ऐतिहासिक जगह

बीता कल और एक अनछुआ एहसास

भारत प्रसिद्ध है इसकी ऐतिहासिक विरासत से जो की एक ख़ज़ाने की तरह है। भारत प्रसिद्ध है इसकी ऐतिहासिक विरासत से जो की एक ख़ज़ाने की तरह है। क्या आप Top 100+ historical places in india के बारे में जानना चाहते है। तो आप निचे दिए गये सभी बेशकीमती ऐतिहासिक जगह को देख सकते है। उनकी खूबिया क्या क्या है जो उन्हें एक दूसरे से अलग बनती है।

मालाना की अनकही कहानी(Untold story of Malana Himachal Pradesh)

मलाना हिमाचल प्रदेश(Malana Himachal Pradesh) राज्य में एक प्राचीन भारतीय गांव है। कुल्लू घाटी के उत्तर-पूर्व में पार्वती घाटी की एक साइड घाटी, मलााना यह अकेला गांव, बाकी दुनिया से अलग है। चंदरखानी और देव तिब्बा के शिखर गांवों को छाया देते हैं। भारत में रहस्यमी स्थानों का खजाना है। इन स्थानों में विविध परंपराओं, संस्कृतियों और विरासत(virasat) हैं। हम इस तरह के कई मुख्यधारा के स्थानों के बारे में जानते हैं, लेकिन कुछ लोकप्रिय जगहें उनकी सभी महिमा में  मौजूद नहीं हैं। ऐसी एक जगह मालाना(Malana Himachal Pradesh) है। मालाना की अनकही कहानी शायद देश के सबसे अच्छे रहस्यों में से एक है। और यही कारण है कि यह इतना आकर्षक है जो अपनी तरफ खीचता है। प्रौद्योगिकी(technology) और वैश्वीकरण(Globalization) के समय भी, गांव लोकप्रिय है अपनी अलग ही पहचान की वजय से। मालाना दुनिया के सबसे पुराने खड़े लोकतंत्रों में से एक है, छोटे गांव आज भी अपने मामलों का प्रबंधन कर रहे हैं। Malana himachal pradesh
Malana foreigner
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मालानी लोगों का मानना है कि वे अलेक्जेंडर के वंशज हैं और शुद्धता और प्रदूषण से जुड़े उनके अनुष्ठान उनके विश्वास के रूप में कड़े हैं। और उनको वो

नहीं छोड़ सकते। 

भारत के बाकी हिस्सों के विपरीत, मलााना के गांव में अपनी धार्मिक मान्यताओं हैं। शिव में उनके अविश्वासित विश्वास के अलावा, वे अपने देवता, जमुलू ऋषि में विश्वास करते हैं। ऐसा कहा जाता है कि पुराणों के एक ऋषि एक बार भूमि में रहता था और लोकतंत्र की नींव रखता था, जो अभी भी पूरी तरह कार्यात्मक संसदीय प्रणाली के रूप में काम करता है।
Malana Village people
source: wikipedia
मालानी विश्वास के लोग हैं वो एक दूसरे पे विश्वास करते है  और जो उनके न्यायिक तंत्र पर एक नजर से स्पष्ट हैं। व्यावहारिक रूप से, मालाना की न्यायपालिका खुद को भारतीय न्यायिक प्रणाली से अलग नहीं करती है। जब किसी संघर्ष को हल करने के लिए एक आगामी निर्णय होता है, तो वह प्रत्येक भेड़ के ढक्कन के दाहिने अग्रभाग को ढाई इंच गहरा कर देता है, इसे जहर से भरता है और सुई और धागे की मदद से इसे वापस सीवन करता है। जिस व्यक्ति का भेड़ का बच्चा मर जाता है वह निर्णय खोने के लिए निहित होता है। ऐसा माना जाता है कि निर्णय उनके देवता द्वारा लिया जाता है। यहां पर लोग मानते हैं कि पहाड़ खुद अपने नियम बनाते हैं। इन लोगों के लिए विश्वास का महत्व वास्तव में महत्वपूर्ण है, यही कारण है कि वे अभी भी अपने देवता से पूछते हैं कि वोट किसे देना है। पूरे गांव उनके देवता द्वारा चुने गए व्यक्ति के लिए वोट देता है। देवता के प्रवक्ता को “गुरु” कहा जाता है। ऐसा माना जाता है कि जंबलू देवता या तो प्रवक्ता के शरीर में आते हैं ताकि लोग अपने फैसले या प्रवक्ता के बारे में जान सकें। अब दुनिया पार्वती घाटी के मीठे सुखों के बारे में जानता है। मालाना क्रीम ने हाई टाइम्स पत्रिका के कैनबिस कप में 1 99 4 और 1 99 6 में दो बार सर्वश्रेष्ठ हैशिश खिताब जीता है। यह गांव विदेशी और मोहक “मलााना और जादू घाटी” के रूप में यात्रा करने के लिए ये  स्वर्ग है। यदि आपने यात्रा की है, तो आप जानते हैं कि आप वापस जा रहे हैं। यदि नहीं, तो मैं आपको इस राजसी भूमि का पता लगाने और इसके रहस्यों को उजागर करने का आग्रह करता हूं। सिर्फ यात्रा मत करो, एक्सप्लोर(explor) करें!

