी कहा कि मैं नीच, अधम, मंदबुद्धि हूँ, तो मैं किस प्रकार आपकी स्तुति करूँ? तब श्री राम ने उनसे कहा कि मैं तो केवल एक भक्ति ही का संबंध मानता हूँ। फिर श्री राम नवधा भक्ति कुछ इस तरह कहते हैं। तुलसीदास जी लिखते हैं :-

नवधा भगति कहउँ तोहि पाहीं। सावधान सुनु धरु मन माहीं॥
प्रथम भगति संतन्ह कर संगा। दूसरि रति मम कथा प्रसंगा॥

– श्रीरामचरितमानस अरण्यकाण्ड


अर्थात् :- मैं तुझसे अब अपनी नवधा भक्ति कहता हूँ। तू सावधान होकर सुन और मन में धारण कर। पहली भक्ति है संतों का सत्संग। दूसरी भक्ति है मेरे कथा प्रसंग में प्रेम।

गुर पद पंकज सेवा तीसरि भगति अमान।
चौथि भगति मम गुन गन करइ कपट तजि गान॥

– श्रीरामचरितमानस अरण्यकाण्ड

अर्थात् :- तीसरी भक्ति है अभिमानरहित होकर गुरु के चरण कमलों की सेवा और चौथी भक्ति यह है कि कपट छोड़कर मेरे गुण समूहों का गान करें।
गुरु के चरण कमलों की सेवा करना यह तीसरी ‘चरण सेवा’ भक्ति है। चौथी भक्ति गुण समूहों का गान यानी कीर्तन भक्ति है।

मंत्र जाप मम दृढ़ बिस्वासा। पंचम भजन सो बेद प्रकासा॥
छठ दम सील बिरति बहु करमा। निरत निरंतर सज्जन धरमा॥

– श्रीरामचरितमानस अरण्यकाण्ड


अर्थात् :- मेरे (राम) मंत्र का जाप और मुझमें दृढ़ विश्वास- यह पाँचवीं भक्ति है, जो वेदों में प्रसिद्ध है। छठी भक्ति है इंद्रियों का निग्रह, शील (अच्छा स्वभाव या चरित्र), बहुत कार्यों से वैराग्य और निरंतर संत पुरुषों के धर्म (आचरण) में लगे रहना।

सातवँ सम मोहि मय जग देखा। मोतें संत अधिक करि लेखा॥
आठवँ जथालाभ संतोषा। सपनेहुँ नहिं देखइ परदोषा॥

– श्रीरामचरितमानस अरण्यकाण्ड


अर्थात् :- सातवीं भक्ति है जगत्‌ भर को समभाव से मुझमें ओतप्रोत (राममय) देखना और संतों को मुझसे भी अधिक करके मानना। आठवीं भक्ति है जो कुछ मिल जाए, उसी में संतोष करना और स्वप्न में भी पराए दोषों को न देखना।

नवम सरल सब सन छलहीना। मम भरोस हियँ हरष न दीना॥
नव महुँ एकउ जिन्ह कें होई। नारि पुरुष सचराचर कोई॥
– श्रीरामचरितमानस अरण्यकाण्ड


अर्थात् :- नवीं भक्ति है सरलता और सबके साथ कपटरहित बर्ताव करना, हृदय में मेरा भरोसा रखना और किसी भी अवस्था में हर्ष और दैन्य (विषाद) का न होना। इन नवों में से जिनके एक भी होती है, वह स्त्री-पुरुष, जड़-चेतन कोई भी हो-

सोइ अतिसय प्रिय भामिनि मोरें। सकल प्रकार भगति दृढ़ तोरें॥
जोगि बृंद दुरलभ गति जोई। तो कहुँ आजु सुलभ भइ सोई॥
– श्रीरामचरितमानस अरण्यकाण्ड


अर्थात् :- हे भामिनि! मुझे वही अत्यंत प्रिय है। फिर तुझ में तो सभी प्रकार की भक्ति दृढ़ है। अतएव जो गति योगियों को भी दुर्लभ है, वही आज तेरे लिए सुलभ हो गई है।

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