भारत प्रसिद्ध है इसकी ऐतिहासिक विरासत से जो की एक ख़ज़ाने की तरह है। भारत प्रसिद्ध है इसकी ऐतिहासिक विरासत से जो की एक ख़ज़ाने की तरह है। क्या आप Top 100+ historical places in india के बारे में जानना चाहते है। तो आप निचे दिए गये सभी बेशकीमती ऐतिहासिक जगह को देख सकते है। उनकी खूबिया क्या क्या है जो उन्हें एक दूसरे से अलग बनती है।

भारत के बाकी हिस्सों के विपरीत, मलााना के गांव में अपनी धार्मिक मान्यताओं हैं। शिव में उनके अविश्वासित विश्वास के अलावा, वे अपने देवता, जमुलू ऋषि में विश्वास करते हैं। ऐसा कहा जाता है कि पुराणों के एक ऋषि एक बार भूमि में रहता था और लोकतंत्र की नींव रखता था, जो अभी भी पूरी तरह कार्यात्मक संसदीय प्रणाली के रूप में काम करता है।मालानी लोगों का मानना है कि वे अलेक्जेंडर के वंशज हैं और शुद्धता और प्रदूषण से जुड़े उनके अनुष्ठान उनके विश्वास के रूप में कड़े हैं। और उनको वो
नहीं छोड़ सकते।

राजा परीक्षित को शाप मिलना
एक बार राजा परीक्षित जंगल में शिकार खेलने गये. शिकार की तलाश में घूमते-घूमते वे भूख-प्यास से पीड़ित हो गये. पानी तलाश करते-करते वे शमीक मुनि के आश्रम में पहुँचे जहां पर मुनि समाधिस्थ थे. राजा ने कई बार मुनि से पानी की याचना की, परंतु कोई उत्तर न मिलने पर, राजा ने एक मरे हुए साँप को धनुष की नोंक से उठाकर, शमीक मुनि के गले में डाल दिया, परंतु शमीक मुनि को समाधि में होने के कारण इस घटना का कोई भान ही नहीं हुआ.
शमीक मुनि के पुत्र श्रृंगी ऋषि को जब यह पता लगा तो उन्होंने गुस्से से हाथ में जल लेकर राजा को शाप दे दिया कि जिसने भी मेरे पिता के गले में मरा हुआ साँप डाला है आज से सातवें दिन इसी सांप (तक्षक) के काटने से उसकी मृत्यु हो जायेगी.
वह अपने पिता के गले में मरा हुआ सांप पड़ा देखकर जोर- जोर से रोने भी लगे. रोने की आवाज सुनकर शमीक मुनि की समाधि खुली और उन्हें सब समाचार विदित हुए. मुनि ने श्रृंगी से दुःखपूर्वक कहा कि वह हमारे देश का राजा है और समझाया कि राजा के पास सत्ता का बल होता है. राजा उस सत्ता के बल का दुरुपयोग कर सकता है, परंतु ऋषि के पास साधना का बल होता है और ऋषि को साधना के बल का दुरुपयोग नहीं करना चाहिए. अत: राजा को तुम्हें शाप नहीं देना चाहिए था.
श्राप ने कैसे राजा का जीवन ही परिवर्तित कर दिया:-
राजा परीक्षित को जब श्राप के बारे में पता लगा तब उन्हें अपनी गलती का भान हुआ. वे अपने पुत्र जनमेजय को राजपाट सौंपकर हस्तिनापुर से शुकताल पहुँच गये. गंगा जी के तट पर वट वृक्ष के नीचे बैठ कर राजा परीक्षित श्रीकृष्ण भगवान का ध्यान करने लगे. वहीं परम तेजस्वी शुकदेव जी प्रकट हुए और अनेक ऋषि-मुनियों के मध्य एक शिला पर आकर बैठ गये. मातृ-शुद्धि(माता के कुल की महानता), पितृ-शुद्धि (पिता के कुल की महानता), द्रव्य-शुद्धि (सम्पत्ति का सदुपयोग) अन्न-शुद्धि और आत्म-शुद्धि (आत्मज्ञान की जिज्ञासा) एवं गुरु कृपा के कारण ही परीक्षित जी भागवत कथा सुनने के अधिकारी हुए.
हम सभी के जीवन में भी क्यों सिर्फ सात दिन है:-
परीक्षित को सात दिनों में मृत्यु का भय था. सप्ताह के सात दिन होते हैं. किसी न किसी दिन हमारी भी मृत्यु निश्चित है. परंतु ये सात वार हमारे जीवन का मार्गदर्शन करते हैं. यदि सकारात्मक रूप से देखें तो हमको इन सात वारों से सुन्दर शिक्षा मिलती है. राजा परीक्षित श्राप मिलते ही मरने की तैयारी करने लगते हैं. इस बीच उन्हें व्यासजी उनकी मुक्ति के लिए श्रीमद्भागवत्कथा सुनाते हैं. व्यास जी उन्हें बताते हैं कि मृत्यु ही इस संसार का एकमात्र सत्य है.
