भारत में बहुत से ऐसे हेरिटेज जगह है जो कि रहस्य और चमत्कार से भरे हुऐ है। अपने आप में गुज़रे कल की दास्तां बताते हैं और हमें एक संदेश देते हैं उनके सदियों पुराने होने का और उन्हें किस तरीके से बनाया गया है।
पुरी का श्री जगन्नाथ मंदिर (jagannathpuri temple) जो भगवान जगन्नाथ (श्रीकृष्ण) को समर्पित है। जगन्नाथ शब्द का अर्थ जगत के स्वामी होता है। इस मंदिर को हिन्दुओं के चार धाम में से एक गिना जाता है। यह वैष्णव सम्प्रदाय का मंदिर है, जो भगवान विष्णु के अवतार श्री कृष्ण को समर्पित है। कहते हैं जगन्नाथपुरी एक इकलौता ऐसा मंदिर है जिसमें श्री कृष्ण भगवान अपने भाई बलराम और बहन सुभद्रा के साथ विराजित हैं यह अपने आप में ही एक अद्भुत दृश्य है ।
हे जगन्नाथ प्रभु एक झलक आपकी वो बिसरत नहीं
चाह फिर से देखु तुम्हे मन से ये चाह जाती नहीं।

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(1) नीम की लकड़ी से बना इनका विग्रह
पुरी की सबसे खास बात तो स्वयं भगवान जगन्नाथ हैं जिनका अनोखा रूप कहीं अन्य स्थान पर देखने को नहीं मिलता है। नीम की लकड़ी से बना इनका विग्रह अपने आप में अद्भुत है जिसके बारे में कहा जाता है कि यह एक खोल मात्र है। इसके अंदर स्वयं भगवान श्री कृष्ण मौजूद होते हैं।
(2) हवा के विपरीत दिशा में:-

जगन्नाथ मंदिर के शिखर पर लहराता झंडा हमेशा हवा के विपरीत दिशा में रहता है।
(3) सुदर्शन चक्र :-

जगन्नाथ पुरी मंदिर की सबसे खास बात मंदिर के सबसे ऊपर लगा सुदर्शन चक्र को आप जिस भी तरफ से देखेंगे वह आपको अपनी तरफ ही दिखाई देगा यह अपने आप में ही अद्भुत है
(5) महाप्रसाद:-

यह है जगन्नाथ जी का महाप्रसाद। मंदिर में प्रसाद बनाने के लिए सात बर्तन एक दूसरे पर रखा जाते हैं। और प्रसाद लकड़ी जलाकर पकाया जाता है। इस प्रक्रिया में लेकिन सबसे ऊपर के बर्तन का प्रसाद पहले पकता है।
(6) हवाओं में चमत्कार

समुद्र तट पर दिन में हवा जमीन की तरफ आती है, और शाम के समय इसके विपरीत, लेकिन पुरी में हवा दिन में समुद्र की ओर और रात को मंदिर की ओर बहती है।
(8) मुख्य गुंबद की छाया किसी भी समय जमीन पर नहीं पड़ती।
(9) मंदिर में कुछ हजार लोगों से लेकर 20 लाख लोग भोजन करते हैं। फिर भी अन्न की कमी नहीं पड़ती है। हर समय पूरे वर्ष के लिए भंडार भरपूर रहता है।
(10) एक पुजारी मंदिर के 45 मंजिला शिखर पर स्थित झंडे को रोज बदलता है। ऐसी मान्यता है कि अगर एक दिन भी झंडा नहीं बदला गया तो मंदिर 18 वर्षों के लिए बंद हो जाएगा।
(11) मन्दिर का रसोई घर दुनिया का सबसे बड़ा रसोइ घर है। विशाल रसोई घर में भगवान जगन्नाथ को चढ़ाने वाले महाप्रसाद को बनाने 500 रसोईये एवं 300 उनके सहयोगी काम करते है।
(12) सिंहद्वार में प्रवेश करने पर आप सागर की लहरों की आवाज को नहीं सुन सकते। लेकिन कदम भर बाहर आते ही लहरों का संगीत कानों में पड़ने लगता है।
आंध्र प्रदेश के अनंतपुर जिले का लेपाक्षी मंदिर(lepakshi temple-Sri Veerabhadra Temple) हैंगिंग पिलर्स (हवा में झूलते पिलर्स) के लिए पूरी दुनिया में मशहूर है। इस मंदिर के 70 से ज्यादा पिलर बिना किसी सहारे के खड़े हैं और मंदिर को संभाले हुए हैं। मंदिर के ये अनोखे पिलर हर साल यहां आने वाले लाखों टूरिस्टों के लिए बड़ी मिस्ट्री हैं। मंदिर में आने वाले भक्तों का मानना है कि इन पिलर्स के नीचे से अपना कपड़ा निकालने से सुख-समृद्धि मिलती है। अंग्रेजों ने इस रहस्य को जानने के लिए काफी कोशिश की, लेकिन वे कामयाब नहीं हो सके।

