यु तो हर कण कण में भगवान का निवास है। फिर वो स्थान जहाँ भगवान दिव्य शक्तियों का निवास स्थान होता है। उसे मंदिर कहते है। जहाँ जाकर मन को शांति सुकून मिलता है और भटके मन को एक राह मिलता है।
मोहन नगर मंदिर( mohan nagar mandir ) माँ दुर्गा को समर्पित है। सभी जानते है यु तो माँ के कई रूप है लेकिन 9 रूप विश्व प्रसिद्द है। मोहन नगर मंदिर में माँ दुर्गा नौ रूप अपने आशीर्वाद से अपने भक्तों का कल्याण कर रही हैं। जैसे ही प्रवेश करेंगे अंदर माँ के तीन स्वरूप माँ काली माँ सरस्वती माँ दुर्गा (लक्ष्मी ) के भव्य रूप में दर्शन होंगे।

इस मंदिर में प्रतिदिन 500 से ज्यादा श्रद्धालु आते हैं। मंदिर में सुरक्षा की दृष्टि से सीटीवी कैमरे लगाए गए हैं। मंदिर के विशाल दरबार में एक साथ 400 से ज्यादा श्रद्धालु खड़े हो सकते हैं। सावन के महीने में प्रति सोमवार दो से तीन हजार शिवभक्त यहां जलाभिषेक के लिए पहुंचते हैं। यह एक ऐतिहासिक है मंदिर इस मंदिर का इतिहास तो सैकड़ों वर्ष पुराना है लेकिन मंदिर का मौजूद स्वरूप 1978 में बनाया गया।
5:45 AM – 9:30 PM
6:30 AM: सुवह आरती
7:30 PM: संध्या आरती
कहते है श्री मनन धाम(Manan Dham) बहुत ही शांति भरा दिव्या स्थान है। मनन का अर्थ सोचना-विचार करना होता है। एक ऐसा धाम जहाँ आपका मन शांति की अवस्था में चला जाता है और जीवन की गहराइयों को ईश्वरी शक्ति के साथ नहीं दिशा मिलती है। मनन धाम श्री वैष्णो देवा माँ जी की प्रेरणा से बना है। श्री मनन धाम(Manan Dham) शास्त्र के अनुसार बहुत ही सही वास्तुकला से बना मन्दिर है। कुछ लोग इसे शंख वाला मन्दिर के नाम से भी पुकारते है। इस की भव्यता इसी से पता चलती है कि यहाँ सनातन धर्म के हर देवी देवता यहाँ स्थापित है।
स्थान-(Location):– ,ग़ाज़ियाबाद, उत्तर प्रदेश क्यों प्रसिद्ध है:- शंख वाला मन्दिर मन्दिर का शिलान्यास:- 31 जनवरी 1992 शंख का अनावरण : भूतपूर्व उपराष्ट्रपति महामहिम श्री भैरो सिंह शेखावत ने 20 जनवरी 2003
स्थान-(Location):– साहिलारा, मैहर, मध्य प्रदेश
क्यों प्रसिद्ध है:- माँ के शक्ति पीठों में से एक है यहाँ माँ सती का हार गिरा था। मैहर का मतलब है, मां का हार
ज्ञान की देवी शारदा (सरस्वती माता) का अद्भुत मंदिर जो की त्रिकुटा पहाड़ी पर स्थित है। जिसके लिए 1000 सीढ़ियों को चढ़ कर भक्तो को जाना पड़ता है। ये शारदा माँ मैहर वाली माता के नाम से भी प्रसिद्द है। दिल को छू जाना वाला दृश्य और हर कदम पे माँ की अनुभूति आपको एक अलग ही दुनिया में ले जाती है। जहाँ-जहाँ माँ सती के शव के विभिन्न अंग और आभूषण गिरे थे। यह ऐतिहासिक मंदिर 108 शक्ति पीठों में से एक है। वहां-वहां शक्ति पीठों का निर्माण हुआ। उन्हीं में से एक शक्ति पीठ है जिसका नाम मैहर देवी का मंदिर, जहां मां सती का हार गिरा था। मैहर का मतलब है, मां का हार, इसीलिये इस स्थान का नाम मैहर पड़ा।
मैहर वाली माता मंदिर के इतिहास में जाये तो जहाँ मां शारदा की मूर्ति(विग्रह) स्थापित है वही माँ के चरणों के नीचे अत्ति प्राचीन एक लेख लिखा है। एक प्राचीन शिलालेख से मूर्ति की प्राचीन प्रमाण की पहचान होती है। श्री मैहर नगर के पश्चिम दिशा की ओर चित्रकूट पर्वत में श्रद्धेय शारदा देवी तथा उनके बाईं ओर प्रतिष्ठापित श्री नरसिंह भगवान की पाषाण मूर्ति की प्राण-प्रतिष्ठा आज से लगभग 1994 वर्ष पूर्व विक्रमी संवत् 559 शक 424 चैत्र कृष्ण पक्ष चतुर्दशी, मंगलवार के दिन, ईसवी सन् 502 में तोर मान हूण के शासन काल में श्री नुपुल देव द्वारा कराई गई थी।