अक्षय वट वृक्ष के नीचे गंगा तट के समीप शुक देव जी ने राजा परीक्षित को श्रीमद भागवत सुनाया था। और वो मुक्त हो गए और सीधा भगवान चरणों में चले गए और तक्षक उनका कुछ भी नहीं बिगाड़ पाया। इसलिए तब से ये स्थान शुक्रताल के तीर्थ स्थल के रूप में जाने जाना लगा।

कृष्णागिरी में KRP बांध एक बहुत ही खूबसूरत जगह है। जहा बांध की खुबसुरती के साथ आस पास हरयाली का भी ध्यान रखा गया है। कृष्णागिरी रिजर्वोइयर प्रोजेक्ट (केआरपी बांध) कृष्णागिरी का मुख्य आकर्षण है। यह बांध कृष्णगिरी शहर से 7 किमी की दूरी पर धर्मपुरी और कृष्णागिरी के बीच स्थित है। यह कृष्णगिरी के सिंचाई उद्देश्य को पूरा करने के लिए तेपेपेई नदी में बनाया गया है।

कृष्णागिरी रिजर्वोइयर प्रोजेक्ट(KRP) भी एक लोकप्रिय पिकनिक स्थान है, क्योंकि इसमें बगीचे और हरे-भरे हरियाली हैं।
यह बांध 1 9 58 में तत्कालीन मुख्यमंत्री के राज्य को समर्पित था और लगभग हजारों एकड़ जमीन सिंचाई करता था। यह पेरियामुथुर, सुन्डेप्पुम, थिममुपुरम, चौटाहल्ली, गुंडलापट्टी, मिट्टाहल्ली, इरहाल्ली, कावेरीपट्टिनम, पाययूर और कृष्णागिरी के अन्य गांवों को पेयजल भी प्रदान करता है।
इसे एक पर्यटक आकर्षण और पिकनिक स्थान बनाने के लिए, राज्य के लोक निर्माण विभाग द्वारा बनाए गए विदेशी भूनिर्माण और बच्चों के पार्क वहां मौजूद हैं। कृष्णागिरी में स्थापित एक कृषि अनुसंधान केंद्र भी है। यह भी एक प्रसिद्ध पर्यटन स्थल है। यहाँ पर पर्यटको की भीड़ रहती है।
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कृष्णागिरि एक पर्यटन स्थल के रूप में काफी लोकप्रिय है। यहां का सबसे प्रमुख पर्यटन आकर्षण केआरपी बांध है। इसके अलावा, कृष्णागिरि में कई ऐतिहासिक स्थल, मंदिर, पार्क, किले और प्राकृतिक स्थल है।






जहां प्रकृति की सुंदरता प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है। इस जगह पर आकर बहुत ही शांति मिलती है। यह हमारे देश की विरासत है। यह प्रकृति विरासत(heritage) हम सभी को मिली हैं जब कभी भी समय मिले कभी भी आप इधर से गुजरे तमिलनाडु की तरफ आए तो कृष्णागिरी आना ना भूलें। आपको बहुत ही अलग अनुभव होगा अगर आप पहले गए हैं तो जरूर अपना अनुभव शेयर करें लोगों को बताएं इस जगह के बारे में। धन्यवाद
एक ऐसी अद्भुत जगह जहां श्री कृष्ण जी पर्वत के रूप विराजमान है
श्री गोवर्धन सिर्फ पर्वत नहीं है ये श्री कृष्ण जी का स्वरुप है जो कलयुग में प्रत्यक्ष है। हर कोई अपनी आँखों से देख सकता है यहाँ आकर एक अद्भुत शांति की प्राप्ति होती है।
मथुरा नगर के पश्चिम में लगभग 21 किमी की दूरी पर यह पहाड़ी स्थित है। यहीं पर गिरिराज पर्वत है जो 4 या 5 मील तक फैला हुआ है। इस पर्वत पर अनेक पवित्र स्थल है। पुलस्त्य ऋषि के श्राप के कारण यह पर्वत एक मुट्ठी रोज कम होता जा रहा है। कहते हैं इसी पर्वत को भगवान कृष्ण ने अपनी छोटी अँगुली पर उठा लिया था। गोवर्धन पर्वत को गिरिराज पर्वत(Govardhan Hill )भी कहा जाता है।
भगवान श्री कृष्ण(shri krishna) की लीलाओं में विशेष लीला वृंदावन(vrindavan) में हुई वह अद्भुत लीला थी जिस लीला के कारण श्री कृष्ण का वह चमत्कार(miracle) देख आज हजारों लाखों लोगों आकर्षित होते हैं भगवान श्री कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत(Govardhan Hill )उठा लिया था यह लीला कुछ इस प्रकार घटित हुई कृष्ण बलराम रोज की तरह गायों को चराने गए जब गाय चढ़ाकर भगवान वापस आए तो उन्होंने देखा पूरा का पूरा वृंदावन सभी कुछ विशेष सामग्री पूजा की थाली लेकर नंद बाबा के कहने पर बड़े पूजा की तैयारी कर रहे थे .