शुक्रताल-Shukratal

उत्तर प्रदेश के मुज़फ्फरनगर जनपद में गंगातट के निकट स्थित वह तीर्थ स्थल है जहाँ अब से पांच हजार वर्ष से भी पूर्व संत शुक देव जी ने राजा परीक्षित को जीवन-मृत्यु के मोह से मुक्त करते हुए जीते जी मोक्ष की प्राप्ति का ज्ञान दिया था जिसे शुक्रताल(Shukratal) कहते है। संत शुक देव जी के नाम से प्रेरित तीर्थ स्थल का नाम शुक्रताल पड़ा। कैसे शुक्रताल एक तीर्थ स्थल के रूप में जाने जाना लगा:- पांच हजार वर्ष से भी पूर्व इस स्थान के बारे में कोई जानता था. इस स्थान की प्रसिद्धि के पीछे एक आध्यात्मिक रहस्य छिपा है। जो यहाँ जाता है वो जान जाता है। आये जानते है इस अद्भुत तीर्थ स्थल के बारे में। महाभारत युद्ध में अभिमन्यू वीरगति को प्राप्त हुए और उनकी पत्नी उत्तरा के गर्भ को नष्ट  करने के लिये अश्वत्थामा ने ब्रह्मास्त्र  छोड़ा, परंतु श्रीकृष्ण ने सुदर्शन चक्र से उत्तरा के प्रार्थना करने  पर  उसके गर्भ की  रक्षा की. उत्तरा के गर्भ में जो शिशु पल रहा था वह परीक्षित था जो आगे चलकर राजा परीक्षित के रूप में विख्यात हुआ. गर्भावस्था में ही प्रभु के दर्शन होने का सौभाग्य मात्र परीक्षित जी को ही बताया जाता है. shukrtal-temple-image राजा परीक्षित को शाप मिलना  एक बार राजा परीक्षित जंगल में शिकार खेलने गये. शिकार की तलाश में घूमते-घूमते वे भूख-प्यास से पीड़ित हो गये. पानी तलाश करते-करते वे शमीक मुनि के आश्रम में पहुँचे जहां पर मुनि समाधिस्थ थे. राजा ने कई बार मुनि से पानी की याचना की, परंतु कोई उत्तर न मिलने पर, राजा ने एक मरे हुए साँप को धनुष की नोंक से उठाकर, शमीक मुनि के गले में डाल दिया, परंतु शमीक मुनि को समाधि में होने के कारण इस घटना का कोई भान ही नहीं हुआ. शमीक मुनि के पुत्र श्रृंगी ऋषि को जब यह पता लगा तो उन्होंने गुस्से से हाथ में जल लेकर राजा को शाप दे दिया कि जिसने भी मेरे पिता के गले में मरा हुआ साँप डाला है आज से सातवें दिन इसी सांप (तक्षक) के काटने से उसकी मृत्यु हो जायेगी. वह अपने पिता के गले में मरा हुआ सांप पड़ा देखकर जोर- जोर से रोने भी लगे. रोने की आवाज सुनकर शमीक मुनि की  समाधि खुली और उन्हें सब समाचार विदित हुए. मुनि ने श्रृंगी से दुःखपूर्वक कहा कि वह हमारे देश का राजा है और समझाया कि राजा के पास सत्ता का बल होता  है. राजा उस सत्ता के बल का दुरुपयोग कर सकता है, परंतु ऋषि के पास साधना का बल होता है और ऋषि को साधना के बल का दुरुपयोग नहीं करना चाहिए. अत: राजा को तुम्हें शाप नहीं देना चाहिए था. श्राप ने कैसे राजा का जीवन ही परिवर्तित कर दिया:- राजा परीक्षित को जब श्राप के बारे में पता लगा तब उन्हें अपनी गलती का भान हुआ. वे अपने पुत्र जनमेजय को राजपाट सौंपकर हस्तिनापुर से शुकताल पहुँच गये. गंगा जी के तट पर वट वृक्ष के नीचे बैठ कर राजा परीक्षित श्रीकृष्ण भगवान का ध्यान करने लगे. वहीं परम तेजस्वी शुकदेव जी प्रकट हुए और अनेक ऋषि-मुनियों के मध्य एक शिला पर आकर बैठ गये. मातृ-शुद्धि(माता के कुल की महानता), पितृ-शुद्धि (पिता के कुल की महानता), द्रव्य-शुद्धि (सम्पत्ति का सदुपयोग) अन्न-शुद्धि और आत्म-शुद्धि (आत्मज्ञान की जिज्ञासा) एवं गुरु कृपा के कारण ही परीक्षित जी भागवत कथा सुनने के अधिकारी हुए. हम सभी के जीवन में भी क्यों सिर्फ सात दिन है:- परीक्षित को सात दिनों में मृत्यु का भय था. सप्ताह के सात दिन होते हैं. किसी न किसी दिन हमारी भी मृत्यु निश्चित है. परंतु ये सात वार हमारे जीवन का मार्गदर्शन करते हैं. यदि सकारात्मक रूप से देखें तो हमको इन सात वारों से सुन्दर शिक्षा मिलती है. राजा परीक्षित श्राप मिलते ही मरने की तैयारी करने लगते हैं. इस बीच उन्हें व्यासजी उनकी मुक्ति के लिए श्रीमद्भागवत्कथा सुनाते हैं. व्यास जी उन्हें बताते हैं कि मृत्यु ही इस संसार का एकमात्र सत्य है.

अक्षय वट वृक्ष के नीचे गंगा तट के समीप शुक देव जी ने राजा परीक्षित को श्रीमद भागवत सुनाया था। और वो मुक्त हो गए और सीधा भगवान  चरणों में चले गए और तक्षक उनका कुछ भी नहीं बिगाड़ पाया।  इसलिए तब से ये स्थान शुक्रताल के तीर्थ स्थल के रूप में जाने जाना लगा। 

आज भी मुजफ्फरनगर से शुक्रताल जाने वाले रास्ते पर कोई विशेष ट्रैफिक नहीं मिलता. इसीलिए सूर्यास्त के बाद इस रास्ते से जाना सुरक्षित नहीं माना जाता. शुक्रताल में भी सूर्यास्त के बाद सन्नाटा छा जाता है. केवन मंदिर के पुजारी, उनके शिष्य तथा कार्यकर्त्ता ही वहां विचरण करते दिख सकते हैं. शुकदेव मंदिर परिसर में गीता प्रेस गोरखपुर का प्रकाशित धार्मिक साहित्य तथा स्मृति चिन्ह व् प्रसाद की कुछ दुकानें है, इसी प्रकार हनुमंधाम में भी यह दुकानें मिल जायेंगी जहाँ से भगवान जी को भोग लगाया जा सकता है तथा यादगार के लिए कुछ खरीददारी की जा सकती है. शुक्रताल के प्रसिद्ध मंदिर और ऐतिहासिक जगह:-
  1. शुक्रताल का प्राचीन अक्षवत वृक्ष

  2. एकादश रूद्र शिव मंदिर

  3. हनुमंत धाम Sunderkand in Hindi
  4. गंगा मंदिर

कृष्णागिरी में KRP बांध एक बहुत ही खूबसूरत जगह है। जहा बांध की खुबसुरती के साथ आस पास हरयाली का भी ध्यान रखा  गया  है। कृष्णागिरी रिजर्वोइयर प्रोजेक्ट (केआरपी बांध) कृष्णागिरी का मुख्य आकर्षण है। यह बांध कृष्णगिरी शहर से 7 किमी की दूरी पर धर्मपुरी और कृष्णागिरी के बीच स्थित है। यह कृष्णगिरी के सिंचाई उद्देश्य को पूरा करने के लिए तेपेपेई नदी में बनाया गया है।

लोकप्रिय पिकनिक स्थान:-

कृष्णागिरी रिजर्वोइयर प्रोजेक्ट(KRP) भी एक लोकप्रिय पिकनिक स्थान है, क्योंकि इसमें बगीचे और हरे-भरे हरियाली हैं।

अन्य गांवों को पेयजल भी प्रदान करता है।:-

यह बांध 1 9 58 में तत्कालीन मुख्यमंत्री के राज्य को समर्पित था और लगभग हजारों एकड़ जमीन सिंचाई करता था। यह पेरियामुथुर, सुन्डेप्पुम, थिममुपुरम, चौटाहल्ली, गुंडलापट्टी, मिट्टाहल्ली, इरहाल्ली, कावेरीपट्टिनम, पाययूर और कृष्णागिरी के अन्य गांवों को पेयजल भी प्रदान करता है।

