महाशिवरात्रि(mahashivratri) की चार प्रहर पूजा का खास महत्व क्या है?

महाशिवरात्रि(mahashivratri) की चार प्रहर पूजा का खास महत्व क्या है?

महाशिवरात्रि केवल एक पर्व नहीं, बल्कि शिव और शक्ति के मिलन की वह महान निशा है, जो साधक को अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाती है। आध्यात्मिक दृष्टि से इस रात्रि का सर्वाधिक महत्व ‘महाशिवरात्रि चार प्रहर पूजा’ में निहित है। शास्त्रानुसार, शिवरात्रि की रात को चार प्रहरों में विभाजित किया गया है, और प्रत्येक प्रहर में महादेव का विशेष अभिषेक व पूजन किया जाता है। माना जाता है कि जो भक्त पूर्ण श्रद्धा के साथ महाशिवरात्रि चार प्रहर पूजा संपन्न करते हैं, उनके जीवन से समस्त पापों का नाश होता है और उन्हें धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष की प्राप्ति होती है। maha shivratri kab hai

यहाँ इसका विस्तृत महत्व दिया गया है:

1. चार पुरुषार्थों की प्राप्ति (Four Goals of Life)

हरिद्वार के विद्वानों के अनुसार, महाशिवरात्रि के चार प्रहरों की पूजा का सीधा संबंध हिंदू धर्म के चार पुरुषार्थों से है। माना जाता है कि इन चार समयों पर पूजा करने से भक्त को निम्नलिखित की सिद्धि होती है:

धर्म (Dharma): धार्मिक आचरण और कर्तव्य।

अर्थ (Artha): धन और समृद्धि।

काम (Kama): सांसारिक इच्छाओं की पूर्ति।

मोक्ष (Moksha): जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति.

2. नकारात्मकता और रोगों का नाश

तीर्थ पुरोहित उज्जवल पंडित के अनुसार, रात्रि के समय जीवन की नकारात्मक ऊर्जाएं और व्याधियां (रोग) सबसे अधिक सक्रिय होती हैं। चूंकि ये सभी भगवान शिव के वशीभूत हैं, इसलिए चार प्रहरों में पूरी रात जागरण और साधना करने से इन नकारात्मक प्रभावों और रोगों का नाश होता है.

3. पौराणिक कथा: अनजाने में की गई पूजा का फल

चार प्रहर की पूजा का महत्व ‘गुरु-द्रुह’ नामक एक भील (शिकारी) की कथा से भी जुड़ा है।

• शिकार की प्रतीक्षा में वह एक बेल के पेड़ पर बैठा था।

• अनजाने में, नींद न आए इसलिए वह पत्ते तोड़कर नीचे गिराता रहा और उसके पसीने की बूंदें भी नीचे गिरती रहीं।

• संयोग से नीचे एक शिवलिंग था। अनजाने में ही सही, उसने चारों प्रहरों में शिव का अभिषेक (जल और बेलपत्र से) कर दिया।

मोक्ष की प्राप्ति चूंकि वह रात्रि महाशिवरात्रि (Mahashivratri) की पावन रात्रि थी, भगवान शिव इस अनजाने में की गई सेवा और तप (भूखे रहने और जागने) से अत्यंत प्रसन्न हुए।

• भगवान शिव ने उसे दर्शन दिए।

• उन्होंने गुरु-द्रुह को सुख-समृद्धि का आशीर्वाद दिया और अंत में उसे मोक्ष (Salvation) प्रदान किया,।

यह कथा इस विश्वास को दृढ़ करती है कि महाशिवरात्रि के दिन यदि कोई अनजाने में भी शिव की आराधना (जागरण और उपवास) कर ले, तो उसे शिव की कृपा और मुक्ति प्राप्त होती है।

4. पूजा का समय (Timing)

यह पूजा पूरी रात चलती है और इसे चार हिस्सों में बांटा जाता है। वर्ष 2026 के लिए इसका समय इस प्रकार है:

प्रथम प्रहर: शाम 06:11 से रात 09:23 तक।

द्वितीय प्रहर: रात 09:23 से प्रातः 12:35 तक।

तृतीय प्रहर: प्रातः 12:35 से 03:47 तक।

चतुर्थ प्रहर: प्रातः 03:47 से सुबह 06:59 तक.