यहाँ हर रोज़ हजारों दर्शनार्थी आते हैं किंतु वर्ष में दोनों नवरात्रों में यहां मेला लगता है जिसमें लाखों यात्री मैहर आते हैं।
पौराणिक कथा के अनुसार 200 साल पहले मैहर में महाराज दुर्जन सिंह जुदेव नाम के राजा शासन करते थे। उन्हीं कें राज्य का एक चरवाहा गाय चराने के लिए जंगल में आया करता था। एक दिन उसने देखा कि उन्हीं गायों के साथ एक और सुनहरी गाय कहीं से आ गई और शाम होते ही वह गाय अपने आप अचानक कहीं चली गई । फिर जब दूसरे दिन वह चरवाहा इस पहाड़ी पर गायें लेकर आया, तो देखा कि फिर वही गाय इन गायों के साथ मिलकर चर रही है । तब उसने निर्णय किया कि शाम को जब यह गाय वापस जाएगी तब उसके पीछे-पीछे वह भी जाएगा गाय का पीछा करते हुए उसने देखा कि वह पहाड़ी की चोटी में स्थित गुफा में चली गई और उसके अंदर जाते ही गुफा का द्वार बंद हो गया। वह चरवाह वहीं द्वार पर बैठ गया, उसे वहां एक बूढ़ी मां के दर्शन हुए तब चरवाहे ने उस बूढ़ी से कहा, ‘माई मैं आपकी गाय को चराता हूं, इसलिए मुझे पेट के वास्ते कुछ दे दों जिससे में कुछ खा सकू।
मैं इसी इच्छा से आपके द्वार आया हूं बूढ़ी माता अंदर गई और लकड़ी के सूप में जौ के दाने उस चरवाहे को दिए और कहा, अब तू इस जंगल में अकेले न आया कर वह बोला, ‘माता मेरा तो काम ही जंगल में गाय चराना है, लेकिन आप इस जंगल में अकेली रहती हैं ? आपको डर नहीं लगता तो बूढ़ी माता ने उस चरवाहे से हंसकर कहा- बेटा यह जंगल, ऊंचे पर्वत-पहाड़ ही मेरा घर हैं, में यही निवास करती हूं इतना कह कर वह गायब हो गई ! चरवाहे ने घर आकर जौ के दाने वाली गठरी खोली, तो हैरान हो गया उसमें जौ की जगह हीरे-मोती चमक रहे थे उसने सोचा- मैं इसका क्या करूंगा सुबह होते ही राजा के दरबार में हाजिर होऊंगा और उन्हें आप बीती सुनाऊंगा दूसरे दिन दरबार में वह चरवाहा अपनी फरियाद लेकर पहुंचा और राजा के सामने पूरी आपबीती सुनाई उस चरवाहे की कहानी सुनकर राजा ने दूसरे दिन वहां जाने का कहकर, अपने महल में सोने चला गया रात में राजा को स्वप्न में चरवाहे द्वारा बताई बूढ़ी माता के दर्शन हुए और आभास हुआ कि यह आदि शक्ति मां शारदा है।
स्वप्न में माता ने महाराजा को वहां मूर्ति स्थापित करने का आदेश दिया और कहा कि मेरे दर्शन मात्र से सभी लोगों की मनोकामनाएं पूर्ण होगी सुबह होते ही राजा ने माता के आदेशानुसार सारे कार्य करवा दिए माता के दर्शनों के लिए श्रद्धालु कोसों दूरे से आने लगे और उनकी मनोवांछित मनोकामना भी पूरी होने लगी इसके बाद माता के भक्तों ने मां शारदा का विशाल मंदिर बनवा दिया।
मान्यता है कि मां ने आल्हा को उनकी भक्ति और वीरता से प्रसन्न होकर अमर होने का वरदान दिया था। लोगों की मानेंं तो आज भी रात 8 बजे मंदिर की आरती के बाद साफ-सफाई होती है और फिर मंदिर के सभी कपाट बंद कर दिए जाते हैं। इसके बावजूद जब सुबह मंदिर को पुन: खोला जाता है तो मंदिर में मां की आरती और पूजा किए जाने के सबूत मिलते हैं। आज भी यही मान्यता है कि माता शारदा के दर्शन हर दिन सबसे पहले आल्हा और ऊदल ही करते हैं।
मैहर वाली माता चालीसा श्री शारदा चालीसा | चालीसा संग्रह |(Maihar wali sharda maa chalisa) :
चालीसा अपने आप में एक बहुत ही अच्छा माध्यम है माँ को मानाने का। ये शब्द नहीं ये वो भाव है जो भक्तो के दिल की गहराइयों से निकले है। भक्तो के द्वारा गए गए भावो को गाने से माँ जल्दी प्रसन्न होती है। माँ शारदा(मैहर वाली माता )को विद्या के देवी कहा जाता है और अगर ये प्रसन्न हो जाये तो हमारे ज्ञान के रस्ते खुल जाते है।
नवरात्रि में इस मंत्र जप का आरंभ करने और आजीवन इस मंत्र का पाठ करने से विद्या और बुद्धि में वृद्धि होती है।
