परिक्रमा

एक ऐसा मार्ग जिसपर चल कर भगवान की साक्षात् अनुभूति होती है।

परिक्रमा या प्रदक्षिणा दिव्य शक्तियों या भगवान की या किसी दिव्य स्थलों की धार्मिक/आध्यात्मिक स्थलों की जाती है। जिस की मान्यता सदियों पुरानी है। जिसका वर्णन हमारे वेदो में धर्म ग्रंथो में मिलता है। हमारे देश में कई ऐसे धार्मिक स्थल है। जिसकी परिक्रमा का अनंत गुना फल है। निचे उनसे सभी परिक्रमा की लिस्ट(List of all parikrama) है। जो अलग अलग स्थानों पे है। जिसके बारे में आप जान सकते है और उसके आध्यात्मिक -सांस्कृतिक महत्व की गहराइयों को समझ सकते है।

निवेदन:- हर साल देव दीपावली (नवंबर महीने के आसपास) के मौके पर यात्रा निकलेगी। गुजरात और अन्य राज्यों के हजारों लोग गिरनार यात्रा में हिस्सा लेते हैं। गिरनार परिक्रमा (Girnar Parikrama) की लंबाई लगभग 38 किमी है। रूपायतन से शुरू होकर गिरनार तेली में समाप्त। परिक्रमा / यात्रा का मार्ग गिर वन क्षेत्र में है और केवल परिक्रमा के दौरान 5-10 दिनों के लिए खुलता है। गिरनार की परिक्रमा अध्यात्म से जुड़ी परिक्रमा है भक्त और भगवान से जुड़ी हुई परिक्रमा है। आज हम गिरनार की परिक्रमा के बारे में जानेंगे क्यों यह अपनी जगह पर महत्वपूर्ण रखता है क्यों इस पीढ़ी को और आने वाली पीढ़ी को इसके महत्व की गहराई को समझना चाहिए।

“जानकारी अच्छी लगे तो सभी से शेयर जरूर करे क्युकी आज हमारी खोती हुई भारतीय संस्कृति जो विरासत में मिली उसको को प्रसार की जरुरत है जिससे आने वाली पीढ़ियों तक इसकी चमक पहुंच सके। और अपनी मातृभाषा हिंदी पे हमेशा गर्व कीजिये और इसका सम्मान-प्रसार जरूर कीजिये। “

गिरनार परिक्रमा क्या है ?

गिरनार परिक्रमा भगवान दत्तात्रेय की परिक्रमा है जिनका निवास गिरनार पर्वत पे है। हिंदू धर्म के त्रिदेव ब्रह्मा, विष्णु और महेश की प्रचलित विचारधारा के विलय के लिए ही भगवान दत्तात्रेय ने जन्म लिया था, इसीलिए उन्हें त्रिदेव का स्वरूप भी कहा जाता है।

गिरनार परिक्रमा कब की जाती है ?

हर साल देव दीपावली या कार्तिक सूद के अवसर पर गिरनार परिक्रमा या प्रदक्षिणा के नाम से विशेष यात्रा निकाली जाती है। गुजरात और अन्य राज्यों के हजारों लोग गिरनार यात्रा में हिस्सा लेते हैं। एक धार्मिक दृष्टिकोण के अलावा, परिक्रमा सामाजिक दृष्टि से भी उतना ही महत्वपूर्ण है क्योंकि इस अवसर पर विभिन्न जातियों और समुदायों के लोग एक साथ आते हैं।

गिरनार परिक्रमा मार्ग:-

परिक्रमा दुधेश्वर मंदिर से शुरू होकर BHAVNATH TALETI तक जाती है। फिर लोग घने जंगल से होकर गुजरते हैं। गुजरने के बाद, वे ZINA BAVA NI MADHI तक पहुँचते हैं जो जूनागढ़ जिले के सबसे बड़े बांध-हसनपुर धाम के पास है। तीर्थयात्री यहाँ एक रात रुकते हैं। एक बहुत ही खूबसूरत मंदिर जिसका नाम है CHANDRA-MAULESHWAR यहां स्थित है।

गिरनार परिक्रमा का महत्व :-

गिरनार में भगवान दत्तात्रेय को 3 सिर और एक रूप दिखाया गया है जो शांति और शांति की शक्ति का प्रतीक है। वर्तमान कलियुग में, यह केवल शुद्ध, दिव्य प्रेम के माध्यम से ही कलयुग प्रभाव को को काम किया जा सकता है। और इस कलयुग से परे जा सकता है। और उस प्रकार की शांति प्राप्त कर सकता है। केवल वे ही अत्यंत धार्मिक और धर्मी लोग सत्कर्म मार्ग का अनुसरण कर सकते हैं और पूर्ण सत्य की खोज के लिए आगे बढ़ सकते हैं। भगवान दत्तात्रेय उस पर बहुत प्यार और करुणा का संचार करते हैं जो इस परिक्रमा को सच्चे मन से लगाता है, जिससे उनके व्यक्ति को शांति और प्यार मिलता है।

गिरनार की अनसुनी पौराणिक गाथा :-

देखा जाए तो भगवान दत्तात्रेय उतने अधिक जाने-पहचाने हुए भगवान नहीं हैं, जितने भगवान राम-कृष्ण या शंकरजी अथवा हनुमान जी को लोग जानते है। इसीलिए बहुत से लोगों को भगवान दत्तात्रेय के बारे में अधिक जानकारी भी नहीं है, और दत्त तीर्थस्थलों के बारे में भी उतना प्रचार-प्रसार दिखाई नहीं देता, जैसा कि वैष्णो देवी या कामाख्या मंदिर का होता है.

सिद्धक्षेत्र:-

गुजरात के सौराष्ट्र स्थित जूनागढ़ से कुछ ही किमी दूर है गिरनार पर्वतमाला. इसी पर्वतमाला की एक चोटी पर भगवान दत्तात्रेय ने कठोर तपस्या की थी, और आज भी उनकी चरण पादुकाएँ वहाँ स्थापित हैं. गिरनार को “सिद्धक्षेत्र” कहा जाता है. ऐसा कोई भी क्षेत्र, जहाँ किसी आध्यात्मिक शक्तिशाली सिद्धपुरुष ने चार तप किए हों, उसे सिद्धक्षेत्र कहते हैं.

गिरनार की ऊँची चोटी पर स्थित दत्तात्रेय की चरण पादुकाओं के दर्शन प्राप्त करने के लिए श्रद्धालुओं को दस हजार सीढ़ियों की कठिन चढ़ाई करनी पड़ती है. ज़ाहिर है कि इस चढ़ाई के लिए कठोर परिश्रम, अपार श्रद्धा और लगन चाहिए होगी, लेकिन अक्सर देखा गया है कि कई वृद्धजन भी “अवधूत चिंतन श्री गुरुदेवदत्त” तथा दिगंबरा, दिगंबरा श्रीपादश्रीवल्लभ दिगंबरा” का उदघोष करते हुए आराम से इतनी कठिन यात्रा पूरी कर ही लेते हैं.