पर्यटन स्थल(KRP is also Tourist place):-

इसे एक पर्यटक आकर्षण और पिकनिक स्थान बनाने के लिए, राज्य के लोक निर्माण विभाग द्वारा बनाए गए विदेशी भूनिर्माण और बच्चों के पार्क वहां मौजूद हैं। कृष्णागिरी में स्थापित एक कृषि अनुसंधान केंद्र भी है। यह भी एक प्रसिद्ध पर्यटन स्थल है। यहाँ पर पर्यटको की भीड़ रहती है।

Facts (तथ्य):-

Time required 1h 0m

Timings 6:00 AM – 7:00 PM

इस जगह पर जाने का सबसे अच्छा समय: नवंबर और मार्च के बीच।

कृष्‍णागिरी में  आपका स्वागत है

कृष्‍णागिरी(krishnagiri) दो शब्‍दों कृष्‍ण और गिरी से मिलकर बना है। कृष्‍ण का अर्थ काला होता है जबकि गिरी का मतलब पहाड़ होता है। इस प्रकार कृष्‍णागिरी का  अर्थ काला पहाड़ होता है। यहां काले ग्रेनाइट चट्टानों का पहाड़ है। इसी कारण इसका नाम कृष्‍णागिरी पड़ा। इसके नाम के पीछे एक अन्‍य कहानी भी प्रचलित है। यह क्षेत्र एक समय विजयनगर के शासक कृष्‍णदेव राय के साम्राज्‍य का हिस्‍सा था। इसीलिए इस स्‍थान का नाम उनके नाम पर कृष्‍णागिरी पड़ा। कृष्‍णागिरि एक पर्यटन स्‍थल के रूप में काफी लोकप्रिय है। यहां का सबसे प्रमुख पर्यटन आकर्षण केआरपी बांध है। इसके अलावा, कृष्‍णागिरि में कई ऐतिहासिक स्‍थल, मंदिर, पार्क, किले और प्राकृतिक स्‍थल है।

आमों के लिए प्रसिद्ध कृष्णागिरि(krishnagiri):-

अल्‍फांसो आमों के लिए प्रसिद्ध कृष्णागिरि(krishnagiri) तमिलनाडु का एक प्रमुख शहर है। यह कृष्णगिरि जिला में आता है। आम यहां का मुख्‍य फसल है। माना जाता है कि आम की सर्वप्रथम पैदावार यहीं हुई थी। कृष्णागिरी हसूर से लगभग 25 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यह कई पर्वतों से घिरा हुआ है। कृष्णागिरी विशेष रूप से कृष्णागिरी बांध व सरकारी संग्रहालय के लिए प्रसिद्ध है। यहां के किसान और आम उत्‍पादक, लोगों को आम की पैदावार देखने देते है और फोटोग्राफी भी करने देते है। यहां आम के पेड़ों के बीच प्रकृति के अद्भुत नजारे देखने को मिलते है। जो लोग फल खाने के शौकीन है वह गर्मियों के मौसम में यहां आम का स्‍वाद लेने जरूर आएं।

best places to visit in Krishnagiri:-

कृष्णागिरि(Krishnagiri) dam और KRP dam

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वेणुगोपाल स्‍वामी मंदिर कृष्णागिरि(Krishnagiri) 

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श्री कट्टू वीरा अंजनेय मंदिर(Sri Kattu Veera Anjaneya Temple)

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श्री परश्वा पदमावती शक्तिपीठ तीर्थ धाम

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नरसिम्हा स्वामी मंदिर(Narasimha Swamy Temple)

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 थल्ली(Thally Little England in Krishnagiri)

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कृष्णागिरी बहुत ही अद्भुत जगह है।:-

जहां प्रकृति की सुंदरता प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है। इस जगह पर आकर बहुत ही शांति मिलती है। यह हमारे देश की विरासत है। यह प्रकृति विरासत(heritage) हम सभी को मिली हैं जब कभी भी समय मिले कभी भी आप इधर से गुजरे तमिलनाडु की तरफ आए तो कृष्णागिरी आना ना भूलें। आपको बहुत ही अलग अनुभव होगा अगर आप पहले गए हैं तो जरूर अपना अनुभव शेयर करें लोगों को बताएं इस जगह के बारे में। धन्यवाद

एक ऐसी अद्भुत जगह जहां श्री कृष्ण जी पर्वत के रूप विराजमान  है

श्री गोवर्धन(Govardhan Hill )महाराज :-

श्री गोवर्धन सिर्फ पर्वत नहीं है ये श्री कृष्ण जी का स्वरुप है जो कलयुग में प्रत्यक्ष है। हर कोई अपनी आँखों से देख सकता है यहाँ आकर एक अद्भुत शांति की प्राप्ति होती है।
मथुरा नगर के पश्चिम में लगभग 21 किमी की दूरी पर यह पहाड़ी स्थित है। यहीं पर गिरिराज पर्वत है जो 4 या 5 मील तक फैला हुआ है। इस पर्वत पर अनेक पवित्र स्थल है। पुलस्त्य ऋषि के श्राप के कारण यह पर्वत एक मुट्ठी रोज कम होता जा रहा है। कहते हैं इसी पर्वत को भगवान कृष्ण ने अपनी छोटी अँगुली पर उठा लिया था। गोवर्धन पर्वत को गिरिराज पर्वत(Govardhan Hill )भी कहा जाता है।

श्री गोवर्धन महाराज की भव्यता:-

श्री गोवर्धन महाराज सत्य घटना:-

भगवान श्री कृष्ण(shri krishna) की लीलाओं में विशेष लीला वृंदावन(vrindavan) में हुई वह अद्भुत लीला थी जिस लीला के कारण श्री कृष्ण का वह चमत्कार(miracle) देख आज हजारों लाखों लोगों  आकर्षित होते हैं भगवान श्री कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत(Govardhan Hill )उठा लिया था यह लीला कुछ इस प्रकार घटित हुई कृष्ण बलराम रोज की तरह गायों को चराने गए जब गाय चढ़ाकर भगवान वापस आए तो उन्होंने देखा पूरा का पूरा वृंदावन सभी कुछ विशेष सामग्री पूजा की थाली लेकर नंद बाबा के कहने पर बड़े पूजा की तैयारी कर रहे थे .