ॐ शारदा माता ईश्वरी मैं नित सुमरि तोय हाथ जोड़ अरजी करूं विद्या वर दे मोय।’
मां सरस्वती का सुप्रसिद्ध मंदिर मैहर में स्थित है। मैहर की शारदा माता को प्रसन्न करने का मंत्र इस प्रकार है।
‘शारदा शारदांभौजवदना, वदनाम्बुजे।
सर्वदा सर्वदास्माकमं सन्निधिमं सन्निधिमं क्रियात्।’
भावार्थ :
शरद काल में उत्पन्न कमल के समान मुखवाली और सब मनोरथों को देने वाली मां शारदा समस्त समृद्धियों के साथ मेरे मुख में सदा निवास करें। सरस्वती का बीज मंत्र ‘क्लीं’ है। शास्त्रों में क्लींकारी कामरूपिण्यै यानी ‘क्लीं’ काम रूप में पूजनीय है। नीचे दिए गए मंत्र से मनुष्य की वाणी सिद्ध हो जाती है। समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाला यह मंत्र सरस्वती का सबसे दिव्य मंत्र है। सरस्वती गायत्री मंत्र : ‘ॐ वागदैव्यै च विद्महे कामराजाय धीमहि। तन्नो देवी प्रचोदयात्।’ कहते है इस मंत्र की 5 माला का जाप करने से साक्षात मां सरस्वती(शारदा ) प्रसन्न हो जाती हैं तथा साधक को ज्ञान-विद्या का लाभ प्राप्त होना शुरू हो जाता है। 10 मिनट रोज जाप करने से स्मरण शक्ति बढ़ती है। एक बार अध्ययन करने से कंठस्थ हो जाता है।
कृपया श्री दूधेश्वरनाथ मंदिर को रेटिंग दे और मंदिर के बारे में अपने जरूर भाव लिखे।
श्री दूधेश्वरनाथ महादेव मठ मंदिर(Shri Dudheshwarnath Mahadev Temple)

श्री दूधेश्वरनाथ महादेव मठ मंदिर(Shri Dudheshwarnath Mahadev Temple) प्राचीन मंदिर है। राजधानी दिल्ली से सटे एनसीआर का गाजियाबाद अपने अंदर ना जाने कितने इतिहास समेटे हुए है। यहां के सबसे प्राचीतम मंदिर दूधेश्वरनाथ(dudheshwar nath mandir) का इतिहास लंकापति रावण के काल से जुड़ा हुआ है। इस मंदिर को लेकर कहा जाता है कि यहां पर लंकापति के पिता विश्रवा ने कठोर तप किया था। ऐसा माना जाता है कि भगवान दूधेश्वरनाथ के लगातार दर्शन करने से यहां आने वाले भक्त की सारी मुरादे पूरी होती है।
जानकारों के अनुसार छत्रपति शिवाजी महाराज ने बनवाया था ये मंदिर
पुराणों में हरनंदी (हिरण्यदा) नदी के किनारे हिरण्यगर्भ ज्योतिर्लिंग का वर्णन मिलता है, जहां पुलस्त्य के पुत्र एवं रावण के पिता विश्वश्रवा ने घोर तपस्या की थी। रावण ने भी यहां पूजा-अर्चना की थी। कालांतर में हरनंदी नदी का नाम हिंडन हो गया और हिरण्यगर्भ ज्योतिर्लिंग ही दूधेश्वर महादेव मठ मंदिर में जमीन से साढ़े तीन फीट नीचे स्थापित स्वयंभू दिव्य शिवलिंग है।
दूधेश्वर महादेव के लिए प्रचलित कथाओं में एक कथा:-
गायों के लिए भी है। बताया जाता है कि पास ही के गांव कैला की गायें जब यहां चरने के लिए आती थीं। तब टीले के ऊपर पहुंचने पर स्वतः ही दूध गिरने लगता था। इस घटना से अचंभित गांव वालों ने जब उस टीले की खुदाई की तो उन्हें वहां यह शिवलिंग मिला। गायों के दूध से अभिसिंचित होने के कारण यह दूधेश्वर या दुग्धेश्वर महादेव कहलाये।
मंदिर में महंत परम्परा बनी हुई है। इन सभी की समाधियां मंदिर प्रांगण में हैं। वर्तमान में सोलहवें श्री महंत नारायण गिरी (shri mahant narayan Giri Ji) श्री दूधेश्वर नाथ मठ महादेव मंदिर के पीठाधीश हैं।
समृद्ध श्री महंत परंपरा सभी महंतों के नाम है इस प्रकार है:-
Read About :- shri mahant narayan Giri Ji

सावन के महीने में यहां भक्तों की भारी भीड़ जुटी रहती है। दूर-दूर से कांवड़ लेकर आने वाले भक्त दूधेश्वर मंदिर में भगवान शिव की पूजा करते हैं और गंगाजल चढ़ाते हैं। शिवरात्रि का त्यौहार के अवसर पर भक्त भारी संख्या में दूधेश्वर महादेव के दर्शनों के लिए आते है। शिवरात्रि का त्यौहार को विशेष तौर मानाया जाता है।