श्री कृष्ण छोटे थे वो पूछने अलगे यज्ञ तैयारी और किस लिए वह सवाल करने लगे नंदबाबा से। श्री कृष्ण(Shri krishna) जानते तो सब कुछ थे फिर भी नंद जी से पूछते हैं बाबा यह हम सब किनकी पूजा की तैयारी कर रहे हैं फिर क्या था नंद बाबा ने बालक समझकर कृष्ण को कहा यह तो हम लोग हर साल करते हैं उसी पूजा की तैयारी है। नहीं बाबा मुझे बताइए यह किस भगवान के लिए पूजा(puja) की जा रही है पहले नंद बाबा ने टालने की कोशिश की लेकिन फिर नंद बाबा ने कहा हम लोग इंद्र की पूजा कर रहे हैं क्योंकि इंद्र हमें वर्षा प्रदान करते हैं वर्षा के कारण हमारा खेत अच्छे से फलता-फूलता है कृष्ण जी ने कहा वर्षा तो हर जगह होती है वर्षा होती है तो खेतों पर भी होती है खेतों पर होती है समुद्र में भी होती हर जगह होती है लेकिन सभी लोग तो इंद्र जी की पूजा नहीं करते बारिश तो हर जगह होती है इस प्रकार से तर्क दिया तो नंद बाबा कुछ बोल नहीं पाए उन्होंने कहा कि यह पूजा कई पीढ़ियों से चली आ रही है तो इसीलिए हम भी कर रहे हैं क्या इसका शास्त्रों में वर्णन है यह हम लोग कई पीढ़ियों से करते आ रहे हैं। हम बरसों से बस करते चले आ रहे हैं।
श्री कृष्णा जी ने कहा हमें विशाल गोवर्धन की पूजा करनी चाहिए क्योंकि हम गोवर्धन की पूजा करेंगे तो गोवर्धन ही तो हमारी गायों को भोजन देती है जिससे कि गायों की भरपूर दूध से हम सबकी सेवा होती है। हमें चाहिए कि हम गोवर्धन की पूजा करें। तर्क देने के बाद वास्तव में भगवान श्री कृष्ण लीला के द्वारा यह समझाना चाह रहे हैं देवता तो बहुत सारे हैं मुख्य देवता 33 है लेकिन संख्या में 33 करोड़ देवता हैं सारे पृथ्वी से ऊपर के लोग में रहते हैं एक ब्रह्मांड की 14 लोक है पृथ्वी के नीचे सात लोक हैं भगवान कृष्ण अर्जुन को भगवत गीता में बोलते हैं हे अर्जुन यह जो ब्राह्मण है इसमें जितने लोग हैं चाहे ऊपर जाएं या मृत्यु के पश्चात नीचे जाए इन सब लोगों में दुख है और मृत्यु है और फिर से जन्म होता है यहां तो कई बार हम यह सोचते कि दुखों के कारण अपना घर बदलते बदलते हैं देश बदलते और यह सोचते हैं कि हमारे दुख कम हो जाएगा लेकिन दुख खत्म नहीं होता मानसिक चिंताएं खत्म नहीं होती
श्री कृष्णा ने कहा हमें देवताओं की पूजा नहीं करनी चाहिए हमें कर्म की पूजा करनी चाहिए हमें भगवान की पूजा करनी चाहिए और गोवर्धन पर्वत साक्षात भगवान का स्वरुप है क्योंकि वह हम सभी को छाया प्रदान करते हैं हम सभी के गायो को अन धन प्रदान करते हैं इसीलिए हम सभी को गोवर्धन महाराज के शरण में जाना चाहिए वह हम सब की पूजा जरूर स्वीकार करेंगे बस इतना ही सुनना था नंद बाबा ने कन्हैया की बात मान ली और सभी ग्वाल-बाल गैया मैया सभी को साथ लेकर सब बड़ी ही मस्त से होकर गोवर्धन महाराज की पूजा करने गए उन्होंने छप्पन भोग गोवर्धन महाराज को लगाया और खूब खूब अच्छे से उनकी पूजा सेवा की बस इतना देखते ही इंद्र देवता क्रोधित हो गए और उन्होंने बहुत ही मूसलाधार बारिश कि जिससे कि पूरा ब्रज गांव में जल ही जल हो गया था पूरा ब्रज गांव डूबने लगा था.
सब देख कर इंद्र देवता को लगा :- कि उन्होंने कुछ गलत किया है तो वह कृष्ण भगवान से क्षमा मांगने लगे ऐसा नहीं करना चाहिए तभी उनका नाम गोविंद नाम पड़ा गोवर्धनधारी नाम पड़ा। श्री. कृष्ण कहते हैं जब हमें अपने दुखों के पहाड ना उठे तो एक बार सच्चे मन से जो उनकी शरण में जाए तो वो सभी के दुखों का पहाड़ जरूर उठाएंगे पर विश्वास और श्रद्धा होना चाहिए। जैसे ब्रजवासी सीधा गोवर्धन भगवान की शरण में ही गए। श्री कृष्ण जी के ऊपर अपनी श्रद्धा भाव दिखाया आंख बंद करके उनके शरण में चले गए इस प्रकार आज भी गोवर्धन पर्वत हम सभी की इच्छाओं को पूरा करते हैं श्रद्धा और भक्ति भावना चाहिए। आज बहुत से लोगों की श्रद्धा गोवर्धन महाराज से जुड़ी हुई है हर महीने लोग यहां पर परिक्रमा के लिए आते हैं और अपने दुखों को बांटते हैं और उनको दुख कम करने का वर मांगते है और उनकी इच्छाएं पूरी होती है कलयुग में साक्षात प्रकट है श्री कृष्ण जी का स्वरुप। श्री. गोवर्धन महाराज की जय हो जय हो श्री गोवर्धन महाराज महाराज नित्य आया करो।
श्री. गोवर्धन महाराज की जय हो

एक वीर योद्धा की जन्मभूमि
सरयू नदी के किनारे पर पवित्र शहर अयोध्या(Ayodhya) है। यह भगवान विष्णु के सातवें अवतार के रूप में माना जाता है, जो कि श्री राम जी का जन्मस्थान है। अयोध्या एक प्रमुख तीर्थ स्थान है यहाँ मंदिरों ayodhya ka ram mandir में कई धर्मों ने बड़े पैमाने पर और साथ-साथ कई बार समयावधि में भी विकास किया है। हिन्दू धर्म, बौद्ध धर्म, जैन धर्म के अवशेष, अब भी अयोध्या में पाये जा सकते हैं। रामायण में अयोध्या के बारे में उल्लेख है कि शहर की स्थापना हिंदुओं के विधायक मनु ने की थी। अयोध्या को शुरूआती कोसल देश के नाम से जाना जाता था और सत्ताधारी राजवंश के रूप में जाना जाता था। श्री राम जी सूर्यवंश राजवंश के थे।