  1. गिरनार पर्वत श्रृंखला की सबसे बड़ी खासियत ये है कि दत्तात्रेय भगवान के चरणों तक पहुँचने से पहले जैन पंथ के सुन्दर मंदिर भी मिलते हैं,
  2. अम्बाजी का मंदिर भी है और नाथ सम्प्रदाय(nath Sampradaya) के गुरु गोरखनाथ का पवित्र स्थान भी यहाँ स्थित है.
  3. गिरनार पर्वत की सबसे ऊंची चोटी 1000 मीटर से भी ऊंची है.
  4. यह पूरी पर्वतमाला सत्तर मील के क्षेत्रफल में फ़ैली हुई है, जबकि भगवान दत्तात्रेय के मंदिर वाली पहाड़ी का परिक्रमा व्यास लगभग चालीस किमी का है.
  5. जैन धर्मावलम्बियों के साथ अन्य हिन्दू धर्मावलम्बी गिरनार दर्शन हेतु लालायित रहते हैं.
  6. अत्रि ऋषि एवं सती अनुसूया के पुत्र दत्तात्रेय हैं.
  7. दोनों पति-पत्नी ने लगातार 24 वर्ष तक कठोर तपस्या की, जिससे भगवान शिव प्रसन्न हुए और उन्होंने गिरनार पर्वत श्रृंखला को आशीर्वाद देते हुए कहा, कि यह पर्वतमाला देवताओं एवं ऋषियों का निवास स्थान होगी.

भगवान दत्तात्रेय चरण पादुकाओं के दर्शन की श्रद्धापूर्ण लेकिन कठिन यात्रा आरम्भ होती है, दामोदर कुण्ड से. दामोदर कुण्ड से पवित्र जल लेकर एवं बलदेवजी के मंदिर से “बल” प्राप्त करके भक्तगण यात्रा शुरू करते हैं. इस यात्रा पहला पड़ाव आता है, 4500 सीढ़ियाँ चढने के बाद जहाँ श्वेताम्बर और दिगंबर जैन सम्प्रदायों के सुन्दर, कलात्मक और शांत मंदिर स्थित हैं.

यहाँ जैन मुनियों एवं तीर्थंकरों के दर्शन करने के बाद भक्तगण 1000 सीढ़ियाँ और चढ़ते हैं तो उन्हें मिलता है अम्बाजी मंदिर. यह देवी माता का मंदिर है और गुप्त साम्राज्य के समय निर्मित किया गया था. नवविवाहित जोड़े इस अम्बाजी के मंदिर में अपने सफल वैवाहिक जीवन हेतु आशीर्वाद प्राप्त करने अवश्य आते हैं.

नोट : अगर आप कुछ और जानते है या इसमें कोई त्रुटि है तो सुझाव और संशोधन आमंत्रित है।

निवेदन:-

अयोध्या की परिक्रमा के बारे में जानने से पहले एक बात हम सभी को जान लेनी चाहिए कि भारतीय संस्कृति समय-समय पर हमें अध्यात्म से जोड़ने की बात करती है। अध्यात्म हमारे मन को पवित्र बनाता है और हमें एक शक्ति देता है जिससे हम जीवन की हर कठिनाई से लड़ सके और प्रेम के साथ जीवन का निर्वाह कर सकें। अयोध्या की परिक्रमा( vrindavan parikrama) श्री राम के जीवन से जुड़ी परिक्रमा है भक्त और भगवान से जुड़ी हुई परिक्रमा है। आज हम अयोध्या की परिक्रमा के बारे में जानेंगे क्यों यह अपनी जगह पर महत्वपूर्ण रखता है क्यों इस पीढ़ी को और आने वाली पीढ़ी को इसके महत्व की गहराई को समझना चाहिए।

“जानकारी अच्छी लगे तो सभी से शेयर जरूर करे क्युकी आज हमारी खोती हुई भारतीय संस्कृति जो विरासत में मिली उसको को प्रसार की जरुरत है जिससे आने वाली पीढ़ियों तक इसकी चमक पहुंच सके। और अपनी मातृभाषा हिंदी पे हमेशा गर्व कीजिये और इसका सम्मान-प्रसार जरूर कीजिये। “

अयोध्या परिक्रमा क्या है?:-

सरयू तट के किनारे बसा अयोध्या धाम है जो कि श्री राम चंद्र की जन्मभूमि है. सभी श्रद्धालु श्री राम जी के उन सभी दिव्य स्थानों की परिक्रमा लगाते जहाँ पर श्री राम ने बचपन में बाल लीलाये की और जहाँ के पग पग पे उनकी अनेक जीवन की झलकियां है। उनके उदार , श्रद्धा , कर्तव्य पराकाष्टा का साक्षात् प्रमाण है। और श्री राम जी का अखंड वास् है। इन सभी स्थानों के चारो तरफ चल कर भक्तगण परिक्रमा करते है इसे अयोध्या परिक्रमा कहते है।

परिक्रमा का मुख्य उद्देश्य ये है कि हिन्दू धर्म के मुताबिक जीवात्मा 84 लाख योनियों में भ्रमण करती है। ऐसे में जन्म जन्मांतर में अनेकों पाप भी किए होते हैं। इन पापों को नष्ट करने के लिए परिक्रमा की जाती है। कहा जाता है कि परिक्रमा में पग-पग पर पाप नष्ट होते हैं।

अयोध्या में मुख्य तौर से 3 प्रकार की परिक्रमा होती हैं।:-

पहली 84 कोसी, दूसरी 14 कोसी और तीसरा 5 कोसी। आपको बता दें कि 1 कोस में तीन किलो मीटर होते हैं। अयोध्या की सीमा तीन भागों में बंटी है। इसमें 84 कोस में अवध क्षेत्र, 14 कोस में अयोध्या नगर और 5 कोस में अयोध्या का क्षेत्र आता है। इस लिए तीन परिक्रमा की जाती है। इनमें से 84 कोसी परिक्रमा में साधू-संत हिस्सा लेते हैं, तो 14 कोसी और 5 कोसी परिक्रमा में आम लोग शामिल होते हैं।

84 कोसी परिक्रमा का महत्व:-

84 कोसी परिक्रमा पूरे अवध क्षेत्र में होती है। इतनी बड़ी परिक्रमा की वजह से इसमें आम लोग शामिल नहीं होते। ये परिक्रमा खास तौर से साधु-संतों की ओर से की जाती है। इसका महत्व ये है कि इसमें साधु-संत समाज के कल्याण के लिए ये परिक्रमा करते हैं।

यात्रा के मार्ग में उत्तर प्रदेश के छह जिले आते हैं- बाराबंकी, फैजाबाद, गोंडा, बहराइच, अंबेडकरनगर और बस्ती जिला। उक्त जिलों में यात्रा के महत्वपूर्ण पड़ाव होते हैं जहां रुककर यात्री आराम करते हैं।

14 कोसी परिक्रमा का महत्व:-

कार्तिक परिक्रमा को 14 कोसी परिक्रमा के तौर पर जाना जाता है। ये साल में एक बार होती है। ऐसा कहा जाता है कि कार्तिक परिक्रमा के दौरान भगवान विष्णु का देवोथान (जागना) होता है। इस वजह से इस दौरान किए गए काम को क्षरण नहीं होता। आप अगर मन से परिक्रमा में हिस्सा लें तो उसका फल आपको जरूर मिलता है।