संक्षेप में, चार प्रहर की पूजा केवल एक अनुष्ठान नहीं, बल्कि जागरण के माध्यम से अपनी चेतना को ऊपर उठाने और जीवन के हर आयाम (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) को संतुलित करने का एक शक्तिशाली माध्यम है।

महाशिवरात्रि व्रत के दौरान पारंपरिक रूप से क्या खाया जाता है?

दिए गए स्रोतों के अनुसार, महाशिवरात्रि व्रत के दौरान खाए जाने वाले विशिष्ट भोजन (जैसे साबूदाना या कुट्टू) की सूची नहीं दी गई है। इसके विपरीत, स्रोतों में एक सख्त उपवास (Strict Fast) का वर्णन है, जिसमें भोजन का त्याग किया जाता है और अन्न अगले दिन ही ग्रहण किया जाता है।

स्रोतों के आधार पर भोजन और उपवास से जुड़े नियम यहाँ दिए गए हैं:

1. व्रत के दौरान भोजन (Fasting Rules) स्रोतों में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि महाशिवरात्रि के दिन, सुबह के अनुष्ठानों को पूरा करने के बाद, भक्त पूरे दिन उपवास रखने और “अगले दिन भोजन करने” का संकल्प लेते हैं। यह एक कठोर तप माना जाता है जहां भक्त आत्म-संयम की प्रतिज्ञा करते हैं।

2. एक दिन पहले (त्रयोदशी) महाशिवरात्रि से एक दिन पहले (संभवतः त्रयोदशी को), भक्तों को केवल एक समय भोजन करना चाहिए।

3. व्रत खोलना (पारण) भोजन मुख्य रूप से व्रत के अगले दिन ही ग्रहण किया जाता है।

• भक्तों को अगले दिन स्नान करने के बाद व्रत खोलना चाहिए।

• व्रत का अधिकतम लाभ पाने के लिए, सूर्योदय के बाद और चतुर्दशी तिथि समाप्त होने से पहले भोजन (पारण) करना चाहिए। वर्ष 2026 में यह समय 16 फरवरी को सुबह 06:59 से दोपहर 03:24 के बीच है।

4. पूजा सामग्री (खाने के लिए नहीं, बल्कि चढ़ाने के लिए) हालाँकि स्रोतों में भक्तों के खाने के लिए भोजन का उल्लेख नहीं है, लेकिन भगवान शिव को अर्पित करने के लिए निम्नलिखित वस्तुओं का उल्लेख है:

• जल, कच्चा दूध, शहद और घी।

• सुख की कामना के लिए भांग और मोक्ष के लिए धतूरा

• धन लक्ष्मी के लिए बेलपत्र

महाशिवरात्रि का व्रत निराहार (बिना भोजन के) रखने और अगले दिन ही भोजन ग्रहण करने की परंपरा पर केंद्रित है।

पूरी रात अपनी रीढ़ की हड्डी को सीधा कैसे रखे:-

महाशिवरात्रि की पूरी रात रीढ़ की हड्डी को सीधा (Spine Erect) रखने के लिए आप निम्नलिखित व्यावहारिक उपाय अपना सकते हैं। सद्गुरु (ईशा फाउंडेशन) के अनुसार, इस रात ऊर्जा का प्राकृतिक प्रवाह ऊपर की ओर होता है, इसलिए लेटने से यह प्रवाह बाधित होता है, जबकि सीधा बैठने से इसका लाभ मिलता है।

यहाँ व्यावहारिक तरीके दिए गए हैं जिनसे आप पूरी रात सक्रिय और सीधे बैठ सकते हैं:

1. चार प्रहर की पूजा का पालन करें (Follow the 4 Prahar Schedule)

एक ही बार में 12 घंटे बैठने की कोशिश न करें। इसके बजाय, रात को चार हिस्सों (प्रहर) में बांट लें और हर प्रहर में सक्रिय रूप से पूजा करें। इससे शरीर में गति बनी रहेगी और नींद नहीं आएगी।

समय सारिणी (2026 के लिए):

    ◦ प्रथम प्रहर: शाम 06:11 से रात 09:23 तक।

    ◦ द्वितीय प्रहर: रात 09:23 से 12:35 तक।

    ◦ तृतीय प्रहर: रात 12:35 से 03:47 तक।

    ◦ चतुर्थ प्रहर: सुबह 03:47 से 06:59 तक,।

लाभ: हर 3-4 घंटे में पूजा की तैयारी और अभिषेक करने से आपकी शारीरिक सक्रियता बनी रहेगी और रीढ़ अपने आप सीधी रहेगी।