दिव्यता से भरे इस मंदिर में कई तरीके के आकर्षण के केंद्र है जो मंदिर को और भी दिव्य बनाते हैं। यह संतों की पूजनीय भूमि है, जहां पर एक अद्भुत ही वातावरण देखने को मिलता है। यहां एक सकारात्मक उर्जा बहती है एक ऐसी वायु जहां भक्ति का जहां संतो की सिद्धियों का मिश्रण है। जो आपको परिपूर्ण भक्ति श्रद्धा से भर देती है इसी तरीके से मंदिर के कुछ आकर्षण के केंद्र हैं। जो अपनी तरफ हमें खींचते हैं वह कुछ इस प्रकार से हैं :-
कलयुग में भगवान दूधेश्वर के प्राकट्य के समय से सदैव जागृत जागृत धूना(हवन का धुप ) मठ मंदिर प्रांगण में विद्ध्यमान है। यह वही धूना है जिसको महान संत गरीब गिरी जी, महाराज इलायची गिरी जी महाराज, बाबा एतबार गिरी जी महाराज, नारायण गिरी जी महाराज, कैलाश गिरी जी महाराज, गंगा गिरी जी महाराज, दौलत गिरी जी महाराज, गुजरान गिरी जी महाराज, नित्यानंद गिरी जी महाराज आदि ने सदैव जागृत रखा। इसी के पास बैठकर तप और आराधना की भगवान दूधेश्वर की कृपा से अनोखी चमत्कार किए भक्तजनों का धर्म का पाठ पढ़ाया संस्कृति की पताका लहराया। यही वह धूना है जिसकी विभूति अनेक कष्टों का हरण करने वाली है। Read More
श्री दूधेश्वरनाथ महादेव मठ मंदिर के अति प्राचीन व पावन परिसर में स्थापित ठाकुर द्वारा प्राचीन दिव्य प्रतिमाओं के दिव्य आलोक से अलंकृत है। यहां पर भव्य प्रतिमाएं हैं। श्री ठाकुरद्वारा के विशाल हॉल के बीच में कुआं आज भी स्थापित है। जिसका जल बहुत ही चमत्कारी है, कभी खारा, कभी मीठा और कभी-2 दूध के स्वाद वाला हो जाता है। मठ मंदिर से जुड़े सभी सिद्ध संतों व श्री महंतो ने इस दिव्य कुआं के चमत्कारी चल के स्वाद को भी चखा है।
मंदिर परिसर में पीपल की प्राचीन विशाल वृक्ष के निकट नवग्रह मंदिर स्थापित है। बृहस्पति, बुध, सूर्य, सोम, मंगल, राहु, शनि, केतु व शुक्र की प्रतिमाओं के साथ प्रथम पूज्य विघ्न विनाशक श्री गणेश जी की भव्य प्रतिमा नवग्रह मंदिर में स्थापित है। अखंड ज्योति के प्रकाश से मंदिर सदैव जगमगाता रहता है। ग्रह शांति के लिए भक्तगण यहां निरंतर पूजा-अर्चना भी करते हैं। रुष्ट ग्रह को मनाने के मंत्र भी यहां गृह मूर्तियों के समक्ष पत्थर पर लिखे गए हैं। यहाँ अद्भुत छवि देखने को मिलती हैं।

भगवान दूधेश्वर का भव्य श्रृंगार भक्तो के लिए मुख्य आकर्षण का केंद्र है। प्रत्येक सोमवार को श्री महंत नारायण गिरी जी के संरक्षण में बनी श्रृंगार समिति के सदस्य द्वारा भगवान दूधेश्वर का भव्य श्रृंगार किया जाता है। श्रृंगार में विभिन्न प्रकार के पकवान में स्थान ऋतु फल अन्य सामग्रियों का उपयोग किया जाता है। भगवान दूधेश्वर का श्रृंगार इतना भव्य होता है कि दूर-दूर से भक्तगण का दर्शन करने आता और श्रृंगार दर्शन करने होते हैं।
प्रत्येक सोमवार के अतिरिक्त विभिन्न पर्वों यथा शिवरात्रि आदि पर भी भगवान दूधेश्वर कि श्रृंगार दर्शन होते हैं। विशिष्ट अवसरों पर किए गए सिंगार की शोभा निराली होती हैं। अनेक भक्त ऐसे हैं जिनके पास श्रृंगार दर्शन के सभी चित्र सहित है सभी देशभक्त सिंगार दर्शन की छटा को निहारते नहीं थकते इन सबके अतिरिक्त मंदिर परिसर में मां दुर्गा की प्रतिमा भगवान के भक्तों के आकर्षण का मुख्य केंद्र है।
मठ मंदिर प्रांगण में सारे वर्ष उत्साह का वातावरण रहता रहता है। वर्ष में होने वाले सभी मुख्य पर्व उत्सव अन्य धार्मिक सामाजिक आयोजन का श्री गौरी गिरी दूधेश्वर नाथ महादेव मठ मंदिर समिति द्वारा सुचारू रूप से किया जाता है। इन समस्त आयोजन में भक्तगण संपूर्ण श्रद्धा व आस्था के साथ सम्मिलित होकर धर्म लाभ को प्राप्त करते हैं