5 कोसी परिक्रमा का महत्व:-

5 कोसी परिक्रमा अयोध्या क्षेत्र में हर एकादशी को होती है। इस तरह से हर महीने मे दो बार ये परिक्रमा होती है। इस परिक्रमा का भी उद्देशय पापों को नष्ट करना होता है।

meri jhopdi ke bhag aaj khul jayenge ram aayenge lyrics

अयोध्या परिक्रमा कब की जाती है :-

14 काेसी परिक्रमा में भक्त अयोध्या शहर की परिक्रमा करते हैं। जबकि 5 कोसी में अयोध्या क्षेत्र की और 84 कोसी में पूरे अवध क्षेत्र की परिक्रमा की जाती है। मान्यतानुसार, 14 और 5 कोसी परिक्रमाओं के साथ कार्तिक मास में कार्तिक स्नान का भी बड़ा महत्व है। जो चौदह कोसी परिक्रमा नहीं कर पाते वह देवोत्थानी प्रबोधनी एकादशी के दिन अवश्य पंचकोसी परिक्रमा करते हैं, इस दिन परिक्रमा करने का विशेष धार्मिक महत्व है। 5 कोसी परिक्रमा रामजन्म भूमि के चारों तरफ 5 कोस की परिधि में होती है। कार्तिक नवमी के दिन लाखों श्रद्धालु भगवान राम की जन्मभूमि के चारों ओर 14 कोसी परिक्रमा पूरी करते हैं। यह परिक्रमा वैसे तो कठिन होती हैं लेकिन लोगों की आस्था है कि श्रीराम उन्हें इन परिक्रमाओं को पूरा करने के लिए विशेष ऊर्जा प्रदान करते हैं, इसलिए वे हंसते-हंसते इन्हें पूरी आस्था के साथ पूरा करते हैं।

14 और 5 कोसी परिक्रमा से लाभ :-

कहते है कार्तिक मास में होने वाली 14 कोसी परिक्रमा को कार्तिक परिक्रमा के नाम से भी जाना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि कार्तिक मास में होने वाली इन परिक्रमाओं के दौरान ही भगवान विष्णु का देवोत्थान होता है।

परिक्रमा की परंपरा:-

परिक्रमा की परंपरा आज की नहीं बल्कि कई सदियों से चली आ रही है। ऐसा माना जाता है इस परिक्रमा को करने के साथ ना सिर्फ इस जन्म के बल्कि कई जन्मों के पाप भी नष्ट हो जाते हैं। इसी मान्यता के चलते देश के कोने-कोने से लाखों की संख्या में बच्चे, बूढ़े और युवा सभी भक्तिभाव के साथ परिक्रमा करते हैं। पवित्र नदी सरयू में स्नान करने के बाद श्रीराम का जयघोष करते हुए प्रमुख मंदिरों में दर्शन पूजन करते हैं।

ग्रंथ में अयोध्या परिक्रमा का वर्णन :-

स्कन्द पुराण में अयोध्या के 53 तीर्थस्थानों का अति सुंदर और यथावत वर्णन है। स्कन्द पुराण में अयोध्या की 2 दिन की परिक्रमा दी है जो इस प्रकार है:- विष्णुहरी, स्वर्गद्वार, पापमोचनक, ऋणमोचनक, सहस्रधारा, चन्द्रहरी, धर्महरी, चक्रहरी, ब्रह्मकुण्ड, महाविद्या, स्वर्गद्वार, रुक्मिणी तीर्थ। युगों से अयोध्या की वृहद् परिक्रमा है- स्वर्गद्वार, सूर्यकुण्ड, जनौरा, निर्मल कुण्ड, गोप्रतार घाट, स्वर्गद्वार और लघु (अन्तर्वेदी) परिक्रमा है:- रामघाट, सीताकुण्ड, अग्निकुण्ड, विद्या कुण्ड, लक्ष्मण घाट, स्वर्गद्वार, राम घाट। 

स्कन्द पुराण और गरुड़ पुराण में अयोध्या नगरी का उल्लेख ‘सिद्ध क्षेत्र’ ‘वल्लभ बैठक’ ऐसा आता है। ब्रह्म पुराण में कहा गया है :-

अयोध्या मथुरा माया, काशी कांची ह्यवंतिका।

एता: पुण्यतमा: प्रोक्ता: पुरीणामुतामोत्तमा:॥

कोशल देश की राजधानी ऐसा अयोध्या का महत्व वाल्मीकि रामायण में है। अयोध्या याने ‘अयुध्य याने ‘अजेय’- जिसे कोई पराजित नहीं कर सकता। 

अयोध्या परिक्रमा में अनेक पवित्र स्थान हैं-

अब तो बहुत ही हर्ष की बात की इतने विरोधो के बाद अब श्री राम जी का भव्य मंदिर का निर्माण हो रहा है। जो की बहुत जल्द भक्तो के लिए खुलेगा जहा वो प्रभु का दर्शन कर सकेंगे।

अयोध्या में प्रथम बार :-

अगर आप अयोध्या में प्रथम बार आए हैं पहली बार आए हैं तो आपको अयोध्या की महिमा के बारे में जरूर जाना चाहिए अयोध्या के प्रसिद्ध मंदिर के बारे में जरूर जाना चाहिए। यहां पर जितने भी मंदिर है उनका श्री राम जी से नाता है वह उनकी लीला को सुमिरन करते हुए बनाया गया है। जिस जगह श्री राम जी ने जो लीला की थी उस लीला को ध्यान में रखकर कई युगों पहले इन मंदिरों की नींव रखी गई जिससे कि आने वाली पीढ़ी इसके महत्व को समझ सके श्री राम के जीवन के अनमोल ज्ञान भक्ति को फिर से जी सकें और उससे प्रेम भक्ति को प्राप्त कर अपने जीवन को निर्मल बना सकें। सम्पूर्ण जानकारी प्राप्त करने के लिए यहाँ क्लिक करे अयोध्या

नोट : अगर आप कुछ और जानते है या इसमें कोई त्रुटि है तो सुझाव और संशोधन आमंत्रित है।

अयोध्या परिक्रमा क्या है?

सरयू तट के किनारे बसा अयोध्या धाम है जो कि श्री राम चंद्र की जन्मभूमि है। उसकी परिक्रमा

अयोध्या परिक्रमा कब की जाती है?

कार्तिक नवमी के दिन लाखों श्रद्धालु भगवान राम की जन्मभूमि के चारों ओर 14 कोसी परिक्रमा पूरी करते हैं।

अयोध्या में मुख्य तौर से कितने प्रकार की परिक्रमा होती है ?