श्री कृष्ण छोटे थे वो पूछने  अलगे यज्ञ तैयारी और किस लिए वह सवाल करने लगे नंदबाबा से।  श्री कृष्ण(Shri krishna) जानते तो सब कुछ थे फिर भी नंद जी से पूछते हैं बाबा यह हम सब किनकी  पूजा की तैयारी कर रहे हैं फिर क्या था नंद बाबा ने बालक समझकर कृष्ण को कहा यह तो हम लोग हर साल करते हैं उसी  पूजा की तैयारी है।  नहीं बाबा मुझे बताइए यह किस भगवान के लिए पूजा(puja) की जा रही है पहले नंद बाबा ने टालने की कोशिश की लेकिन फिर नंद बाबा ने कहा हम लोग इंद्र की पूजा कर रहे हैं क्योंकि इंद्र हमें  वर्षा प्रदान करते हैं वर्षा के कारण हमारा खेत अच्छे से फलता-फूलता है कृष्ण जी ने कहा वर्षा तो हर जगह होती है वर्षा होती है तो खेतों पर भी होती है खेतों पर होती है समुद्र में भी होती हर जगह होती है लेकिन सभी लोग तो इंद्र जी की पूजा नहीं करते बारिश तो हर जगह होती है इस प्रकार से तर्क दिया तो नंद बाबा कुछ बोल नहीं पाए उन्होंने कहा कि यह पूजा कई पीढ़ियों से चली आ रही है तो इसीलिए हम भी कर रहे हैं क्या इसका शास्त्रों में वर्णन है यह हम लोग कई पीढ़ियों से  करते आ रहे हैं।  हम बरसों से बस करते चले आ रहे हैं।
श्री कृष्णा जी ने कहा  हमें  विशाल गोवर्धन की पूजा करनी चाहिए क्योंकि हम गोवर्धन की पूजा करेंगे तो गोवर्धन ही तो हमारी  गायों को भोजन देती है जिससे कि गायों की  भरपूर दूध से हम सबकी  सेवा होती  है।  हमें चाहिए कि हम गोवर्धन की पूजा करें। तर्क देने के बाद वास्तव में भगवान श्री कृष्ण लीला के द्वारा यह समझाना चाह रहे हैं देवता तो बहुत सारे हैं मुख्य देवता 33 है लेकिन संख्या में 33 करोड़ देवता हैं  सारे पृथ्वी से ऊपर के लोग में रहते हैं एक ब्रह्मांड की 14 लोक है पृथ्वी के नीचे सात लोक हैं भगवान कृष्ण अर्जुन को भगवत गीता में बोलते हैं हे अर्जुन यह जो ब्राह्मण है इसमें जितने लोग हैं चाहे ऊपर जाएं या मृत्यु के पश्चात नीचे जाए इन सब लोगों में दुख है और मृत्यु है और फिर से जन्म होता है यहां तो कई बार हम यह सोचते कि दुखों के कारण अपना घर बदलते बदलते हैं देश बदलते और यह सोचते हैं कि हमारे दुख कम हो जाएगा लेकिन दुख खत्म नहीं होता मानसिक चिंताएं खत्म नहीं होती

श्री कृष्णा ने कहा हमें देवताओं की पूजा नहीं करनी चाहिए हमें कर्म की पूजा करनी चाहिए हमें भगवान की पूजा करनी चाहिए और गोवर्धन पर्वत साक्षात भगवान का स्वरुप है क्योंकि वह हम सभी को छाया प्रदान करते हैं हम सभी के गायो को अन धन प्रदान करते हैं इसीलिए हम सभी को गोवर्धन महाराज के शरण में जाना चाहिए वह हम सब की पूजा जरूर स्वीकार करेंगे बस इतना ही सुनना था नंद बाबा ने कन्हैया की बात मान ली और सभी ग्वाल-बाल गैया मैया सभी को साथ लेकर सब बड़ी ही मस्त से होकर गोवर्धन महाराज की पूजा करने गए उन्होंने छप्पन भोग गोवर्धन महाराज को लगाया और खूब खूब अच्छे से उनकी पूजा सेवा की बस इतना देखते ही इंद्र देवता क्रोधित हो गए और उन्होंने बहुत ही मूसलाधार बारिश कि जिससे कि पूरा ब्रज गांव में जल ही जल हो गया था पूरा ब्रज गांव डूबने लगा था.

सब देख कर इंद्र देवता को लगा :- कि उन्होंने कुछ गलत किया है तो वह कृष्ण भगवान से क्षमा मांगने लगे ऐसा नहीं करना चाहिए तभी उनका नाम गोविंद नाम पड़ा गोवर्धनधारी नाम पड़ा। श्री. कृष्ण कहते हैं जब हमें अपने दुखों के पहाड ना उठे तो  एक बार सच्चे मन से जो उनकी शरण में  जाए तो वो  सभी के दुखों का पहाड़ जरूर उठाएंगे पर विश्वास और श्रद्धा होना चाहिए। जैसे ब्रजवासी सीधा गोवर्धन भगवान की शरण में ही गए।   श्री कृष्ण जी के ऊपर अपनी श्रद्धा भाव दिखाया आंख बंद करके उनके शरण में चले गए इस प्रकार आज भी गोवर्धन पर्वत हम सभी की इच्छाओं को पूरा करते हैं श्रद्धा और भक्ति भावना चाहिए। आज बहुत से लोगों की श्रद्धा गोवर्धन महाराज से जुड़ी हुई है हर महीने लोग यहां पर परिक्रमा के लिए आते हैं और अपने दुखों को बांटते हैं और उनको दुख कम करने का वर मांगते है और उनकी इच्छाएं पूरी होती है कलयुग में साक्षात प्रकट है श्री कृष्ण जी का स्वरुप।  श्री. गोवर्धन महाराज  की जय हो जय हो श्री गोवर्धन महाराज महाराज नित्य आया करो।

 श्री. गोवर्धन महाराज  की जय हो

मथुरा का प्राचीन केशवदेव मंदिर(Ancient Keshavadev Temple)

श्रीकृष्ण जन्मस्थान के निकट बना प्राचीन केशवदेव मंदिर यूं तो विश्व पटल पर कई मायनों में प्रसिद्ध है किन्तु कुछ वर्षो पूर्व ही श्रीकृष्ण जन्मस्थान में हुए नये केशवदेव मंदिर के निर्माण से इस पुराने केशवदेव मंदिर की प्रसिद्धी लुप्त होती जा रही है। इस मंदिर में वैसे तो वर्ष पर्यन्त पडऩे वाले सभी पर्व हर्षोल्लास के साथ मनाए जाते हैं किन्तु बंसत पंचमी पर लगने वाले छप्पन भोग इस मंदिर को अनोखी छटा प्रदान करते है। इस दिन लाखों श्रद्धालु इस मंदिर के दर्शन करते है। विदेशी भक्तों के लिए रंग भरनी एकादशी पर गताश्रम विश्राम घाट से निकलने वाली ठाकुर केशव देव की सवारी मुख्य आकर्षक का केन्द्र बनती है जो मल्लपुरा स्थित केशवदेव मंदिर पहुंचकर सम्पन्न होती है। छोटी दीपावली अर्थात नरक चौदस के दिन इस मंदिर में दीपोत्सव का आयोजन भी किया जाता है।
source: Wikipedia.org