नववर्ष की शुरुआत चैत्र नवरात्र से होती है। इस अवसर पर मां भगवती दुर्गा के नौ रूपों का नौ दिवसीय आराधना होती है। यहां पर विभिन्न तरीके के अनुष्ठान होते हैं जो की बहुत ही दिव्य और भव्य होते है।
हनुमान जयंती चैत्र मास की पूर्णिमा को नगर के मध्य चौपला स्थित श्री सिद्ध हनुमान मंदिर पर हनुमान भक्तों द्वारा धूमधाम से हनुमान जयंती मनाई जाती है इस दिन प्रात काल रामचरितमानस सुंदरकांड का भक्ति दुर्गा पाठ किया जाता है वह रात्रि में भक्ति भाव से संकीर्तन होता है।
इस अवसर पर प्रातः हनुमान जी का का छठी पूजन किया जाता है। बाद में कढ़ी चावल का प्रसाद भक्तों में वितरित किया जाता है।
प्रतिवर्ष वैशाख मास में अक्षय तृतीया को प्रातः हवन द्वारा भगवान परशुराम की जयंती विधि विधान से मनाई जाती हैं। अखिल भारतीय ब्राह्मण महासभा के पदाधिकारियों व सदस्यों द्वारा इस अवसर पर मंदिर प्रांगण स्थित प्राचीन हवन कुंड में विश्व शांति हेतु या किया जाता है।
श्री शंकराचार्य जयंती प्रतिवर्ष वैशाख शुक्ल पंचमी को भगवान शंकराचार्य जी की जयंती का आयोजन मंदिर प्रांगण में किया जाता है। भारत भूमि के चार दिशाओं में चार मठ स्थापित कराने वाले आदि शंकराचार्य की जयंती को पुनीत अवसर पर मंदिर प्रांगण में बहुत ही हर्षोल्लास से मनाया जाता है।
गुरु पूर्णिमा आषाढ़ मास की पूर्णिमा को यह उत्सव पारंपरिक उल्लास के साथ मनाया जाता है। इस दिवस पर गुरु अथवा आचार्य की पूजा करने की विशेष महत्व है। गुरु को ब्रह्मा विष्णु और शिव के समान देवता समझ कर पूजा करने की पद्धति हिंदू धर्म की विशेषता है। गुरु दत्तात्रेय जी की विधि विधान से पूजा किया जाता है।
इस दिन श्री महंत नारायण गिरी जी महाराज प्राचीन गुरु गद्दी पर विराजमान होते हैं। उनके शिष्य गण उनकी पूजा-अर्चना करके उनके चरणों में यथाशक्ति यथा समार्थ्य दक्षिणा भेट करते हैं और आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। और अपने मंगल जीवन की शुभकामना उनसे प्राप्त करते हैं।
आषाढ़ मास की हरिशयनी एकदशी से वर्ष कालीन चातुर्मास व्रत प्रारंभ होता है। इस व्रत के दौरान मठ मंदिर के सन्यासी का नदी पार का आवरण बंद रहता है। पुराणों के मतानुसार भगवान विष्णु आषाढ़ शुक्ल एकादशी को 4 मास के अखंड निंद्रा ग्रहण करते हैं और 4 मास बाद कार्तिक शुक्ल एकादशी को निद्रा त्याग करते हैं। चातुर्मास भक्ति के लिए आराधना के लिए और अध्यात्म शक्ति जागृत करने के लिए बहुत ही उत्तम समय होता है। इसका सभी भक्तजनों को जरूर लाभ उठाना चाहिए।
आशुतोष भगवान् भोलेनाथ शिव जी को श्रावण मास अत्यंत प्रिय है। श्रावण में पार्थिव शिव पूजा का विशेष महत्व है। भगवान शिव को जितना प्रिय सोमवार है उसे कई गुना सावन का सोमवार उससे भी अधिक प्रिय पूरा श्रावण मास है। गुरु पूर्णिमा के अगले ही दिन से 1 माह का आयोजन अपने विशाल स्वरूप में ऐतिहासिक सिद्धपीठ श्री दूधेश्वर नाथ महादेव मठ मंदिर में पूरे उत्साह उल्लास के साथ मनाया जाता है। श्रावण मास की कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी चतुर्दशी को लाखों श्रद्धालु देशभक्त सिंदूर गंगोत्री व हरिद्वार से पतित पावनी गंगा का जल काँवर में रख कर लाते है।
इस गंगाजल से यह भक्तगण बम बम, हर हर जय दूधेश्वर का उद्घोष करते हुए भगवान दूधेश्वर का अभिषेक कर के तृप्त होते हैं। उनका आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। इस अवसर पर संपूर्ण महानगर शिवमय हो जाता है , मठ मंदिर द्वारा अत्यंत ही सुंदर सुविधा की जाती हैं प्रशासन तथा पुलिस प्रशासन के अतिरिक्त अन्य स्वयंसेवी संस्थाएं मंदिर समिति का सहयोग करती हैं जो कि अपने आप में अद्भुत है।