3 प्रकार की परिक्रमा होती हैं। पहली 84 कोसी, दूसरी 14 कोसी और तीसरा 5 कोसी।

गोवर्धन परिक्रमा(Goverdhan Parikarma) साक्षात् श्री कृष्ण भगवान की परिक्रमा है। इस कलयुग में जो श्रद्धा से भरकर परिक्रमा करेगा वो गोवेर्धन नाथ की अनूठी पात्र जरूर बनेगा।
गोवर्धन पर्वत आज भी और आने वाली पीढ़ियों के लिए भी एक भक्त और भगवान के भरोसे की दृढ़ता को दर्शाता है और दर्शायेगा। जब हम पूर्ण समर्पण भगवान के चरणों में करते हैं सिर्फ उनका आसरा ही जब हमें नजर आता है तब किस प्रकार भगवान अपने भक्तों की रक्षा करते हैं और उनके विश्वास को भरोसे को टूटने नहीं देते हैं। उसका साक्षात् प्रमाण गोवेर्धन पर्वत है जो की श्री कृष्ण का ही एक रूप है।

जानकारी अच्छी लगे तो सभी से शेयर जरूर करे क्युकी आज हमारी खोती हुई भारतीय संस्कृति जो विरासत में मिली उसको को प्रसार की जरुरत है जिससे आने वाली पीढ़ियों तक इसकी चमक पहुंच सके। और अपनी मातृभाषा हिंदी पे हमेशा गर्व कीजिये और इसका सम्मान-प्रसार जरूर कीजिये।

परिचय:-

गोवर्धन पर्वत, जिसे गिरिराज भी कहा जाता है, का अर्थ है कि पहाड़ों का राजा भौतिक दृष्टि से कम पर्वत से अधिक कुछ नहीं है। लेकिन जो श्री कृष्णा के जीवन की सत्य कथाओ को जानते है उनके ये पता है की आध्यात्मिक महत्व क्या है इस दिव्य पर्वत गोवर्धन परिक्रमा की। यह भगवान श्री कृष्ण की लीलास्थली है। यहीं पर भगवान श्री कृष्ण ने द्वापर युग में ब्रजवासियों को इन्द्र के प्रकोप से बचाने के लिये गोवर्धन पर्वत अपनी तर्जनी अंगुली पर उठाया था। गोवर्धन पर्वत को भक्क्तजन गिरिराज जी भी कहते हैं।

गोवर्धन परिक्रमा मुख्यतः गोवर्धन पूजा, पूर्णिमा, एकादशी इस प्रसिद्द दिन को भारी मात्रा में की जाती है। लेकिन गोवर्धन परिक्रमा आप कभी भी कर सकते हैं उजाले पक्ष में ज्यादातर गोवर्धन परिक्रमा की जाती है और पूर्णिमा आते-आते यहां पर भीड़ काफी बढ़ जाती है। गोवर्धन परिक्रमा को काफी लोग जानते हैं और काफी दूर से लोग आते हैं इस परिक्रमा को लगाने के लिए कहते हैं गोवर्धन भगवान हमारे कष्टों का पहाड़ उठा लेते हैं और हमें सही मार्गदर्शन करते हैं।

गोवर्धन परिक्रमा का महत्व:-

गोवर्धन परिक्रमा श्री कृष्ण के लिए भक्तों के प्रेम को दर्शाता है। इस कलियुग में गोवर्धन गिरिराज जी महाराज की परिक्रमा बहुत ही महत्वपूर्ण मानी गई है। गिरिराज गोवर्धन की परिक्रमा श्रद्धालुओं के सभी मनोरथों को पूर्ण करने वाली होती है। गोवर्धन पर्वत को योगेश्वर भगवान कृष्ण का साक्षात स्वरूप माना गया है।

श्रीमद् भागवत में स्वयं गोपियों ने भी कहा है :- हंतारमद्रिरबलाहरिदास वर्यो यानी श्री गोवर्धन गिरिराज जी के जैसा भक्त आज तक कोई नहीं हुआ यही सर्वश्रेष्ठ एकमात्र भक्त हैं।

तभी भगवान श्री कृष्ण ने गिरिराज गोवर्धन को प्रत्यक्ष देव की मान्यता प्रदान की। इन्हीं गोवर्धन पर्वत को द्वापर युग में भगवान कृष्ण द्वारा इन्द्र का मद चूर करने के लिए एवं ब्रजवासियों को इन्द्र के कोप से बचाने के लिए 7 दिन 7 रात तक अपने वाम हाथ की कनिष्ठा अंगुली के नख पर धारण किया था।

गोवर्धन की परिक्रमा कैसे शुरू होती है:-

गोवर्धन गिरिराज जी की परिक्रमा वैसे तो कहीं से भी प्रारंभ की जा सकती है किंतु कुछ लोगों की मान्यता अनुसार गिरिराज गोवर्धन की परिक्रमा प्रारंभ करने हेतु 2 मुखारविंद हैं। ये 2 मुखारविंद हैं-

  1. मानसी गंगा मुखारविंद मंदिर
  2. जतीपुरा मुखारविंद मंदिर

इन 2 मुखारविंदों में से किसी एक मुखारविंद से परिक्रमा प्रारंभ कर परिक्रमा पूर्ण करने पर वापस उसी मुखारविंद पर पहुंचना होता है।
किंतु सभी वैष्णव भक्तजन ‘मानसी गंगा मुखारविंद से ही अपनी परिक्रमा का प्रारंभ करते हैं, शेष सभी भक्त ‘जतीपुरा’ मुखारविंद से अपनी परिक्रमा प्रारंभ करते हैं। ‘जतीपुरा-मुखारविंद’ को श्रीनाथजी के विग्रह ( बल्लभ कुल संप्रदाय ) की मान्यता प्राप्त है।

वैसे परिक्रमा का सही मायने में नियम यह कहता है कि आप जिस स्थान से भी प्रारंभ करते हैं उसी स्थान तक आपको पूरा करना होता है चाहे वह स्थान कोई भी हो, चाहे वो राधा कुंड हो, चाहे वो  मानसी गंगा मुखारविंद हो, चाहे वह दानघाटी मंदिर हो, चाहे वह आन्यौर गांव हो, चाहे वो जतीपुरा मुखारविंद हो, चाहे वह गोवर्धन गांव हो कोई भी स्थान हो।

गोवर्धन परिक्रमा के नियम:-

श्री गोवर्धन महाराज की भव्यता:-

श्री गोवर्धन महाराज सत्य घटना:-

भगवान श्री कृष्ण(shri krishna) की लीलाओं में विशेष लीला वृंदावन(vrindavan) में हुई वह अद्भुत लीला थी जिस लीला के कारण श्री कृष्ण का वह चमत्कार(miracle) देख आज हजारों लाखों लोगों  आकर्षित होते हैं भगवान श्री कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत(Govardhan Hill )उठा लिया था यह लीला कुछ इस प्रकार घटित हुई कृष्ण बलराम रोज की तरह गायों को चराने गए जब गाय चढ़ाकर भगवान वापस आए तो उन्होंने देखा पूरा का पूरा वृंदावन सभी कुछ विशेष सामग्री पूजा की थाली लेकर नंद बाबा के कहने पर बड़े पूजा की तैयारी कर रहे थे .