प्राचीन केशवदेव मंदिर(Ancient Keshavadev Temple) के बारे में :-

श्रीकृष्ण का जन्म सप्तमी को मानते है :-

कुछ लोगों के लिए एक आश्चर्य की बात यह भी है कि पूरे विश्व में जन्माष्टमी पर्व अष्टमी की रात्रि को अर्थात नवमी को मनाया जाता है किन्तु श्रीकृष्ण के जन्मस्थान अर्थात मल्लपुरा के निवासी श्रीकृष्ण का जन्म सप्तमी की रात्रि को अर्थात अष्टमी में मनाते है।

पोतरा कुण्ड:-

केशवदेव मंदिर( Keshavadev Temple) के निकट बना पोतरा कुण्ड इसलिए प्रसिद्ध है क्योंकि यहां श्रीकृष्ण के गोकुल जाने के बाद मथुरावासियों ने उनके शुद्धि स्नान के लिए इस कुण्ड का प्रयोग किया था।

एक वीर योद्धा की जन्मभूमि

सरयू नदी के किनारे पर  पवित्र शहर अयोध्या(Ayodhya) है। यह भगवान विष्णु के सातवें अवतार के रूप में माना जाता है, जो कि श्री राम जी का जन्मस्थान है। अयोध्या एक प्रमुख तीर्थ स्थान है यहाँ मंदिरों ayodhya ka ram mandir में कई धर्मों ने बड़े पैमाने पर और साथ-साथ कई बार समयावधि में भी विकास किया है। हिन्दू धर्म, बौद्ध धर्म, जैन धर्म के अवशेष, अब भी अयोध्या में पाये जा सकते हैं। रामायण में अयोध्या के बारे में उल्लेख है कि शहर की स्थापना हिंदुओं के विधायक मनु ने की थी। अयोध्या को शुरूआती कोसल देश  के नाम से जाना जाता था और सत्ताधारी राजवंश के रूप में जाना जाता था। श्री राम जी सूर्यवंश राजवंश के थे।

“जानकारी अच्छी लगे तो सभी से शेयर जरूर करे क्युकी आज हमारी खोती हुई भारतीय संस्कृति जो विरासत में मिली उसको को प्रसार की जरुरत है जिससे आने वाली पीढ़ियों तक इसकी चमक पहुंच सके। और अपनी मातृभाषा हिंदी पे हमेशा गर्व कीजिये और इसका सम्मान-प्रसार जरूर कीजिये। “

अयोध्या पुण्यनगरी(Ayodhya history):-

अयोध्या पुण्यनगरी है। अयोध्या श्रीरामचन्द्रजी की जन्मभूमि होने के नाते भारत के प्राचीन साहित्य व इतिहास में सदा से प्रसिद्ध रही है। अयोध्या की गणना भारत की प्राचीन सप्तपुरियों में प्रथम स्थान पर की गई है। अयोध्या के श्री राम, राम जू की अजोध्या …! त्रेता, द्वापर और अब कलयुग…लाखों वर्ष बाद, आज भी राम अचल हैं अविनाशी हैं. जब तक राम हैं तभी तक अयोध्या का महत्व रहेगा

गंगा बड़ी गोदावरी,

तीरथ बड़ो प्रयाग,

सबसे बड़ी अयोध्यानगरी,

जहँ राम लियो अवतार।

अयोध्या शब्द का अर्थ :-

अयोध्या(Aayodhya) शब्द का स्पष्ट अर्थ है “जो हराया नहीं जा सकता” इस तीर्थस्थान में कई मंदिर हैं। और अधिकतर मंदिर भगवान राम और उनके परिवार और मित्रो को समर्पित हैं।

अयोध्या भगवान राम जन्मभूमि(ayodhya ka ram mandir):-

प्राचीन समय के दौरान अयोध्या को  कोशल  देश  के नाम से जाना जाता था अथर्ववेद ने इसे “देवता द्वारा बनाया गया शहर और स्वर्ग के रूप में समृद्ध होने” के रूप में वर्णन किया सूर्यवंश इस शानदार और मशहूर कोशल देश का शासक वंश था।
अयोध्या श्री राम जन्मभूमि(shri ram janam bhoomi) है, जहां भगवान राम जी का जन्म हुआ था।  यहां एक छोटा सा भगवान राम मंदिर है।  वहां बाबरी मस्जिद का इस्तेमाल हुआ था, जो 15 वीं सदी में मुग़ल द्वारा निर्मित किया गया था। बाद में 1992 में मस्जिद थोड़ी नष्ट हो गई थी, और वर्तमान समय में एक भव्य राम मंदिर का निर्माण करने की योजना है।

सर्वधर्म नगरी:-

अयोध्या हिन्दू धर्म के आस्था का केंद्र है . अयोध्या को प्रभु श्री राम की जन्मस्थली के रूप में प्रसिद्धि मिली. पर यह धरती कई धर्मों के लिए महत्पूर्ण रही है. इस धरती पर सिख, बौध, जैन, सूफ़ी धर्म गुरुओं ने अपनी अपनी तरीके से अध्यात्म का यश फैलाने पर काम किया है. जिसकी खुशबू यहाँ के सौहार्दपूर्ण  वातावरण में महसूस होती है.  अयोध्या में भगवा ध्वज, मालाएं, प्रसाद बनाने वाले आधे से अधिक कारीगर मुसलमान हैं।
यहाँ कुछ प्रमुख स्थान है जहां प्रसिद्ध मंदिर और ऐतिहासिक जगह है 

कनक भवन(ayodhya kanak bhawan):-

कनक भवन अयोध्या का एक महत्वपूर्ण मंदिर है। यह मंदिर सीता और राम के सोने के मुकुट पहने प्रतिमाओं के लिए लोकप्रिय है. मुख्य मंदिर आतंरिक क्षेत्र में फैला हुआ है, जिसमें रामजी का भव्य मंदिर स्थित है। यहां भगवान राम और उनके तीन भाइयों के साथ देवी सीता की सुंदर मूर्तियां स्थापित हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार राम विवाह के पश्‍चात् माता कैकई के द्वारा सीता जी को कनक भवन मुंह दिखाई में दिया गया था। जिसे भगवान राम तथा सीता जी ने अपना निज भवन बना लिया