कार्तिक शुक्ल चतुर्दशी वैकुंठ चतुर्दशी को कलयुग में भी श्री दूधेश्वर नाथ महादेव के प्रकृति का महोत्सव धूमधाम से मनाया जाता है। इस अवसर पर मंदिर प्रांगण में आयोजित भव्य समारोह में देश की जाने वाले सिद्ध संत सम्मिलित होकर भगवान दूधेश्वर के पट्टे की चर्चा करते हुए भगवान शिव का गुणगान करते हैं। श्री महंत नारायण गिरी जी महाराज द्वारा स्थापित परंपरा के निर्वहन में देशभक्त पूरी श्रद्धा व मन से शामिल होते हैं।


श्रद्धा भाव से की गई आराधना नाथ तक जरूर पहुँचती है। उनकी आराधना के लिए आपको दूधेश्वर नाथ मंदिर प्रागण के अंदर ही पूजा के लिए सामग्री मिल जाएगी। उसमे निम्न प्रकार के सामान होते है :-
दूध, गंगा जल, फूल, बेलपत्र, नारियल गोला, फूल माला, मिश्री और फल
अगर आप पूजा किसी विद्वान या पंडित जी से करवाना चाहते है तो आपको मंदिर में ही पंडित जी मिल जायेंगे जो आपकी विधिवत पूजा करवाते है।
दूधेश्वर महादेव मंदिर आरती– dudheshwar mahadev aarti
दूधेश्वर महादेव मंत्र:
“दुग्धेश्वराय नमः शिवाय “
ऐसा महामंत्र है जिसका निरंतर जीवन को सुखमय बना देता है और भक्तिमय बना देता है। जिससे एक आध्यात्मिक पथ का रास्ता मिलता है राह मिलता है जिससे हम अपने जीवन के कर्म को की सही ढंग से कर पते है और साथ ही सही दिशा में चल पाते है।
दूधेश्वर महादेव शिव चालीसा
मन्दिर समय सारिणी
| शीतकालीन | ग्रीष्मकालीन | |
| सुबह मन्दिर के मुख्याद्वार खुलने का समय | प्रातः03:00 | प्रातः 03:00 |
| प्रातःकाल आरती का समय | प्रातः04:00 | प्रातः 04:00 |
| सुबह भोग का समय | प्रातः11:30 | प्रातः11:30 |
| दोपहर मुख्याद्वार बन्द होने का समय | दोपहर 01:00 | दोपहर 01:00 |
| सांयकाल मुख्याद्वार खुलने का समय | सांय 04:00 | सांय 04:00 |
| सांयकाल आरती का समय | सूर्यास्त अनुसार | सूर्यास्त अनुसार |
| सांयकाल मुख्याद्वार बन्द होने का समय | आधा घंटा पूर्व सोमवार 1 घंटा पूर्व | आधा घंटा पूर्व सोमवार 1 घंटा पूर्व |
| रात्रिकालीन भोग का समय | रात्रि 08:00 | रात्रि 08:00 |
| रात्रिकालीन मुख्याद्वार बन्द होने का समय | रात्रि 11:00 | रात्रि 10:30 |
| नोट:- कार्यक्रम के अनुसार समय बदलाब सम्भव है|शीतकाल में सांय आरती 06:00 और 06:30 बजे, ग्रीष्मकाल में सांय आरती 07:00 और 07:30 बजे होगी| |
श्री धर्मपाल गर्ग जी और श्रीमती गिन्नी गर्ग मंदिर विकास समिति के अध्यक्ष है। श्री दूधेश्वर पीठाधीश्वर श्रीमहंत नारायण गिरी जी ने श्री धर्मपाल गर्ग जी की शिव भक्ति ,दृढ संकल्प शक्ति ,कर्मठता और अदभुत लगन को देखते हुए उन्हें मंदिर विकास समिति का अध्यक्ष नियुक्त कर दिया | अब श्री धर्मपाल जी मठ मंदिर परिसर को एक ऐसा रूप देने की योजना को मूर्तरूप देने में प्रयासरत हैं जिससे यह धर्म स्थल देश ही नहीं वरन विश्व में एक दिव्य व भव्य रूप में धार्मिक व आध्यात्मिक मानचित्र पर उभरे | मंदिर के सेवा अधिकारियों के नाम..Read More
परेशानी में मंदिर आने वाले लोग लगभग दस फीसदी ही होते हैं। इससे ज्यादा हो बाकी तो श्रद्धा के कारण ही आते हैं। हमारा दर्शन कहता है कि आत्मा परमात्मा का ही अंश है। शायद इसलिए हमें उसके सामने जाकर एक शांति और सुकून का अनुभव होता है। जब भूख लगे तो हम खाना खाकर अपनी तृप्ति कर सकते है लेकिन जब हमारी आत्मा को प्यास लगती है तो उसकी प्यास केवल भगवान के दर्शन से ही मिटती है। इसलिए सहज तौर पर ज्यादातर लोग अपने जीवन की पूर्णता ईश्वर के साथ जुड़ने में मानते हैं। यही श्रद्धा, समर्पण व विश्वास उन्हें धार्मिक स्थलों तक लेकर आते हैं।