श्री कृष्ण छोटे थे वो पूछने  अलगे यज्ञ तैयारी और किस लिए वह सवाल करने लगे नंदबाबा से।  श्री कृष्ण(Shri krishna) जानते तो सब कुछ थे फिर भी नंद जी से पूछते हैं बाबा यह हम सब किनकी  पूजा की तैयारी कर रहे हैं फिर क्या था नंद बाबा ने बालक समझकर कृष्ण को कहा यह तो हम लोग हर साल करते हैं उसी  पूजा की तैयारी है।  नहीं बाबा मुझे बताइए यह किस भगवान के लिए पूजा(puja) की जा रही है पहले नंद बाबा ने टालने की कोशिश की लेकिन फिर नंद बाबा ने कहा हम लोग इंद्र की पूजा कर रहे हैं क्योंकि इंद्र हमें  वर्षा प्रदान करते हैं वर्षा के कारण हमारा खेत अच्छे से फलता-फूलता है कृष्ण जी ने कहा वर्षा तो हर जगह होती है वर्षा होती है तो खेतों पर भी होती है खेतों पर होती है समुद्र में भी होती हर जगह होती है लेकिन सभी लोग तो इंद्र जी की पूजा नहीं करते बारिश तो हर जगह होती है इस प्रकार से तर्क दिया तो नंद बाबा कुछ बोल नहीं पाए उन्होंने कहा कि यह पूजा कई पीढ़ियों से चली आ रही है तो इसीलिए हम भी कर रहे हैं क्या इसका शास्त्रों में वर्णन है यह हम लोग कई पीढ़ियों से  करते आ रहे हैं।  हम बरसों से बस करते चले आ रहे हैं।

हमें  विशाल गोवर्धन की पूजा करनी चाहिए :-

श्री कृष्णा जी ने कहा  हमें  विशाल गोवर्धन की पूजा करनी चाहिए क्योंकि हम गोवर्धन की पूजा करेंगे तो गोवर्धन ही तो हमारी  गायों को भोजन देती है जिससे कि गायों की  भरपूर दूध से हम सबकी  सेवा होती  है।  हमें चाहिए कि हम गोवर्धन की पूजा करें। तर्क देने के बाद वास्तव में भगवान श्री कृष्ण लीला के द्वारा यह समझाना चाह रहे हैं देवता तो बहुत सारे हैं मुख्य देवता 33 है लेकिन संख्या में 33 करोड़ देवता हैं  सारे पृथ्वी से ऊपर के लोग में रहते हैं एक ब्रह्मांड की 14 लोक है पृथ्वी के नीचे सात लोक हैं भगवान कृष्ण अर्जुन को भगवत गीता में बोलते हैं हे अर्जुन यह जो ब्राह्मण है इसमें जितने लोग हैं चाहे ऊपर जाएं या मृत्यु के पश्चात नीचे जाए इन सब लोगों में दुख है और मृत्यु है और फिर से जन्म होता है यहां तो कई बार हम यह सोचते कि दुखों के कारण अपना घर बदलते बदलते हैं देश बदलते और यह सोचते हैं कि हमारे दुख कम हो जाएगा लेकिन दुख खत्म नहीं होता मानसिक चिंताएं खत्म नहीं होती

श्री कृष्णा ने कहा :-

श्री कृष्णा ने कहा हमें देवताओं की पूजा नहीं करनी चाहिए हमें कर्म की पूजा करनी चाहिए हमें भगवान की पूजा करनी चाहिए और गोवर्धन पर्वत साक्षात भगवान का स्वरुप है क्योंकि वह हम सभी को छाया प्रदान करते हैं हम सभी के गायो को अन धन प्रदान करते हैं इसीलिए हम सभी को गोवर्धन महाराज के शरण में जाना चाहिए वह हम सब की पूजा जरूर स्वीकार करेंगे बस इतना ही सुनना था

सब देख कर इंद्र देवता को लगा कि उन्होंने कुछ गलत किया है तो वह कृष्ण भगवान से क्षमा मांगने लगे ऐसा नहीं करना चाहिए तभी उनका नाम गोविंद नाम पड़ा गोवर्धनधारी नाम पड़ा। श्री. कृष्ण कहते हैं जब हमें अपने दुखों के पहाड ना उठे तो  एक बार सच्चे मन से जो उनकी शरण में  जाए तो वो  सभी के दुखों का पहाड़ जरूर उठाएंगे पर विश्वास और श्रद्धा होना चाहिए। जैसे ब्रजवासी सीधा गोवर्धन भगवान की शरण में ही गए।   श्री कृष्ण जी के ऊपर अपनी श्रद्धा भाव दिखाया आंख बंद करके उनके शरण में चले गए इस प्रकार आज भी गोवर्धन पर्वत हम सभी की इच्छाओं को पूरा करते हैं श्रद्धा और भक्ति भावना चाहिए। आज बहुत से लोगों की श्रद्धा गोवर्धन महाराज से जुड़ी हुई है हर महीने लोग यहां पर परिक्रमा (Goverdhan Parikarma ) के लिए आते हैं और अपने दुखों को बांटते हैं और उनको दुख कम करने का वर मांगते है और उनकी इच्छाएं पूरी होती है कलयुग में साक्षात प्रकट है श्री कृष्ण जी का स्वरुप।  श्री. गोवर्धन महाराज  की जय हो जय हो श्री गोवर्धन महाराज महाराज नित्य आया करो।

श्री. गोवर्धन महाराज  की जय हो

नोट : अगर आप कुछ और जानते है या इसमें कोई त्रुटि है तो सुझाव और संशोधन आमंत्रित है।

गोवर्धन परिक्रमा कब लगाई जाती है ?

गोवर्धन परिक्रमा आप कभी भी कर सकते हैं उजाले पक्ष में ज्यादातर गोवर्धन परिक्रमा की जाती है गोवर्धन पूजा, पूर्णिमा, एकादशी

श्री गोवर्धन महाराज सत्य घटना क्या है ?

ये श्री कृष्ण के जीवन से जुड़ी हुई है

गोवर्धन की परिक्रमा कैसे शुरू होती है?

मानसी गंगा मुखारविंद मंदिर
जतीपुरा मुखारविंद मंदिर

वृंदावन, जिसे ब्रज के नाम से जाना जाता है, वह स्थान है जहाँ भगवान कृष्ण ने अपना पूरा बचपन बिताया। यही कारण है कि यह हिंदुओं और वैष्णवों के प्रमुख तीर्थस्थलों में से एक है। लगभग 5,000 मंदिर भगवान और अर्ध-देवताओं को समर्पित हैं। कई तपस्याएँ हैं जो भगवान के करीब आने के लिए प्रचलित हैं। ब्रज चौरासी कोस (84 kosh yatra) दर्शन यात्रा ब्रज में सबसे पसंदीदा तीर्थस्थलों में से एक है।

जानकारी अच्छी लगे तो सभी से शेयर जरूर करे क्युकी आज हमारी खोती हुई भारतीय संस्कृति जो विरासत में मिली उसको को प्रसार की जरुरत है जिससे आने वाली पीढ़ियों तक इसकी चमक पहुंच सके। और अपनी मातृभाषा हिंदी पे हमेशा गर्व कीजिये और इसका सम्मान-प्रसार जरूर कीजिये।