गुप्तर घाट:-

अयोध्या मुख्य रूप से मंदिरों का एक पवित्र तीर्थस्थान है। पूजा के सभी स्थान यहां हैं, जिनमें हिंदू धर्म भी शामिल है। उत्तर प्रदेश के एक महत्वपूर्ण धार्मिक केंद्र होने के दौरान अयोध्या सबसे पवित्र रहा है। जब भगवान पृथ्वी पर उपस्थित थे, अयोध्या उनकी गतिविधियों का केंद्र था।
गुप्तर घाट में अच्छे मंदिरों का एक गुच्छा है और इसके पास एक अच्छा पार्क है। गुप्तर को गायब होने के रूप में परिभाषित किया गया है यह वह स्थान है जहां राम ने अपना शरीर छोड़ दिया। यहां कुछ अच्छे मंदिर मौजूद हैं, जिसे चक्र हरजी विष्णु, गुप्त हरजी और अन्य राजा मंदिर कहते हैं। चक्र हरजी विष्णु मंदिर में बहुत से देवता हैं, जिसमें बहुत पुराने नक्काशीदार चक्र हरजी विष्णु देवता प्रतीत होता है। यहां श्री राम के पैर की एक छाप भी है। 1 9वीं शताब्दी में राजा दशरथ सिंह ने मंदिर और छोटे महल का निर्माण किया। Read More…

रामकोट :-

जन्मभूमि अयोध्या में पूजा के प्रमुख और महत्वपूर्ण स्थान रामकोट के प्राचीन गढ़ की जगह है, जो शहर के पश्चिमी भाग में एक ऊचे भूमि पर खड़ा है। यह पवित्र स्थान पूरे भारत और विदेश से भक्तों को आकर्षित कर रहा है, भगवान के जन्म के दिन ‘रामानवमी’ पर, इस जगह को उमंग फूलों से सजाया जाता है और बहुत ही धूमधाम के साथ मनाया जाता है जो की  चैत्र (मार्च-अप्रैल) के हिंदू माह में। Read More…

हनुमान गढ़ी

यहाँ  श्री  हनुमान जी वास करते हैं।  अयोध्‍या आकर भगवान राम के दर्शन के लिए भक्तों को हनुमान जी Hanuman Aarti के दर्शन कर उनसे आज्ञा लेनी होती है. 76 सीढ़ियों का सफर तय कर भक्त पवनपुत्र के सबसे छोटे रूप के दर्शन करते हैं.अयोध्या नगरी में आज भी भगवान श्रीराम का राज्य चलता है. मान्यता है कि भगवान राम जब लंका जीतकर अयोध्या लौटे, तो उन्होंने अपने प्रिय भक्त हनुमान को रहने के लिए यही स्थान दिया. साथ ही यह अधिकार भी दिया कि जो भी भक्त यहां दर्शन के लिए अयोध्या आएगा, उसे पहले हनुमान का दर्शन-पूजन करना होगा…Read More….

त्रेता के ठाकुर:-

त्रेता के ठाकुर का यह विशेष स्थान है, जहां पर श्री राम ने अश्वमेधा यज्ञ का प्रदर्शन किया है। अश्वमेधा यज्ञ इस रीति से किया गया था, हर तरफ घूमने के लिए घोड़ों को छोड़ दिया गया था। उन स्थानों पर जहां घोड़े जायेंगे, वे यज्ञ कलाकार के शासनकाल में आएंगे।
लगभग 300 साल पहले कुल्लू के राजा ने यहां एक नया मंदिर बनाया था, जो इंदौर के अहिल्याबाई होलकर ने 1784 की अवधि में सुधार किया था। इसी समय, अन्य सटे घाट भी बनाए गए थे। काले बलुआ पत्थर की प्रारंभिक मूर्तियां सरयू से बरामद की गईं और नए मंदिर में रखीं, जो अब कलरम का मंदिर के रूप में प्रसिद्ध हैं। Read More..

नागेश्वरनाथ मंदिर  :-

शिव पुराण के अनुसार, एक बार नौका बिहार करते समय उनके हाथ का कंगन पवित्र सरयू में गिर गया, जो सरयू में वास करने वाले कुमुद नाग की पुत्री को मिल गया। यह कंगन वापस लेने के लिए राजा कुश तथा नाग कुमुद के मध्य घोर संग्राम हुआ। जब नाग को यह लगा कि वह यहां पराजित हो जायेगा तो उसने भगवान शिव का ध्यान किया। भगवान ने स्वयं प्रकट होकर इस युद्ध को रुकवाया। Read More

कालेराम मन्दिर :-

काले राम मंदिर राम की पैड़ी के पास स्थित नागेश्वर नाथ मंदिर के ठीक पीछे है, यह मन्दिर भी प्राचीन मन्दिरों में गिना जाता है. मन्दिर के महंत के अनुसार के राजा दर्शन सिंह के समय लगभग  1748 में भारत के महाराष्ट्रिय ब्राह्ममण योगी पं0 श्री नरसिंह राव मोघे को  एक स्वप्न में हुए आदेश के अनुसार Read More

छोटी देव काली जी का स्थान :-

मान्यता है कि छोटी  देवकाली की प्रतिष्ठा माता जानकी की ग्राम देवी या कुल देवी के रूप में हुयी. जगत जननी माँ सीता जी विवाहोपरांत अपने पितृ गृह जनकपुरी से जब  अयोध्या के लिए चलीं, तो अपनी कुल देवी जो कि  गौरी मंगला के रूप में थीं, अपने साथ ले आयीं. इसके पश्चात Read More

क्षीरेश्वर मन्दिर:-

क्षीरेश्वर मन्दिर अयोध्या के प्राचीन मन्दिरों में से एक है. इस मन्दिर में स्वयंभू शिवलिंग का प्राकट्य इस मन्दिर को विशेष बनाता है. मन्दिर के पुजारी के अनुसार मन्दिर के गर्भ गृह में स्वम्भू शिवलिंग, 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक उज्जैन के महाकालेश्वर में शिवलिंग के समान है.  क्षीरेश्वर मन्दिर अयोध्या फैजाबाद मार्ग पर श्री राम हॉस्पिटल के ठीक सामने स्थित है. मुख्य मार्ग पर स्थित होने के कारण मन्दिर के दर्शन सुगम हो जाते हैं. क्षीरेश्वर मन्दिर महादेव का मन्दिर है. ऐसी मान्यता है कि जो भी भक्त इस मन्दिर में स्थापित शिवलिंग की पूरे विधि विधान से पूजा करता है उसकी हर मनोकामना पूर्ण होती है.

विजय राघव मन्दिर:-

अयोध्या को मन्दिरों की नगरी भी कहा जाता है, यहाँ करीबन 7000 से अधिक मन्दिर हैं. पर विजय राघव मन्दिर अपने आप में निराला मन्दिर है.  यह रामानुज सम्प्रदाय का प्राचीन एवं प्रमुख मन्दिर   है. जो कि विभीषण कुण्ड के सामने स्थित है. मन्दिर की स्थापना 1904 के लगभग स्वामी बलरामाचारी द्वारा की गयी थी. इस मन्दिर में स्थापित प्रभु राम के विगृह को दक्षिण भारत से ही लाया गया था. यह मन्दिर रामानुज सम्प्रदाय के अत्यंत महत्व वाला मन्दिर है. वैष्णवों के लिए यह स्थान किसी तीर्थ से कम नहीं है. इस मन्दिर में अनुशासन के साथ गुरुकुल एवं वैदिक परम्पराओं का अनुसरण किया जाता है

लवकुश मन्दिर:-

यह मन्दिर अयोध्या के ह्रदय कहे जाने वाले रामकोट में राम जन्म भूमि के निकट स्थित है. यह स्थाम यूँ तो श्री राम के पुत्र लव कुश जी का  है, पर यहाँ सावन झूला महोत्सव और तुलसी शालिगराम विवाह अत्यंत प्रचलित है. राम जन्म भूमि के दर्शन के लिए आने वाले श्रद्धालु भगवान श्री राम के पुत्रगण लव कुश के दर्शन अवश्य करते हैं.