श्री दूधेश्वर नाथ मठ महादेव मंदिर सेवा में सर्वोपरि है। निरंतर यहाँ सेवा का काम चलता रहता। अगर आप इसमें अपना सहयोग देना चाहते है तो दे सकते है। इस लिंक पे क्लिक करके आप देख सकते है।
हमारा देश विरासतों से आध्यात्मिक विरासतों से भरा है श्री दूधेश्वरनाथ महादेव मठ मंदिर(Shri Dudheshwarnath Mahadev Temple) प्राचीन मंदिर हमारी विरासत का एक अंश है। आइये,अपनी धरोहर, हमारी विरासत, पूर्वजों पर गौरव करें।
मुज़फ्फरनगर जिले के शुक्रताल स्थित हनुमतधाम का निर्माण 1987 में हुआ था। हनुमान जी की 72 फीट ऊँची मूर्ति श्री सुदर्शन सिंह चक्र और इंदर कुमार ने स्थापित की थी। यह मूर्ति सहडोल के श्री केशव राम द्वारा बनाई गई थी और उसका उद्घाटन स्वामी कल्याणदेव महाराज ने किया था। मूर्ति के सामने, यज्ञशाला का एक खुला आंगन है और दूसरी तरफ कथा -मंच है। मूर्ति के पीछे, भगवान राम, श्री राधा कृष्ण के मंदिर और श्री सुदर्शन चक्र की एक झोपड़ी हैं।
राजा परीक्षित को शाप मिलना
एक बार राजा परीक्षित जंगल में शिकार खेलने गये. शिकार की तलाश में घूमते-घूमते वे भूख-प्यास से पीड़ित हो गये. पानी तलाश करते-करते वे शमीक मुनि के आश्रम में पहुँचे जहां पर मुनि समाधिस्थ थे. राजा ने कई बार मुनि से पानी की याचना की, परंतु कोई उत्तर न मिलने पर, राजा ने एक मरे हुए साँप को धनुष की नोंक से उठाकर, शमीक मुनि के गले में डाल दिया, परंतु शमीक मुनि को समाधि में होने के कारण इस घटना का कोई भान ही नहीं हुआ.
शमीक मुनि के पुत्र श्रृंगी ऋषि को जब यह पता लगा तो उन्होंने गुस्से से हाथ में जल लेकर राजा को शाप दे दिया कि जिसने भी मेरे पिता के गले में मरा हुआ साँप डाला है आज से सातवें दिन इसी सांप (तक्षक) के काटने से उसकी मृत्यु हो जायेगी.
वह अपने पिता के गले में मरा हुआ सांप पड़ा देखकर जोर- जोर से रोने भी लगे. रोने की आवाज सुनकर शमीक मुनि की समाधि खुली और उन्हें सब समाचार विदित हुए. मुनि ने श्रृंगी से दुःखपूर्वक कहा कि वह हमारे देश का राजा है और समझाया कि राजा के पास सत्ता का बल होता है. राजा उस सत्ता के बल का दुरुपयोग कर सकता है, परंतु ऋषि के पास साधना का बल होता है और ऋषि को साधना के बल का दुरुपयोग नहीं करना चाहिए. अत: राजा को तुम्हें शाप नहीं देना चाहिए था.
श्राप ने कैसे राजा का जीवन ही परिवर्तित कर दिया:-
राजा परीक्षित को जब श्राप के बारे में पता लगा तब उन्हें अपनी गलती का भान हुआ. वे अपने पुत्र जनमेजय को राजपाट सौंपकर हस्तिनापुर से शुकताल पहुँच गये. गंगा जी के तट पर वट वृक्ष के नीचे बैठ कर राजा परीक्षित श्रीकृष्ण भगवान का ध्यान करने लगे. वहीं परम तेजस्वी शुकदेव जी प्रकट हुए और अनेक ऋषि-मुनियों के मध्य एक शिला पर आकर बैठ गये. मातृ-शुद्धि(माता के कुल की महानता), पितृ-शुद्धि (पिता के कुल की महानता), द्रव्य-शुद्धि (सम्पत्ति का सदुपयोग) अन्न-शुद्धि और आत्म-शुद्धि (आत्मज्ञान की जिज्ञासा) एवं गुरु कृपा के कारण ही परीक्षित जी भागवत कथा सुनने के अधिकारी हुए.
हम सभी के जीवन में भी क्यों सिर्फ सात दिन है:-
परीक्षित को सात दिनों में मृत्यु का भय था. सप्ताह के सात दिन होते हैं. किसी न किसी दिन हमारी भी मृत्यु निश्चित है. परंतु ये सात वार हमारे जीवन का मार्गदर्शन करते हैं. यदि सकारात्मक रूप से देखें तो हमको इन सात वारों से सुन्दर शिक्षा मिलती है. राजा परीक्षित श्राप मिलते ही मरने की तैयारी करने लगते हैं. इस बीच उन्हें व्यासजी उनकी मुक्ति के लिए श्रीमद्भागवत्कथा सुनाते हैं. व्यास जी उन्हें बताते हैं कि मृत्यु ही इस संसार का एकमात्र सत्य है.