परिचय:-

तीर्थयात्राओं के हिंदू वार्षिक कैलेंडर में सबसे दिव्य और पवित्र यात्राओं में से एक ब्रज चौरासी कोस यात्रा या 84 कोस यात्रा है। एक ‘कोस’ लगभग 2.25 मील या 3.62 किलोमीटर है।

84 कोस परिक्रमा” का तात्पर्य लगभग 300 किलोमीटर की परिधि वाली ट्रेक या यमुना के किनारे वृंदावन के आसपास के पवित्र स्थानों की यात्रा से है। वार्षिक रूप से, लाखों भक्त या तीर्थयात्री (यत्रियां) इस यात्रा को इस विश्वास के साथ करते हैं कि वे अपने सांसारिक पापों से मुक्त हो गए हैं और बुरे कर्म कर सकते हैं और ‘परलोक’ या स्वर्ग में स्थान पा सकते हैं।

84 कोस यात्रा को ब्रज भूमि यात्रा के रूप में भी जाना जाता है क्योंकि यह कृष्ण के जीवन और घटनाओं से जुड़े स्थानों और स्थलों को कवर करती है। आगरा और मथुरा की यात्रा करने वाले पर्यटक कभी-कभी भगवान कृष्ण के समर्पण के रूप में ब्रज भूमि यात्रा को पूरा करते हैं। कई अन्य लोग ब्रज भूमि यात्रा को 4 से 7 दिन की योजनाबद्ध यात्रा के रूप में करने के लिए विशेष रूप से आते हैं।

परंपरागत रूप से, यात्रा मानसून या भादों के महीने के दौरान की जाती है; बारिश के महत्व को यहां नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है क्योंकि यमुना में बाढ़ आने पर कृष्ण का जन्म मूसलाधार बारिश से हुआ था। इसलिए, अधिकांश श्रद्धालु बारिश के मौसम में इस तीर्थयात्रा को पैदल ही करते हैं। ज्यादातर लोगों के लिए, यह एक इच्छा पूरी होने और धन्यवाद प्रस्ताव की परिणति में है; दूसरों के लिए, यह एक तरह की तपस्या है जो किसी इच्छा या प्रार्थना के अनुदान के लिए की जाती है।

ब्रज यात्रा या ब्रज परिक्रमा में 12 वन (वन), 24 उपवन (छोटे वन या उपवन), पवित्र गोवर्धन पहाड़ी, यमुना नदी और इसके किनारे स्थित विभिन्न पवित्र स्थल और उद्यान शामिल हैं जो वृंदावन के इतिहास और विरासत के साक्षी रहे हैं। । यात्रा एक परिधि (परिपत्र) मार्ग बनाती है; उत्तर में, यात्रा कोटबन तक फैली हुई है, पश्चिम और दक्षिण-पश्चिम की ओर नंदगाँव, बरसाना और गोवर्धन पहाड़ी हैं, जो पूर्व में यमुना के किनारे से बालदेव मंदिर तक फैली हुई हैं। मार्ग के साथ, कई ऐसे स्थान हैं जहां प्राचीन मंदिर मूर्तियों और कलाकृतियों के साथ आंशिक रूप से नष्ट हुए खंडहरों में स्थित हैं, विदेशी शासकों और राजवंशों द्वारा आक्रमण के प्रभावों के लिए मूक गवाही देते हैं।

84 kosh yatra यात्रा का महत्व:-

किंवदंती है कि यशोदा माँ और नंद बाबा (कृष्ण के पालक माता-पिता) तीर्थ यात्रा (चार धाम यात्रा) पर जाने के इच्छुक थे और कृष्ण के लिए यह इच्छा व्यक्त की। चार धाम का शाब्दिक अर्थ है हिंदू धर्म के चार निवास स्थान या चार शक्तिशाली पवित्र तीर्थस्थल – जैसे बद्रीनाथ, पुरी, रामेश्वरम और द्वारका। मोटे तौर पर, भारत के उत्तर, पूर्व, दक्षिण और पश्चिम में ये चार स्थान हिंदू धर्म (वैष्णव, शैव और मिश्रित) को निरूपित करने के लिए आए हैं। अपने वृद्ध माता-पिता की इच्छा को पूरा करने के लिए, कृष्ण ने अपनी दिव्य शक्तियों के साथ इन पूजा स्थलों के सभी दिव्य पहलुओं को बुलाया और उन्हें 300 किलोमीटर की परिधि में वृंदावन को वो दिव्यता प्रदान की और भूमि को आशीर्वाद दिया, पवित्र दर्जा दिया, इस प्रकार यह नाम दिया गया ‘ ब्रज भूमि ’। जो चार धाम की यात्रा ना कर पाए। तो वो समर्पण भाव से जो तीर्थ धाम की परिक्रमा कर सके उन्हें कर लेनी चाहिये।

84 कोस यात्रा की सत्य घटना :-

एक दिन ब्रह्मा जी ने गोकुल और वृंदावन पर एक माया डाला और श्री कृष्ण के चरवाहे मित्रों और उनकी गायों को गायब कर दिया। यह जांचने के लिए कि क्या कृष्ण वास्तव में एक दिव्य अवतार थे। श्री कृष्ण ने तुरंत इसे समझ लिया और श्री कृष्णा ने एक दिव्य लीला कर दिया वो उसी चरवाहे मित्रो और उनकी गायो के रूप में प्रकट जो गये। और फिर से ऐसा कर दिया जैसे उनके सखा गायब ही न हुए हो।
ब्रह्मा जी ने तुरंत अपने कुकृत्य पर रोक लगा दी और श्री कृष्ण से क्षमा माँगी। श्री कृष्णा ने कहा कि वह पवित्र भूमि के चारों ओर जाकर अपने पापों का भूल का प्रायश्चित कर सकता है। इस प्रकार ब्रह्मा जी ने चौरासी कोस यात्रा करने वाले पहले व्यक्ति बने; यह यात्रा के महत्व और प्रासंगिकता और हजारों लोगों को इसे चलाने के लिए प्रेरित करने वाली प्रेरणा की व्याख्या करता है।

चौरासी कोस यात्रा कैसे शुरू होती है:-

कई धार्मिक संगठन और समूह हैं जो प्रत्येक वर्ष यात्रा का आयोजन ऐसे लोगों के लिए करते हैं जो धार्मिक गुरु और उनके सहायकों के नेतृत्व में समूहों में किये जाते हैं। यात्रा के पहले दिन, तीर्थयात्री श्री राधा वल्लभलाल की मंगला आरती में भाग लेते हैं; भगवान कृष्ण की विग्रह को दूध (दुग्धाभिषेक) से स्नान कराने के साथ, यमुना नदी में प्रार्थना की जाती है। तीर्थयात्री तब सामूहिक रूप से यात्रा को पूरा करने का संकल्प लेते हैं, रास्ते भर राधेश्याम का नाम जपते हैं।