“जानकारी अच्छी लगे तो सभी से शेयर जरूर करे क्युकी आज हमारी खोती हुई भारतीय संस्कृति जो विरासत में मिली उसको को प्रसार की जरुरत है जिससे आने वाली पीढ़ियों तक इसकी चमक पहुंच सके। और अपनी मातृभाषा हिंदी पे हमेशा गर्व कीजिये और इसका सम्मान-प्रसार जरूर कीजिये। “
अयोध्या पुण्यनगरी है। अयोध्या श्रीरामचन्द्रजी की जन्मभूमि होने के नाते भारत के प्राचीन साहित्य व इतिहास में सदा से प्रसिद्ध रही है। अयोध्या की गणना भारत की प्राचीन सप्तपुरियों में प्रथम स्थान पर की गई है। अयोध्या के श्री राम, राम जू की अजोध्या …! त्रेता, द्वापर और अब कलयुग…लाखों वर्ष बाद, आज भी राम अचल हैं अविनाशी हैं. जब तक राम हैं तभी तक अयोध्या का महत्व रहेगा
गंगा बड़ी गोदावरी,
तीरथ बड़ो प्रयाग,
सबसे बड़ी अयोध्यानगरी,
जहँ राम लियो अवतार।
अयोध्या(Aayodhya) शब्द का स्पष्ट अर्थ है “जो हराया नहीं जा सकता” इस तीर्थस्थान में कई मंदिर हैं। और अधिकतर मंदिर भगवान राम और उनके परिवार और मित्रो को समर्पित हैं।
प्राचीन समय के दौरान अयोध्या को कोशल देश के नाम से जाना जाता था अथर्ववेद ने इसे “देवता द्वारा बनाया गया शहर और स्वर्ग के रूप में समृद्ध होने” के रूप में वर्णन किया सूर्यवंश इस शानदार और मशहूर कोशल देश का शासक वंश था।
अयोध्या श्री राम जन्मभूमि(shri ram janam bhoomi) है, जहां भगवान राम जी का जन्म हुआ था। यहां एक छोटा सा भगवान राम मंदिर है। वहां बाबरी मस्जिद का इस्तेमाल हुआ था, जो 15 वीं सदी में मुग़ल द्वारा निर्मित किया गया था। बाद में 1992 में मस्जिद थोड़ी नष्ट हो गई थी, और वर्तमान समय में एक भव्य राम मंदिर का निर्माण करने की योजना है।
अयोध्या हिन्दू धर्म के आस्था का केंद्र है . अयोध्या को प्रभु श्री राम की जन्मस्थली के रूप में प्रसिद्धि मिली. पर यह धरती कई धर्मों के लिए महत्पूर्ण रही है. इस धरती पर सिख, बौध, जैन, सूफ़ी धर्म गुरुओं ने अपनी अपनी तरीके से अध्यात्म का यश फैलाने पर काम किया है. जिसकी खुशबू यहाँ के सौहार्दपूर्ण वातावरण में महसूस होती है. अयोध्या में भगवा ध्वज, मालाएं, प्रसाद बनाने वाले आधे से अधिक कारीगर मुसलमान हैं।
यहाँ कुछ प्रमुख स्थान है जहां प्रसिद्ध मंदिर और ऐतिहासिक जगह है
कनक भवन अयोध्या का एक महत्वपूर्ण मंदिर है। यह मंदिर सीता और राम के सोने के मुकुट पहने प्रतिमाओं के लिए लोकप्रिय है. मुख्य मंदिर आतंरिक क्षेत्र में फैला हुआ है, जिसमें रामजी का भव्य मंदिर स्थित है। यहां भगवान राम और उनके तीन भाइयों के साथ देवी सीता की सुंदर मूर्तियां स्थापित हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार राम विवाह के पश्चात् माता कैकई के द्वारा सीता जी को कनक भवन मुंह दिखाई में दिया गया था। जिसे भगवान राम तथा सीता जी ने अपना निज भवन बना लिया
अयोध्या मुख्य रूप से मंदिरों का एक पवित्र तीर्थस्थान है। पूजा के सभी स्थान यहां हैं, जिनमें हिंदू धर्म भी शामिल है। उत्तर प्रदेश के एक महत्वपूर्ण धार्मिक केंद्र होने के दौरान अयोध्या सबसे पवित्र रहा है। जब भगवान पृथ्वी पर उपस्थित थे, अयोध्या उनकी गतिविधियों का केंद्र था।
गुप्तर घाट में अच्छे मंदिरों का एक गुच्छा है और इसके पास एक अच्छा पार्क है। गुप्तर को गायब होने के रूप में परिभाषित किया गया है यह वह स्थान है जहां राम ने अपना शरीर छोड़ दिया। यहां कुछ अच्छे मंदिर मौजूद हैं, जिसे चक्र हरजी विष्णु, गुप्त हरजी और अन्य राजा मंदिर कहते हैं। चक्र हरजी विष्णु मंदिर में बहुत से देवता हैं, जिसमें बहुत पुराने नक्काशीदार चक्र हरजी विष्णु देवता प्रतीत होता है। यहां श्री राम के पैर की एक छाप भी है। 1 9वीं शताब्दी में राजा दशरथ सिंह ने मंदिर और छोटे महल का निर्माण किया। Read More…
जन्मभूमि अयोध्या में पूजा के प्रमुख और महत्वपूर्ण स्थान रामकोट के प्राचीन गढ़ की जगह है, जो शहर के पश्चिमी भाग में एक ऊचे भूमि पर खड़ा है। यह पवित्र स्थान पूरे भारत और विदेश से भक्तों को आकर्षित कर रहा है, भगवान के जन्म के दिन ‘रामानवमी’ पर, इस जगह को उमंग फूलों से सजाया जाता है और बहुत ही धूमधाम के साथ मनाया जाता है जो की चैत्र (मार्च-अप्रैल) के हिंदू माह में। Read More…
यहाँ श्री हनुमान जी वास करते हैं। अयोध्या आकर भगवान राम के दर्शन के लिए भक्तों को हनुमान जी Hanuman Aarti के दर्शन कर उनसे आज्ञा लेनी होती है. 76 सीढ़ियों का सफर तय कर भक्त पवनपुत्र के सबसे छोटे रूप के दर्शन करते हैं.अयोध्या नगरी में आज भी भगवान श्रीराम का राज्य चलता है. मान्यता है कि भगवान राम जब लंका जीतकर अयोध्या लौटे, तो उन्होंने अपने प्रिय भक्त हनुमान को रहने के लिए यही स्थान दिया. साथ ही यह अधिकार भी दिया कि जो भी भक्त यहां दर्शन के लिए अयोध्या आएगा, उसे पहले हनुमान का दर्शन-पूजन करना होगा…Read More….