अक्षय वट वृक्ष के नीचे गंगा तट के समीप शुक देव जी ने राजा परीक्षित को श्रीमद भागवत सुनाया था। और वो मुक्त हो गए और सीधा भगवान चरणों में चले गए और तक्षक उनका कुछ भी नहीं बिगाड़ पाया। इसलिए तब से ये स्थान शुक्रताल के तीर्थ स्थल के रूप में जाने जाना लगा।

दामोदर और भैरवी के संगम स्थल के समीप ही मां छिन्नमस्तिके का मंदिर(Rajrappa Temple) स्थित है। मंदिर की उत्तरी दीवार के साथ रखे एक शिलाखंड पर दक्षिण की ओर मुख किए माता छिन्नमस्तिके का दिव्य रूप अंकित है। मंदिर के निर्माण काल के बारे में पुरातात्विक विशेषज्ञों में मतभेद है। किसी के अनुसार मंदिर का निर्माण 6,000 वर्ष पहले हुआ था तो कोई इसे महाभारत युग का मानता है। यह दुनिया के दूसरे सबसे बड़े शक्तिपीठ के रूप में जाना जाता है।
मंदिर के आसपास ही फल-फूल, प्रसाद की कई छोटी-छोटी दुकानें हैं। आमतौर पर लोग यहां सुबह आते हैं और दिनभर पूजा-पाठ और मंदिरों के दर्शन करने के बाद शाम होने से पूर्व ही लौट जाते हैं। ठहरने की अच्छी सुविधा यहां अभी उपलब्ध नहीं हो पाई है।
ऐसा माना जाता है कि भगवान राम के 14 वर्षों के दौरान, लक्ष्मण और maa सीता नासिक के पंचवटी (sita gufa nashik ) क्षेत्र में रहे। पूरे पंचवटी क्षेत्र लगभग 5 किमी है। पंचवटी(panchavati) का शाब्दिक अर्थ 5 (पंच) बरगद के पेड़ (वट पेड़) है।
ये पांच प्राचीन बरगद के पेड़ अभी भी सीता गुफा के आसपास स्थित हैं और संख्याओं के साथ चिह्नित हैं, ताकि आप उन्हें आसानी से पहचान सकें। नीचे एक बरगद के पेड़ की तस्वीर है जो सीता गुफा(Sita gufa) / गुफा मंदिर के ठीक सामने है।
आप आसानी से इस मंदिर को पहचान सकते हैं। यह मंदिर ज्यादा बड़ा तो नहीं लेकिन यह आध्यात्मिक ऊर्जा से परिपूर्ण है क्योंकि सीता मैया ने यहां पर तपस्या,आराधना बनवास के समय में की थी। इसीलिए एक अलग तरीके की आध्यात्मिक ऊर्जा आपको महसूस करने को मिलेगी जो कि आपके मन में भक्ति और प्रेम का प्रवाह कर देगी। यह सीता गुफा नासिक में पंचवटी क्षेत्र के अंदर ही आता है। गुफा के अंदर जाने में 20 मिनट से एक घंटे लग सकते हैं।
आपको इसके अंदर जाने के लिए नीचे झुकना होगा। और आपको एक बराबर गुफा की छत नहीं मिलेगी कही आपको ऊपर तो कही निचे ऐसी मिलेगी। इसलिए ज्यादातर लोग कदम पर बैठते हैं और गुफा के अंदर जाते हैं। गुफा की ऊंचाई लगभग 2.5 से 3 फीट है और जब आप अंदर जाते हैं तो यह छोटा होते जाता है। बहुत मोटे लोगों या जिन लोगों को सांस लेने में गुफा का दौरा करते समय में समस्या हो सकती है।
जगह को और अधिक देखभाल और सुरक्षा की जरूरत है। आपके चप्पल को उतारने के लिए कोई विशष स्थान नहीं है। तो आप इसे बाहर छोड़ सकते हैं। गुफा परिसर के पीछे, थाली भोजन लगभग 60 आईएनआर में परोसा जाता है।
क्यों पड़ा कालाराम नाम भगवान् श्रीराम का और बनवास के समय कहाँ थी उनकी कुटिया?
जब लक्ष्मण ने सुरपानखा की नाक काट दिया तो 10,000 राक्षस भगवान राम और लक्ष्मण से लड़ने आए। उस समय पंचवटी एक घने जंगल थे। इसलिए मा सीता, राम और लक्ष्मण को छुपाने के लिए एक रात में यह गुफा बनाया गया। एक पहचान चिह्न के रूप में उन्होंने इन 5 बरगद के पेड़ लगाए।
panchavati nashik
कालाराम मंदिर, सुंदरनारायण मंदिर और सीता गुफा प्रसिद्द है।
(पंच) बरगद के पेड़ (वट पेड़) है। ये पांच प्राचीन बरगद के पेड़ अभी भी सीता गुफा के आसपास स्थित हैं .