चौरासी कोस यात्रा की अवधि:-

हालाँकि, देर से, संक्षिप्त यात्रा ने ज्यादातर सुविधा के लिए प्रभाव में लेना शुरू कर दिया है क्योंकि परिक्रमा को पूरा करने के लिए पारंपरिक समयबद्ध यात्रा इन दिनों ज्यादातर लोगों के लिए उपलब्ध नहीं है। यात्रा शुरू करने में तनाव और कठिनाइयों के बावजूद, कई हजारों लोग हर साल ब्रज परिक्रमा करते हैं।

इस यात्रा में औसतन एक सामान्य यात्री 8 से 10,000 रुपये खर्च करती है, जबकि अन्य जो अधिक महंगी सुविधाओं का उपयोग करते हैं, वे 25,000 रुपये के करीब खर्च करते हैं। बढ़ती लागत के साथ, यह राशि निश्चित रूप से भिन्न होगी और तीर्थयात्रियों को अक्सर यह ध्यान रखने की सलाह दी जाती है कि यात्रा के समय प्रचलित परिस्थितियों के आधार पर अतिरिक्त व्यय किया जा सकता है।

याद रखने योग्य बातें:-

इस यात्रा को शुरू करने के लिए, एक विश्वसनीय समूह या संगठन के साथ अग्रिम बुकिंग करना हमेशा बेहतर होता है, जिसमें तीर्थयात्रियों, युवा और वृद्धों की यात्रा आवश्यकताओं को पूरा करने और किसी भी अप्रत्याशित के लिए बैक-अप योजनाओं को पूरा करने का व्यापक अनुभव होता है।

घटनाओं या परिस्थितियों जो रास्ते में हो सकती हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि मौसम इस यात्रा में बहुत बड़ी भूमिका निभाता है, खासकर यदि यह मानसून के महीनों के दौरान किया जाता है, जैसा कि आमतौर पर होता है, और इसलिए ठहरने और भोजन में आराम के लिए अतिरिक्त एहतियाती उपाय करने पड़ते हैं।

याद रखने के लिए एक अतिरिक्त तथ्य यह है कि पारंपरिक यात्रा करने वालों के लिए केवल न्यूनतम सुविधाएं जैसे प्रकाश व्यवस्था, पीने का पानी, स्नान की सुविधा और शिविर उपलब्ध हैं। जिला प्रशासन ने इनमें से कोई भी सुविधा प्रदान करने की व्यवस्था नहीं की है और जो भी न्यूनतम सुविधाएं प्रदान की गई हैं, वह मंदिर ट्रस्टों और धर्मार्थ संगठनों के लिए धन्यवाद है।

सुरक्षा निर्देश:-

तीर्थयात्रियों को सलाह दी जाती है कि वे पंडितों या मार्गदर्शकों के साथ व्यक्तिगत जानकारी साझा न करें जो अकेले हैं और किसी भी टूर आयोजक को नहीं जानते हैं।

चौरासी कोस यात्रा के किनारे:-

धार्मिक और आत्म-पूर्ति के अमूर्त लाभों के अलावा, जो कि ब्रज परिक्रमा को करने से यत्रियों को मिलता है। इस यात्रा में यहाँ के आस पास जितने लोग रहते है जिनकी आजीविका इस पर निर्भर करती है।

खानपान प्रतिष्ठान, टेंट हाउस, मजदूर, बढ़ई, कारीगर और बेशक मंदिर के पुजारी पूरी तरह से वृंदावन और ब्रज भूमि पर मौसमी त्योहारों और अवसरों पर निर्भर होते हैं। लेकिन बहुत लोगो की ये सोच है जीतन खर्ज़ वो इन यात्राओं पे खर्ज़ करेंगे उतने में तो वो अपने जीवन की और जरुरत को पूरा कर लेंगे। लेकिन याद रखे इस जीवन के पल हम सभी के लिए सिमित है। क्युकी हम सभी को इस दुनिया से खाली हाथ लौटना है। लेकिन जो आप पुण्य कमाते है सिर्फ वो ही साथ ले जा सकते है।

इन कमियों के बावजूद, 84 कोस यात्रा में जाने वाली लोकप्रियता और अपार धार्मिक उत्साह में कोई संदेह नहीं है, साल दर साल दोगुनी संख्या के साथ।

चौरासी कोस की यात्रा राधे राधे:-

चौरासी कोस की यात्रा राधे राधे बरसाने वाली राधे एक बहुत प्रसिद्द भजन है जो की मानसिक ब्रज यात्रा का माध्यम है। इसको सबसे पहले श्री गौरव कृष्ण गोस्वामी (Gaurav Krishna Goswami ) जी ने गया था। और इस भजन ने पुरे विश्व में अपनी एक छाप छोड़ दी।

नोट : अगर आप कुछ और जानते है या इसमें कोई त्रुटि है तो सुझाव और संशोधन आमंत्रित है।

84 kosh yatra क्या है ?

84 कोस यात्रा को ब्रज भूमि यात्रा के रूप में भी जाना जाता है

चौरासी कोस यात्रा की अवधि ?

लगभग एक महीने या उससे अधिक समय लेती है। वाहन द्वारा आयोजित यात्रा 7-10 दिनों के बीच में हो सकती है।

चौरासी कोस यात्रा कैसे शुरू होती है

धार्मिक संगठन और समूह

निवेदन:- वृंदावन की परिक्रमा के बारे में जानने से पहले एक बात हम सभी को जान लेनी चाहिए कि भारतीय संस्कृति समय-समय पर हमें अध्यात्म से जोड़ने की बात करती है। अध्यात्म हमारे मन को पवित्र बनाता है और हमें एक शक्ति देता है जिससे हम जीवन की हर कठिनाई से लड़ सके और प्रेम के साथ जीवन का निर्वाह कर सकें। वृंदावन की परिक्रमा( vrindavan parikrama) अध्यात्म से जुड़ी परिक्रमा है भक्त और भगवान से जुड़ी हुई परिक्रमा है। आज हम वृंदावन की परिक्रमा के बारे में जानेंगे क्यों यह अपनी जगह पर महत्वपूर्ण रखता है क्यों इस पीढ़ी को और आने वाली पीढ़ी को इसके महत्व की गहराई को समझना चाहिए। vrindavan parikrama in hindi

“जानकारी अच्छी लगे तो सभी से शेयर जरूर करे क्युकी आज हमारी खोती हुई भारतीय संस्कृति जो विरासत में मिली उसको को प्रसार की जरुरत है जिससे आने वाली पीढ़ियों तक इसकी चमक पहुंच सके। और अपनी मातृभाषा हिंदी पे हमेशा गर्व कीजिये और इसका सम्मान-प्रसार जरूर कीजिये। “

वृंदावन परिक्रमा क्या है?:-

वृंदावन परिक्रमा को पंचकोसी परिक्रमा भी कहा जाता है। वृंदावन की परिक्रमा भक्तों के लिए वृंदावन परिक्रमा है। वृन्दावन जो श्री कृष्णा की बाल लीलाओ से भरा है। श्री राधा कृष्ण की दिव्य प्रेम लीला स्थली से परिपूर्ण है। जहाँ गोप गोपियों और ग्वाल वाल के साथ श्री कृष्णा ने बचपन में क्रीड़ा किया और अनन्य प्रसिद्द मंदिरो का संगम है। अगर कोई वृन्दावन के किसी भी प्रसिद्द स्थली परिक्रमा शुरू करे और इन सभी वृन्दावन की श्री कृष्णा की लीला और पारौणिक स्थान के चारो तरफ के मार्ग पे चलकर वापस उसी स्थान पे आ जाता है। तो उसे वृन्दावन परिक्रमा (vrindavan parikrama) कहते है। जो की पंचकोसी परिक्रमा है। इसे युगल सरकार (राधा-कृष्ण का एक मिश्रित रूप ) या साक्षात् राधा कृष्ण की परिक्रमा भी कहते है।

वृन्दावन परिक्रमा कब की जाती है ?