त्रेता के ठाकुर का यह विशेष स्थान है, जहां पर श्री राम ने अश्वमेधा यज्ञ का प्रदर्शन किया है। अश्वमेधा यज्ञ इस रीति से किया गया था, हर तरफ घूमने के लिए घोड़ों को छोड़ दिया गया था। उन स्थानों पर जहां घोड़े जायेंगे, वे यज्ञ कलाकार के शासनकाल में आएंगे।
लगभग 300 साल पहले कुल्लू के राजा ने यहां एक नया मंदिर बनाया था, जो इंदौर के अहिल्याबाई होलकर ने 1784 की अवधि में सुधार किया था। इसी समय, अन्य सटे घाट भी बनाए गए थे। काले बलुआ पत्थर की प्रारंभिक मूर्तियां सरयू से बरामद की गईं और नए मंदिर में रखीं, जो अब कलरम का मंदिर के रूप में प्रसिद्ध हैं। Read More..
शिव पुराण के अनुसार, एक बार नौका बिहार करते समय उनके हाथ का कंगन पवित्र सरयू में गिर गया, जो सरयू में वास करने वाले कुमुद नाग की पुत्री को मिल गया। यह कंगन वापस लेने के लिए राजा कुश तथा नाग कुमुद के मध्य घोर संग्राम हुआ। जब नाग को यह लगा कि वह यहां पराजित हो जायेगा तो उसने भगवान शिव का ध्यान किया। भगवान ने स्वयं प्रकट होकर इस युद्ध को रुकवाया। Read More
काले राम मंदिर राम की पैड़ी के पास स्थित नागेश्वर नाथ मंदिर के ठीक पीछे है, यह मन्दिर भी प्राचीन मन्दिरों में गिना जाता है. मन्दिर के महंत के अनुसार के राजा दर्शन सिंह के समय लगभग 1748 में भारत के महाराष्ट्रिय ब्राह्ममण योगी पं0 श्री नरसिंह राव मोघे को एक स्वप्न में हुए आदेश के अनुसार Read More
मान्यता है कि छोटी देवकाली की प्रतिष्ठा माता जानकी की ग्राम देवी या कुल देवी के रूप में हुयी. जगत जननी माँ सीता जी विवाहोपरांत अपने पितृ गृह जनकपुरी से जब अयोध्या के लिए चलीं, तो अपनी कुल देवी जो कि गौरी मंगला के रूप में थीं, अपने साथ ले आयीं. इसके पश्चात Read More
क्षीरेश्वर मन्दिर अयोध्या के प्राचीन मन्दिरों में से एक है. इस मन्दिर में स्वयंभू शिवलिंग का प्राकट्य इस मन्दिर को विशेष बनाता है. मन्दिर के पुजारी के अनुसार मन्दिर के गर्भ गृह में स्वम्भू शिवलिंग, 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक उज्जैन के महाकालेश्वर में शिवलिंग के समान है. क्षीरेश्वर मन्दिर अयोध्या फैजाबाद मार्ग पर श्री राम हॉस्पिटल के ठीक सामने स्थित है. मुख्य मार्ग पर स्थित होने के कारण मन्दिर के दर्शन सुगम हो जाते हैं. क्षीरेश्वर मन्दिर महादेव का मन्दिर है. ऐसी मान्यता है कि जो भी भक्त इस मन्दिर में स्थापित शिवलिंग की पूरे विधि विधान से पूजा करता है उसकी हर मनोकामना पूर्ण होती है.
अयोध्या को मन्दिरों की नगरी भी कहा जाता है, यहाँ करीबन 7000 से अधिक मन्दिर हैं. पर विजय राघव मन्दिर अपने आप में निराला मन्दिर है. यह रामानुज सम्प्रदाय का प्राचीन एवं प्रमुख मन्दिर है. जो कि विभीषण कुण्ड के सामने स्थित है. मन्दिर की स्थापना 1904 के लगभग स्वामी बलरामाचारी द्वारा की गयी थी. इस मन्दिर में स्थापित प्रभु राम के विगृह को दक्षिण भारत से ही लाया गया था. यह मन्दिर रामानुज सम्प्रदाय के अत्यंत महत्व वाला मन्दिर है. वैष्णवों के लिए यह स्थान किसी तीर्थ से कम नहीं है. इस मन्दिर में अनुशासन के साथ गुरुकुल एवं वैदिक परम्पराओं का अनुसरण किया जाता है
यह मन्दिर अयोध्या के ह्रदय कहे जाने वाले रामकोट में राम जन्म भूमि के निकट स्थित है. यह स्थाम यूँ तो श्री राम के पुत्र लव कुश जी का है, पर यहाँ सावन झूला महोत्सव और तुलसी शालिगराम विवाह अत्यंत प्रचलित है. राम जन्म भूमि के दर्शन के लिए आने वाले श्रद्धालु भगवान श्री राम के पुत्रगण लव कुश के दर्शन अवश्य करते हैं.