रंगमहल:-

अयोध्या के रामकोट मोहल्ले में राम जन्म भूमि के निकट भव्य रंग महल मन्दिर स्थित है. ऐसा माना जाता है कि जब सीता माँ विवाहोपरांत अयोध्या की धरती पर आयीं. तब कौशल्या माँ को सीता माँ का  स्वरुप इतना अच्छा लगा कि उन्होंने रंग महल सीता जी को मुँह दिखाई में दिया. विवाह के बाद भगवान श्री राम कुछ 4 महीने इसी स्थान पर रहे. और यहाँ सब लोगों ने मिलकर होली  खेली थी. तभी से इस स्थान का नाम रंगमहल हुआ. इस मन्दिर में आज भी होली का त्यौहार हर्षोल्लास से मनाया जाता है. फाल्गुन माह में यहाँ होली खेलने का विशेष इंतजाम होता है.

रत्न सिंहासन/ राजगद्दी:-

रत्न सिंहासन या राजगद्दी वह स्थान है जहाँ श्री राम भगवान ने 11000 वर्ष बैठ के राज किया. उन्होंने यहाँ बैठ के ही अपनी प्रजा का न्याय किया. जब मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम लंका के राजा रावण का वध करके पहली बार अयोध्या वापस आये, तब उनका राज्याभिषेक इसी सिंहासन पर किया गया. हर्षित होकर देवताओं ने फूल बरसाए, इंद्र कुबेर ने सोने चांदी एवं मणियों से सवा प्रहर तक राज्याभिषेक किया. पूरे अयोध्या को दीपों से सजाया गया. इस मन्दिर के गर्भ गृह में  प्रभु श्री राम जी हैं, दाहिने तरफ लक्ष्मण जी और बाएं तरफ जगत माता सीता जी विराजमान हैं . उनके पीछे अत्यंत प्राचीन विग्रह हैं

मणि पर्वत:-

मणि पर्वत मन्दिर  लगभग 200 फीट ऊँचे टीले पर स्थित है. इसकी छत से पुरे अयोध्या के दर्शन होते हैं. भगवान श्री राम के विवाह के पश्चात से यहाँ झूले की परंपरा चली आ रही है. मान्यता है कि झुला महोत्सव के रूप में मनाये जाने वाले इस अवसर पर अयोध्या में विराजमान समस्त भगवान यहाँ झूला झूलने आते हैं. सावन के महीने में माता सीता ने जी ने इस स्थान पर पंचमी मनाई थी, झूला झूली थी. तभी से यहाँ झूला उत्सव मनाया जाता है.

ऐतिहासिक गुरुद्वारा ब्रम्हकुण्ड:-

यह तीर्थ सिखों के लिए अत्यंत पवित्र है. सिखों के प्रथम नवं एवं दसम गुरुओं ने इस धरती पर अपने श्री चरण रखे. गुरुओं के आने और यहाँ प्रवचन देने से इस स्थान की महत्ता और बढ़ गयी.  उसके पूर्व से यह स्थान ब्रम्ह कुण्ड के नाम से जाना जाता था. बताया जाता है जब श्री राम अयोध्या पूरी को आये थे, उस समय सारे देवता यहाँ आये थे राजतिलक देने के लिए. राजतिलक में ब्रम्हा जी भी आये थे. राज्याभिषेक होने के बाद ब्रम्हा जी ने राम चन्द्र जी से कहा कि  मेरा भी उद्धार करो, तब श्री राम चन्द्र जी ने कहा कि तुम तप करो. पहले इस जगह का प्राचीन नाम तीर्थराज था

कोरिया की रानी ‘हो’ का स्मृति स्थल:-

यह कम अचरज की बात नहीं है कि हमारे देश विभिन्न धर्मों के गुरुओं ने अयोध्या की पावन धरती को भक्ति भाव से अभिसिंचित किया है. तब और आश्चर्य होता है जब यह पता चलता है कि यहाँ से हजारों किलोमीटर दूर  दक्षिण कोरिया के लिए भी यह स्थान उतना ही महत्वपूर्ण है जितना हम भारतियों के लिए . कोरिया की पुरातन इतिहास गाथा के अनुसार प्राचीन कोरियाई कारक राज्य के संस्थापक राजा सूरो की धर्मपत्नी रानी हो का जन्म अयोध्या नगर में हुआ था.

अयोध्या आये  तो इन सभी स्थानो पे जरूर जाये।

अयोध्या परिक्रमा (Ayodhya parikrama)

नोट : अगर आप कुछ और जानते है या इसमें कोई त्रुटि है तो सुझाव और संशोधन आमंत्रित है।

जय श्री राम 

अयोध्या शब्द का अर्थ

अयोध्या(Aayodhya) शब्द का स्पष्ट अर्थ है “जो हराया नहीं जा सकता

अंबरनाथ मंदिर सबसे प्राचीन शिव मंदिर

अंबरनाथ शिव मंदिर (ancient ambernath shiv mandir Temple), महाराष्ट्र का अंबरनाथ मंदिर भगवान शिव को समर्पित है। मंदिर में मिले एक शिलालेख के अनुसार इसका निर्माण 1060 ईस्वी में शिलाहट के राजा मांबणि ने करवाया था। वहां के स्थानीय निवासी इस मंदिर को पांडवकालीन मानते हैं। यह मंदिर प्राचीन हिन्दू शिल्पकला की ज्वलंत मिसाल है। ग्यारहवीं शताब्दी के मध्य में बने अंबरनाथ शिव मंदिर (shiv mandir ambarnath) के बारे में कहा जाता है ​कि इसके जैसा मंदिर पूरी दुनिया में और कहीं नहीं।

  इस मंदिर में गभरा नामक मुख्य कमरे में नीचे जाने के लिए 20 सीढ़ियाँ हैं; और कमरे के केंद्र में एक शिवलिंग है। महाशिवरात्रि के अवसर पर भगवान शिव से आशीर्वाद पाने के लिए अंबरनाथ में एक बड़ा मेला लगता है।     इस मंदिर के बाहर दो नंदी बने हैं। मंदिर की मुख्य मूर्ति त्रैमस्तिकी है, इसके घुटने पर एक नारी है, जो शिव—पार्वती के स्वरूप को दर्शाती है। वलधान नदी के तट पर बना मंदिर इमली और आम के पेड़ों से घिरा हुआ है। मंदिर की वास्तुकला उच्चकोटि की है। यहां वर्ष 1060 ई. का एक प्राचीन शिलालेख भी पाया गया है। इस नगर में आप दियासलाई के कारखानों का भ्रमण भी कर सकते हैं।  