वृंदावन परिक्रमा, वृंदावन, उत्तर प्रदेश, भारत में आमतौर एकादशी पर किया जाता है। वैसे एक भक्त अपने भगवान की जब चाहे परिक्रमा कर सकता है। भक्ति भाव के लिए कोई दिन नहीं अपितु आपके भाव की निर्मलता जरुरी होती है। वृन्दावन बिहारी को सिर्फ आपका प्रेम भाता है। भक्त 10 किलोमीटर (6 मील) लंबी परिक्रमा पथ पर आते हैं। वृंदावन के चारों ओर परिक्रमा करने के लिए दो से तीन घंटे लगते हैं।

ग्रंथ में वृन्दावन परिक्रमा का वर्णन :-

भविष्य पुराण में वृंदावन की परिक्रमा पांच कोस की बताई गई है। वराह संहिता में रास स्थली वृंदावन की परिधि एक योजना बताई गई है। किंतु वृंदावन की वर्तमान परिक्रमा साढ़े 3 कोस की है। वर्तमान परिक्रमा प्राय सूर्य घाट से प्रारंभ होती है। यह परिक्रमा नंगे पांव करना जरूरी है। अनंत गुना फल इसका प्राप्त होता है।

वृंदावन PARIKRAMA मार्ग(vrindavan parikrama marg):-

यह रास्ता बांके बिहारी जी मंदिर से एक सड़क पर है।या आप इसे कालिया घाट से शुरू कर सकते है। न समझ ए तो किसी वृन्दावन वासी संत से या निवासी से आप सहज पूछ सकते है। सब वहाँ बहुत ही सरल सवभाव के है। वृंदावन परिक्रमा में आमतौर पर दो से तीन घंटे लगते हैं। परिक्रमा पथ 10 किमी (6 मील) है। रास्ते में गुजरने वाले कुछ स्थान हैं: यमुना जी के तट पर मदन टेर, कालिया घाट, मदना मोहना मंदिर, इमली ताला, श्रृंगारा वट, और केशी घाट, यमुना महारानी आदि, फिर शेष घाट से धीरा समीरा, टटिया स्थन आदि।

श्री वृन्दावन सो वन नहीं, श्री नंदगाँव सो गाँव ||

श्री बंसीवट सो वट नहीं, श्री कृष्ण नाम सो नाम ||.

परिक्रमा में बारह वन (वन) और चौबीस उपवन (उपवन) शामिल हैं।:-

बारह वन हैं:-

  1. बाहुलवन
  2. बेलवन,
  3. भद्रवन,
  4. भंडिरावन,
  5. कामवन,
  6. खदिरवन,
  7. कुमुदवन,
  8. लोहवन,
  9. महावन,
  10. मधुवन,
  11. तलवन
  12. और वृंदावन

चौबीस उपवन (उपवन) :-

  1. बद्री,
  2. अजनोक,
  3. अरिंग,
  4. बरसाना,
  5. बछावन,
  6. बिल्छू,
  7. दधिग्राम,
  8. गंधर्ववन,
  9. गोकुल,
  10. गोवर्धन,
  11. करहला,
  12. केलवन,
  13. कोकिलावन,
  14. कोटवन,
  15. चटाई,
  16. नंदग्राम,
  17. पारसोली,
  18. परमदरा,
  19. पिसाया,
  20. रावल,
  21. साकेत,
  22. श्रीसाई,
  23. श्रीसाई।
  24. निधिवन

कुछ महत्वपूर्ण मंदिर, वन और घाट जो की परिक्रमा मार्ग पे देखने को मिलते है।

परिक्रमा के मार्ग के साथ कई अन्य मंदिर और मूर्तियाँ हैं, जिनमें से कुछ मुगल हमले के दिनों से टूटी-फूटी स्थिति में हैं। परिक्रमा के अंत में, देवता और यमुना के तट पर जलाए जाने वाले दीपक की प्रार्थना की जाती है।

वृंदावन के छह गोस्वामी:-

वृंदावन को फिर से परिभाषित करने का श्रेय इन गोस्वामियों को जाता है, जिन्हें वृंदावन के छह गोस्वाम कहा जाता है, जिनके बारे में व्यापक शोध किया गया है। और किताबें प्रकाशित हुई हैं। चर्मपत्र के पत्तों पर लिखे गए छह में से कुछ मूल लेखन को वृंदावन अनुसंधान संस्थान में संरक्षित और प्रदर्शित किया गया है।

वृंदावन परिक्रमा के नियम:-

वृन्दावन प्रथम बार :-

अगर आप वृन्दावन प्रथम बार आए हैं पहली बार आए हैं तो आपको वृंदावन की महिमा के बारे में जरूर जाना चाहिए वृंदावन के प्रसिद्ध मंदिर के बारे में जरूर जाना चाहिए। यहां पर जितने भी मंदिर है उनका श्री कृष्ण से नाता है वह उनकी लीला को सुमिरन करते हुए बनाया गया है। जिस जगह श्री कृष्ण ने जो लीला की थी उस लीला से को ध्यान में रखकर कई युगों पहले इन मंदिरों की नींव रखी गई जिससे कि आने वाली पीढ़ी इसके महत्व को समझ सके श्री कृष्ण के जीवन के अनमोल ज्ञान भक्ति को फिर से जी सकें और उससे प्रेम भक्ति को प्राप्त कर अपने जीवन को निर्मल बना सकें। सम्पूर्ण जानकारी प्राप्त करने के लिए यहाँ क्लिक करे वृंदावन

distance from delhi to vrindavan via yamuna expressway:- The distance between Delhi and Vrindavan on this route is somewhere around 183 KM and takes roughly 3.5 hours.

नोट : अगर आप कुछ और जानते है या इसमें कोई त्रुटि है तो सुझाव और संशोधन आमंत्रित है।

वृंदावन परिक्रमा कब की जाती है?

आमतौर एकादशी पर किया जाता है। वैसे एक भक्त अपने भगवान की जब चाहे परिक्रमा कर सकता है।

वृंदावन परिक्रमा कितने किलोमीटर की है?

Approx 10Km

वृंदावन परिक्रमा route क्या है ?

बांके बिहारी जी मंदिर से एक सड़क से या आप इसे कालिया घाट या इस्कॉन मंदिर से शुरू कर सकते।

वृंदावन परिक्रमा के लाभ क्या है ?

राधे -कृष्ण के युगल चरणों की भक्ति प्राप्त होती है। बाकि आपकी जो निर्मल कामना होगी उसकी पूर्ति होगी।