अयोध्या के रामकोट मोहल्ले में राम जन्म भूमि के निकट भव्य रंग महल मन्दिर स्थित है. ऐसा माना जाता है कि जब सीता माँ विवाहोपरांत अयोध्या की धरती पर आयीं. तब कौशल्या माँ को सीता माँ का स्वरुप इतना अच्छा लगा कि उन्होंने रंग महल सीता जी को मुँह दिखाई में दिया. विवाह के बाद भगवान श्री राम कुछ 4 महीने इसी स्थान पर रहे. और यहाँ सब लोगों ने मिलकर होली खेली थी. तभी से इस स्थान का नाम रंगमहल हुआ. इस मन्दिर में आज भी होली का त्यौहार हर्षोल्लास से मनाया जाता है. फाल्गुन माह में यहाँ होली खेलने का विशेष इंतजाम होता है.
रत्न सिंहासन या राजगद्दी वह स्थान है जहाँ श्री राम भगवान ने 11000 वर्ष बैठ के राज किया. उन्होंने यहाँ बैठ के ही अपनी प्रजा का न्याय किया. जब मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम लंका के राजा रावण का वध करके पहली बार अयोध्या वापस आये, तब उनका राज्याभिषेक इसी सिंहासन पर किया गया. हर्षित होकर देवताओं ने फूल बरसाए, इंद्र कुबेर ने सोने चांदी एवं मणियों से सवा प्रहर तक राज्याभिषेक किया. पूरे अयोध्या को दीपों से सजाया गया. इस मन्दिर के गर्भ गृह में प्रभु श्री राम जी हैं, दाहिने तरफ लक्ष्मण जी और बाएं तरफ जगत माता सीता जी विराजमान हैं . उनके पीछे अत्यंत प्राचीन विग्रह हैं
मणि पर्वत मन्दिर लगभग 200 फीट ऊँचे टीले पर स्थित है. इसकी छत से पुरे अयोध्या के दर्शन होते हैं. भगवान श्री राम के विवाह के पश्चात से यहाँ झूले की परंपरा चली आ रही है. मान्यता है कि झुला महोत्सव के रूप में मनाये जाने वाले इस अवसर पर अयोध्या में विराजमान समस्त भगवान यहाँ झूला झूलने आते हैं. सावन के महीने में माता सीता ने जी ने इस स्थान पर पंचमी मनाई थी, झूला झूली थी. तभी से यहाँ झूला उत्सव मनाया जाता है.
यह तीर्थ सिखों के लिए अत्यंत पवित्र है. सिखों के प्रथम नवं एवं दसम गुरुओं ने इस धरती पर अपने श्री चरण रखे. गुरुओं के आने और यहाँ प्रवचन देने से इस स्थान की महत्ता और बढ़ गयी. उसके पूर्व से यह स्थान ब्रम्ह कुण्ड के नाम से जाना जाता था. बताया जाता है जब श्री राम अयोध्या पूरी को आये थे, उस समय सारे देवता यहाँ आये थे राजतिलक देने के लिए. राजतिलक में ब्रम्हा जी भी आये थे. राज्याभिषेक होने के बाद ब्रम्हा जी ने राम चन्द्र जी से कहा कि मेरा भी उद्धार करो, तब श्री राम चन्द्र जी ने कहा कि तुम तप करो. पहले इस जगह का प्राचीन नाम तीर्थराज था
यह कम अचरज की बात नहीं है कि हमारे देश विभिन्न धर्मों के गुरुओं ने अयोध्या की पावन धरती को भक्ति भाव से अभिसिंचित किया है. तब और आश्चर्य होता है जब यह पता चलता है कि यहाँ से हजारों किलोमीटर दूर दक्षिण कोरिया के लिए भी यह स्थान उतना ही महत्वपूर्ण है जितना हम भारतियों के लिए . कोरिया की पुरातन इतिहास गाथा के अनुसार प्राचीन कोरियाई कारक राज्य के संस्थापक राजा सूरो की धर्मपत्नी रानी हो का जन्म अयोध्या नगर में हुआ था.