2. मंत्र जाप और कीर्तन (Chanting and Bhajans)

चुपचाप बैठने से नींद आ सकती है। इसके लिए आप मंत्रों का जाप या भजन कर सकते हैं।

मंत्र: लगातार ‘ओम नमः शिवाय’ या ‘महामृत्युंजय मंत्र’ का जाप करें।

स्तोत्र: शिव तांडव स्तोत्र या शिवाष्टकम का पाठ करें, जिससे मन और मस्तिष्क दोनों जागृत रहते हैं।

• आर्ट ऑफ लिविंग और अन्य संस्थाओं में संगीत, भजन और सत्संग का आयोजन किया जाता है, जो आपको स्वाभाविक रूप से जगाए रखने में मदद करता है,।

3. ध्यान मुद्रा (Meditation Pose)

आर्ट ऑफ लिविंग के अनुसार, महाशिवरात्रि अपनी चेतना में विश्राम करने का समय है।

• जब आप पूजा न कर रहे हों, तो ध्यान मुद्रा (जैसे सिद्धासन या पद्मासन) में बैठें।

• ध्यान का संकल्प लें कि आप अपनी चेतना को ‘शिव तत्व’ (शून्यता) में लगाएंगे। जब मन ध्यान में गहरा उतरता है, तो शरीर अपने आप स्थिर और सीधा हो जाता है।

4. शाम का स्नान (Evening Bath)

स्रोतों के अनुसार, महाशिवरात्रि की शाम को (पूजा शुरू करने से पहले) दूसरा स्नान करना अनिवार्य बताया गया है।

• यह न केवल धार्मिक रूप से शुद्ध करता है, बल्कि शरीर की सुस्ती और थकान को दूर कर आपको तरोताजा करता है, जिससे रात भर सीधा बैठना आसान हो जाता है,।

5. हल्का या निराहार रहना (Fasting)

चूंकि महाशिवरात्रि पर उपवास (Fasting) का विधान है, इसलिए खाली पेट रहने से शरीर में आलस्य कम आता है। भारी भोजन करने से नींद आती है और रीढ़ झुकने लगती है। उपवास आपको सतर्क (Alert) रखने में मदद करता है,।

महाशिवरात्रि चार प्रहर पूजा: अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न:-

प्रश्न 1: क्या घर पर महाशिवरात्रि के चार प्रहर की पूजा की जा सकती है? उत्तर: हाँ, आप घर पर भी पूरी श्रद्धा के साथ चारों प्रहर की पूजा कर सकते हैं। यदि आपके पास पार्थिव शिवलिंग (मिट्टी का शिवलिंग) है, तो वह सर्वोत्तम है। अन्यथा, घर के मंदिर में मौजूद शिवलिंग का अभिषेक भी किया जा सकता है।

प्रश्न 2: यदि चारों प्रहर पूजा संभव न हो, तो क्या करें? उत्तर: यदि आप चारों प्रहर जागने में असमर्थ हैं, तो ‘निशीथ काल’ (मध्यरात्रि) की पूजा सबसे महत्वपूर्ण मानी जाती है। उस समय शिव चालीसा या ‘ॐ नमः शिवाय’ का जाप करना भी अत्यंत फलदायी होता है।

प्रश्न 3: चार प्रहर की पूजा में किन फूलों का प्रयोग करना चाहिए? उत्तर: भगवान शिव को धतूरे के फूल, सफेद आक (मदार) के फूल, और बेलपत्र बहुत प्रिय हैं। ध्यान रखें कि शिव पूजा में ‘केतकी’ के फूलों का प्रयोग वर्जित है।

प्रश्न 4: महाशिवरात्रि व्रत का पारण (Vrat Parana) कब करना चाहिए? उत्तर: शास्त्रों के अनुसार, चार प्रहर की पूजा संपन्न होने के बाद अगले दिन सूर्योदय और चतुर्दशी तिथि की समाप्ति के बीच व्रत का पारण करना सबसे शुभ होता है।

महाशिवरात्रि की यह दिव्य रात्रि हमें अपनी चेतना को जागृत करने का अवसर देती है। ‘महाशिवरात्रि चार प्रहर पूजा’ के माध्यम से हम न केवल शिव की कृपा पाते हैं, बल्कि अपने अंतर्मन की अशुद्धियों को भी दूर करते हैं।

जय भोलेनाथ!

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