भारत के गर्भ में कई ऐसे रहस्य छुपे हैं जिनके बारे आजतक कोई जान नहीं पाया। ऐसा ही रहस्य समेटे हुए है आंध्र प्रदेश का लेपाक्षी मंदिर। लेपाक्षी मंदिर को हैंगिंग पिलर टेम्पल के नाम से भी जाना जाता है। यह मंदिर कुल 70 खम्भों पर खड़ा है जिसमे से एक खम्भा जमीन को छूता नहीं है बल्कि हवा में ही लटका हुआ है। जानिए क्या है इस मंदिर का रहस्य-
वनवास के दौरान भगवान श्रीराम, लक्ष्मण और माता सीता यहां आए थे। सीता का अपहरण कर रावण अपने साथ लंका जा रहा था, तभी पक्षीराज जटायु ने रावण से युद्ध किया और घायल हो कर इसी स्थान पर गिरे थे। जब श्रीराम सीता की तलाश में यहां पहुंचे तो उन्होंने ‘ले पाक्षी’ कहते हुए जटायु को अपने गले लगा लिया। ले पाक्षी एक तेलुगु शब्द है जिसका मतलब है ‘उठो पक्षी’।
साथ ही यह भी कहा जाता है कि मंदिर को सन् 1583 में विजयनगर के राजा के लिए काम करने वाले दो भाईयों विरुपन्ना और वीरन्नाने बनाया था। वहीं, पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक इसे ऋषि अगस्त ने बनाया था।
6वीं सदी में बने इस मंदिर के रहस्य को जानने के लिए अंग्रेजों में इसे शिफ्ट करने की कोशिश की, लेकिन वे नाकाम रहे। जब एक अंग्रेज इंजीनियर ने इसके रहस्य को जानने के लिए मंदिर को तोड़ने का प्रयास किया तब यह पता चला की इस मंदिर के सभी पिलर हवा में झूलते हैं।

दूसरी ओर, मंदिर में रामपदम (मान्यता के मुताबिक श्रीराम के पांव के निशान) स्थित हैं, जबकि कई लोगों का मानना है की यह माता सीता के पैरों के निशान हैं।
ये जानकारी आपको कैसी लगी कृपया कमेंट जरूर करे अगर आप कुछ और जानते है इस टेम्पल के बारे में तो हमें जरूर भेजे उसके बारे में।

पद्मनाभस्वामी मंदिर(Sree Padmanabhaswamy Temple) भारत के केरल राज्य के तिरुअनन्तपुरम में स्थित भगवान विष्णु का प्रसिद्ध हिन्दू मंदिर है। भारत के प्रमुख वैष्णव मंदिरों में शामिल यह ऐतिहासिक मंदिर तिरुअनंतपुरम के अनेक पर्यटन स्थलों में से एक है। पद्मनाभ स्वामी मंदिर विष्णु-भक्तों की महत्वपूर्ण आराधना-स्थली है।
पद्मनाभ मंदिर के बारे में तो सुना ही होगा। इसे दुनिया का सबसे अमीर मंदिर माना जाता है। ये मंदिर उस वक्त चर्चाओं और सुर्खियों में आ गया था जब यहां खजाना निकला था। पांच तहखाने खुले और करोड़ों की संपत्ति इसमें से निकली। एक तहखाना अभी भी बंद है। आखिर इस तहखाने में क्या है? पद्मनाभ मंदिर कैसे बन गया इतना अमीर? यह जानने के लिए हमें इतिहास के पन्नों को पलटना होगा।
पद्मनाभ स्वामी मंदिर दुनिया के कुछ सबसे रहस्यमय जगहों में एक है। ये रहस्य है एक दरवाजे का, जिसे आज तक कोई खोल नहीं सका।
माना जाता है कि उसे केवल कोई सिद्धपुरुष ही खोल सकता है, लेकिन आज की तारीख में जो इसे खोल सके ऐसा कोई सिद्ध पुरुष पूरी धरती पर नहीं है। यह भी माना जाता है कि ये दरवाजा भगवान तक जाता है। आखिर क्या है इस दरवाजे का रहस्य? क्या सचमुच इसके पीछे भगवान तक पहुंचने की रास्ता है?
त्रावणकोर के शासकों ने शासन को दैवीय स्वीकृति दिलाने के लिए अपना राज्य भगवान को समर्पित कर दिया था। उन्होंने भगवान को ही राजा घोषित कर दिया था। मंदिर से भगवान विष्णु की एक मूर्ति भी मिली है जो शालिग्राम पत्थर से बनी हुई है।