अयोध्या आये तो इन सभी स्थानो पे जरूर जाये।
अयोध्या परिक्रमा (Ayodhya parikrama)
नोट : अगर आप कुछ और जानते है या इसमें कोई त्रुटि है तो सुझाव और संशोधन आमंत्रित है।
जय श्री राम
अयोध्या(Aayodhya) शब्द का स्पष्ट अर्थ है “जो हराया नहीं जा सकता”
अंबरनाथ शिव मंदिर (ancient ambernath shiv mandir Temple), महाराष्ट्र का अंबरनाथ मंदिर भगवान शिव को समर्पित है। मंदिर में मिले एक शिलालेख के अनुसार इसका निर्माण 1060 ईस्वी में शिलाहट के राजा मांबणि ने करवाया था। वहां के स्थानीय निवासी इस मंदिर को पांडवकालीन मानते हैं। यह मंदिर प्राचीन हिन्दू शिल्पकला की ज्वलंत मिसाल है। ग्यारहवीं शताब्दी के मध्य में बने अंबरनाथ शिव मंदिर (shiv mandir ambarnath) के बारे में कहा जाता है कि इसके जैसा मंदिर पूरी दुनिया में और कहीं नहीं।
इस मंदिर में गभरा नामक मुख्य कमरे में नीचे जाने के लिए 20 सीढ़ियाँ हैं; और कमरे के केंद्र में एक शिवलिंग है। महाशिवरात्रि के अवसर पर भगवान शिव से आशीर्वाद पाने के लिए अंबरनाथ में एक बड़ा मेला लगता है। इस मंदिर के बाहर दो नंदी बने हैं। मंदिर की मुख्य मूर्ति त्रैमस्तिकी है, इसके घुटने पर एक नारी है, जो शिव—पार्वती के स्वरूप को दर्शाती है। वलधान नदी के तट पर बना मंदिर इमली और आम के पेड़ों से घिरा हुआ है। मंदिर की वास्तुकला उच्चकोटि की है। यहां वर्ष 1060 ई. का एक प्राचीन शिलालेख भी पाया गया है। इस नगर में आप दियासलाई के कारखानों का भ्रमण भी कर सकते हैं।
महा शिवरात्रि के अवसर पर एक भव्य मेला आयोजित किया जाता है जो हजारों भक्तों द्वारा दौरा किया जाता है। महा शिवरात्रि मेला 3–4 दिनों तक चलता है। महा शिवरात्रि के दिन, तीर्थयात्रियों के भारी प्रवाह के कारण अंबरनाथ का पूर्वी भाग वाहनों के लिए अवरुद्ध हो जाता है। मंदिर श्रावण के महीने में भीड़भाड़ वाला हो जाता है।
मंदिर दिनभर दर्शनों के लिए खुला रहता है। माघ के महीने में शिवरात्रि के अवसर पर यहां विशाल मेले का आयोजन होता है।
इस मंदिर को पुनर्निर्माण किया गया है लेकिन पौराणिक कथा यह है कि यह एक एकल पत्थर से पांडवों द्वारा बनाया गया था।
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‘मानवीय हाथों से बना ऐसा चमत्कार मुंबई के मुहाने पर मौजूद है और मुंबईवाले ही उसे नहीं जानते- यह अपने आप में एक चमत्कार है’, जाने-माने पत्रकार प्रकाश जोशी अपना विस्मय रोक नहीं पाते, और यह सच है। काम पर आते-जाते विश्व विरासत(virasat) छत्रपति शिवाजी टर्मिनस को आप रोज ही देखा करते हैं। गाहे-बगाहे गेट-वे ऑफ इंडिया, एलिफेंटा केव्ज, मरीन ड्रॉइव और चौपाटी भी हो आते हैं। सिद्धिविनायक और बाबुलनाथ को सिर नवाना भी नहीं भूलते। पर, याद कीजिए, पहाड़ की तलहटी में बसे, मलंगगढ़ की विहंगम छटा दिखाने वाले अंबरनाथ के शिव मंदिर(shiv mandir at ambernath) के दर्शन करने पिछली बार आप कब गए थे- जो आपके प्रिय हिल स्टेशन खंडाला से आधे से कम दूरी पर है और अछूते सौंदर्य के लिहाज से उससे उन्नीस नहीं। बताइए, क्या आपके बच्चों ने इस मंदिर का नाम भी सुन रखा है…?
यूनेस्को द्वारा घोषित यह सांस्कृतिक विरासत इस वक्त अपने अस्तित्व के संकट से जूझ रही है। यह उस जगह का हाल है, जिसे यूनेस्को ने अपनी सांस्कृतिक विरासत घोषित कर रखा है। विश्व भर में ऐसे कुल 218 ठिकाने हैं। इनमें भारत के पास महज 25 हैं और महाराष्ट्र में तो केवल चार। काश, पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने बाहर लगे सूचना पट पर ‘अंबरेश्वर’ (या ‘अमरनाथ’) के संरक्षित स्मारक होने की घोषणा करने के साथ इसकी देखभाल के लिए भी कुछ किया होता! सुशोभीकरण और आकर्षण वृद्धि तो दूर की बात, दरअसल, मंदिर का अस्तित्व ही इस समय खतरे में है। संरक्षण-दरअसल, अंबरनाथ के सन्मुख सबसे बड़ा मुद्दा इस समय यही है। भीतर लगे सुंदर पच्चीकारी वाले लौह स्तंभ और खूबसूरत पत्थर अपने जीर्ण होने की चुगली करते हैं। छतों और दीवारों को गिरने से रोकने के लिए जगह-जगह टेक लगाए गए हैं। खुले स्थानों से पानी लगातार रिसता रहता है और जगह-जगह सीलन और फिसलन होने के कारण गिरने के भय से एक-एक कदम संभालकर रखना पड़ता है। असल में अंबरनाथ किसी भी प्रयास के बजाय मंदिर निर्माण की कला की वजह से ही काल के थपेड़े और हर अन्याय व झंझावात सहते लगभग एक हजार वर्ष बाद भी टिका हुआ है। चाहें, तो इसे भोलेनाथ की कृपा भी कह लीजिए।
खंडहर बना अंबरेश्वर आज अपने स्वर्णिम अतीत की छाया भर रह गया है। इसकी हालत दारुण है- बहुत दारुण। यहां तक कि डर लगने लगा है कि क्या हमारी भावी पीढ़ियां इतिहास, कला और संस्कृति के इस अद्भुत नमूने को देख पाएंगी? अगर हां, तो यह कैसे होगा? इसे सहेज कर रखने की जिम्मेदारी आखिर किसकी है?
अंबरनाथ की जड़ें महाभारत काल तक जाती हैं। लोकोक्ति है कि पांडवों ने अपने अज्ञातवास के सबसे दूभर कुछ वर्ष अंबरनाथ में बिताए थे और यह पुरातन मंदिर उन्होंने एक ही रात में विशाल पत्थरों से बनवा डाला था। कौरवों द्वारा लगातार पीछा किए जाने के भय से यह स्थान छोड़कर उन्हें जाना पड़ा। मंदिर फिर पूरा नहीं हो सका। आसमान के साथ स्वयंभू शिवलिंग के दर्शन कराने वाला गर्भगृह के- जो मंडप से 20 सीढ़ियां नीचे है, ठीक ऊपर शिखर का न होना इस धारणा को पुष्ट करता है। मौसम के झंझावात झेलता मंदिर तब भी सिर तानकर खड़ा है। बगल से बहती वालधुनी नदी बाढ़ में जब भी विकराल रूप में होती है, उसका पहला नजला इमली और आम के पेड़ों से घिरे इस परिसर पर ही फूटता है।
अंबरनाथ मंदिर की तुलना आबू के दिलवाड़ा, उदयपुर के उदयेश्वर और सिन्नर के गोंडेश्वर मंदिरों से की जाती है। इतना मोहक पौराणिक मंदिर मुंबई के इतने पास है, फिर भी अगर आपने देखा नहीं। तो फिर बोलिए, दुर्भाग्य किसका है!
महाराष्ट्र
यह मंदिर प्राचीन हिन्दू शिल्पकला की ज्वलंत मिसाल है। वहां के स्थानीय निवासी इस मंदिर को पांडवकालीन मानते हैं।
एक रात में बना मंदिर
आंध्र प्रदेश के अनंतपुर जिले का लेपाक्षी मंदिर(lepakshi temple-Sri Veerabhadra Temple) हैंगिंग पिलर्स (हवा में झूलते पिलर्स) के लिए पूरी दुनिया में मशहूर है। इस मंदिर के 70 से ज्यादा पिलर बिना किसी सहारे के खड़े हैं और मंदिर को संभाले हुए हैं। मंदिर के ये अनोखे पिलर हर साल यहां आने वाले लाखों टूरिस्टों के लिए बड़ी मिस्ट्री हैं। मंदिर में आने वाले भक्तों का मानना है कि इन पिलर्स के नीचे से अपना कपड़ा निकालने से सुख-समृद्धि मिलती है। अंग्रेजों ने इस रहस्य को जानने के लिए काफी कोशिश की, लेकिन वे कामयाब नहीं हो सके।

भारत के गर्भ में कई ऐसे रहस्य छुपे हैं जिनके बारे आजतक कोई जान नहीं पाया। ऐसा ही रहस्य समेटे हुए है आंध्र प्रदेश का लेपाक्षी मंदिर। लेपाक्षी मंदिर को हैंगिंग पिलर टेम्पल के नाम से भी जाना जाता है। यह मंदिर कुल 70 खम्भों पर खड़ा है जिसमे से एक खम्भा जमीन को छूता नहीं है बल्कि हवा में ही लटका हुआ है। जानिए क्या है इस मंदिर का रहस्य-
वनवास के दौरान भगवान श्रीराम, लक्ष्मण और माता सीता यहां आए थे। सीता का अपहरण कर रावण अपने साथ लंका जा रहा था, तभी पक्षीराज जटायु ने रावण से युद्ध किया और घायल हो कर इसी स्थान पर गिरे थे। जब श्रीराम सीता की तलाश में यहां पहुंचे तो उन्होंने ‘ले पाक्षी’ कहते हुए जटायु को अपने गले लगा लिया। ले पाक्षी एक तेलुगु शब्द है जिसका मतलब है ‘उठो पक्षी’।
साथ ही यह भी कहा जाता है कि मंदिर को सन् 1583 में विजयनगर के राजा के लिए काम करने वाले दो भाईयों विरुपन्ना और वीरन्नाने बनाया था। वहीं, पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक इसे ऋषि अगस्त ने बनाया था।
6वीं सदी में बने इस मंदिर के रहस्य को जानने के लिए अंग्रेजों में इसे शिफ्ट करने की कोशिश की, लेकिन वे नाकाम रहे। जब एक अंग्रेज इंजीनियर ने इसके रहस्य को जानने के लिए मंदिर को तोड़ने का प्रयास किया तब यह पता चला की इस मंदिर के सभी पिलर हवा में झूलते हैं।

दूसरी ओर, मंदिर में रामपदम (मान्यता के मुताबिक श्रीराम के पांव के निशान) स्थित हैं, जबकि कई लोगों का मानना है की यह माता सीता के पैरों के निशान हैं।
ये जानकारी आपको कैसी लगी कृपया कमेंट जरूर करे अगर आप कुछ और जानते है इस टेम्पल के बारे में तो हमें जरूर भेजे उसके बारे में।
यहाँ आज भी हर रात कृष्ण गोपियों संग रास रचाते है। यही कारण है की सुबह खुलने वाले निधिवन को संध्या आरती के पश्चात बंद कर दिया जाता है। उसके बाद वहां कोई नहीं रहता है यहाँ तक की निधिवन में दिन में रहने वाले पशु-पक्षी भी संध्या होते ही निधि वन को छोड़कर चले जाते है।

वास्तव में, निधिवन एक रहस्यमय जगह है जो दुनिया भर के सभी प्रकार के यात्रियों का ध्यान आकर्षित करता है। हालांकि, इस जगह के बारे में अधिक जानने में असंभव लगता है, यह अब भी एक ऐसा गंतव्य है जो अधिक खोज की इंतजार कर रहा है!
Nidhivan opening Timing: गर्मी में समय :05:00AM to 08:00PM ठण्ड में समय:06:00AM to 7:00PM