इतिहासकारों के अनुसार वास्तविकता में इसकी ये अनुमानित राशि इससे कहीं दस गुना ज्यादा होगी। इस खजाने में सोने-चांदी के महंगे चेन, हीरा, पन्ना, रूबी, दूसरे कीमती पत्थर, सोने की मूर्तियां, रूबी जैसी कई बेशकीमती चीजें हैं जिनकी असली कीमत आंकना बेहद मुश्किल है।

मंदिर में पद्मनाभ स्वामी की मूर्ति की स्थापना कब और किसने की, इसकी कहीं कोई ठोस जानकारी नहीं है। त्रावनकोर के इतिहासकार डॉ एल. ए. रवि वर्मा के अनुसार ये रहस्यमय मंदिर 5000 साल पहले कलियुग के पहले दिन स्थापित हुआ था। हालांकि कहीं-कहीं इस मंदिर के 16वीं शताब्दी के होने का भी जिक्र है। लेकिन यह काफी साफ है कि 1750 में ।
भगवान विष्णु को समर्पित इस मंदिर में सिर्फ हिंदू धर्म में आस्था रखने वाले ही जा सकते हैं और यहां प्रवेश के लिए एक खास वस्त्र (ड्रेस कोड) धारण करना भी ज़रूरी है। ये दुनिया का सबसे धनी हिंदू मंदिर है जिसमें बेशकीमती हीरे-जवाहरात जड़े हैं।
कुछ अन्य कहानियों के अनुसार 6वीं सदी में त्रावनकोर के महाराज ने इस मंदिर का निर्माण कराया था और अपने बेशकीमती खजाने को मंदिर के तहखाने में और मोटी दीवारों के पीछे छुपाया था। कई सौ सालों तक किसी ने इसके दरवाजे खोलने की हिमाकत नहीं की। बाद में इसे शापित माना जाने लगा।
मंदिर में 6 तहखाने हैं, जो शापित माने जाते हैं खासकर मंदिर का 7वां द्वार। कथाओं के अनुसार एक बार खजाने की खोज करते हुए किसी ने इसे खोलने की कोशिश की थी, लेकिन उसके अंदर से जहरीले सांप निकलने लगे और सभी मौत को प्यारे हुए।

सिर्फ कुछ मंत्रों के उच्चारण से ही खोला जा सकता है। किसी भी आधुनिक मानव-निर्मित तकनीक या दूसरे मानव-प्रयासों से खोलने या ऐसा करने की कोशिश की दिशा में मंदिर नष्ट हो सकता है और ये प्रलयकारी भी सिद्ध हो सकता है।
तमाम कोशिशों के बावजूद इसका चैंबर-बी दरवाजा खोला नहीं जा सका। हाईकोर्ट की आदेश पर इसे खोलने गए इतिहासकार और न्यायाधीश के अनुसार इस पुरानी तकनीक के ताले को खोलना बेहद मुश्किल है और वो इसे तोड़ना नहीं चाहते।
माना जाता है कि इसे किसी सिद्ध पुरुष ने ‘नाग बंधम’ या ‘नाग पाशम’ मंत्रों का प्रयोग कर बंद किया है। इसलिए उतनी सिद्धियों के साथ ही इसे केवल ‘गरुड़ मंत्र’ का मंत्रोच्चार करते हुए ही खोला जा सकता है, वरना तकनीक या बल-प्रयोग से इसे खोलना विनाशकारी सिद्ध हो सकता है।
फिलहाल भारत या दुनिया के किसी भी कोने में ऐसा सिद्ध पुरुष नहीं है। वैदिक साधना करने वाले कई साधुओं ने इसे खोलने की कोशिश की, लेकिन इसे खोल नहीं सके। इसलिए अभी तक इस मंदिर के चैंबर-बी का ये दरवाजा सबके लिए एक रहस्य बना हुआ है। इसके अंदर कितना भी बड़ा खजाना हो, या ना हो, लेकिन इतना जरूर कि ये दरवाजा भी स्वयं में ही में किसी अबूझ पहेली से कम नहीं है।