त्यौहार और समारोह(festival of ambernath):-

महा शिवरात्रि के अवसर पर एक भव्य मेला आयोजित किया जाता है जो हजारों भक्तों द्वारा दौरा किया जाता है। महा शिवरात्रि मेला 3–4 दिनों तक चलता है। महा शिवरात्रि के दिन, तीर्थयात्रियों के भारी प्रवाह के कारण अंबरनाथ का पूर्वी भाग वाहनों के लिए अवरुद्ध हो जाता है। मंदिर श्रावण के महीने में भीड़भाड़ वाला हो जाता है।

मन्दिर में दर्शन का समय(Ambernath shiv mandir Timing):-

मंदिर दिनभर दर्शनों के लिए खुला रहता है। माघ के महीने में शिवरात्रि के अवसर पर यहां विशाल मेले का आयोजन होता है।
इस मंदिर को पुनर्निर्माण किया गया है लेकिन पौराणिक कथा यह है कि यह एक एकल पत्थर से  पांडवों द्वारा बनाया गया था।

Also Read:- केवल एक चट्टान को काटकर बनाया गया प्राचीन कैलाश मंदिर(kailash mandir)

Mon, Wed-Sat:- 8AM–6PM
Tue 8AM–7:30PM
Sun 8AM–9PM

मानवीय हाथों से बना ऐसा चमत्कार :-

‘मानवीय हाथों से बना ऐसा चमत्कार मुंबई के मुहाने पर मौजूद है और मुंबईवाले ही उसे नहीं जानते- यह अपने आप में एक चमत्कार है’, जाने-माने पत्रकार प्रकाश जोशी अपना विस्मय रोक नहीं पाते, और यह सच है। काम पर आते-जाते विश्व विरासत(virasat) छत्रपति शिवाजी टर्मिनस को आप रोज ही देखा करते हैं। गाहे-बगाहे गेट-वे ऑफ इं‌डिया, एलिफेंटा केव्ज, मरीन ड्रॉइव और चौपाटी भी हो आते हैं। सिद्धिविनायक और बाबुलनाथ को सिर नवाना भी नहीं भूलते। पर, याद कीज‌िए, पहाड़ की तलहटी में बसे, मलंगगढ़ की विहंगम छटा दिखाने वाले अंबरनाथ के शिव मंदिर(shiv mandir at ambernath) के दर्शन करने पिछली बार आप कब गए थे- जो आपके प्रिय हिल स्टेशन खंडाला से आधे से कम दूरी पर है और अछूते सौंदर्य के लिहाज से उससे उन्नीस नहीं। बताइए, क्या आपके बच्चों ने इस मंदिर का नाम भी सुन रखा है…?

यूनेस्को द्वारा घोषित यह सांस्कृतिक विरासत :-

यूनेस्को द्वारा घोषित यह सांस्कृतिक विरासत इस वक्त अपने अस्तित्व के संकट से जूझ रही है।  यह उस जगह का हाल है, जिसे यूनेस्को ने अपनी सांस्कृतिक विरासत घोषित कर रखा है। विश्व भर में ऐसे कुल 218 ठिकाने हैं‌। इनमें भारत के पास महज 25 हैं और महाराष्ट्र में तो केवल चार। काश, पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने बाहर लगे सूचना पट पर ‘अंबरेश्वर’ (या ‘अमरनाथ’) के संरक्षित स्मारक होने की घोषणा करने के साथ इसकी देखभाल के लिए भी कुछ किया होता! सुशोभीकरण और आकर्षण वृद्धि तो दूर की बात, दरअसल, मंदिर का अस्तित्व ही इस समय खतरे में है। संरक्षण-दरअसल, अंबरनाथ के सन्मुख सबसे बड़ा मुद्दा इस समय यही है। भीतर लगे सुंदर पच्चीकारी वाले लौह स्तंभ और खूबसूरत पत्थर अपने जीर्ण होने की चुगली करते हैं। छतों और दीवारों को गिरने से रोकने के लिए जगह-जगह टेक लगाए गए हैं। खुले स्थानों से पानी लगातार रिसता रहता है और जगह-जगह सीलन और फिसलन होने के कारण गिरने के भय से एक-एक कदम संभालकर रखना पड़ता है। असल में अंबरनाथ किसी भी प्रयास के बजाय मंदिर निर्माण की कला की वजह से ही काल के थपेड़े और हर अन्याय व झंझावात सहते लगभग एक हजार वर्ष बाद भी टिका हुआ है। चाहें, तो इसे भोलेनाथ की कृपा भी कह लीज‌िए।
खंडहर बना अंबरेश्वर आज अपने स्वर्णिम अतीत की छाया भर रह गया है। इसकी हालत दारुण है- बहुत दारुण। यहां तक कि डर लगने लगा है कि क्या हमारी भावी पीढ़ियां इतिहास, कला और संस्कृति के इस अद्भुत नमूने को देख पाएंगी? अगर हां, तो यह कैसे होगा? इसे सहेज कर रखने की जिम्मेदारी आखिर किसकी है?

एक रात में बना मंदिर:-

अंबरनाथ की जड़ें महाभारत काल तक जाती हैं। लोकोक्ति है कि पांडवों ने अपने अज्ञातवास के सबसे दूभर कुछ वर्ष अंबरनाथ में बिताए थे और यह पुरातन मंदिर उन्होंने एक ही रात में विशाल पत्थरों से बनवा डाला था। कौरवों द्वारा लगातार पीछा किए जाने के भय से यह स्थान छोड़कर उन्हें जाना पड़ा। मंदिर फिर पूरा नहीं हो सका। आसमान के साथ स्वयंभू शिवलिंग के दर्शन कराने वाला गर्भगृह के- जो मंडप से 20 सीढ़ियां नीचे है, ठीक ऊपर शिखर का न होना इस धारणा को पुष्ट करता है। मौसम के झंझावात झेलता मंदिर तब भी सिर तानकर खड़ा है। बगल से बहती वालधुनी नदी बाढ़ में जब भी विकराल रूप में होती है, उसका पहला नजला इमली और आम के पेड़ों से घिरे इस परिसर पर ही फूटता है।
अंबरनाथ मंदिर की तुलना आबू के दिलवाड़ा, उदयपुर के उदयेश्वर और सिन्नर के गोंडेश्वर मंदिरों से की जाती है। इतना मोहक पौराणिक मंदिर मुंबई के इतने पास है, फिर भी अगर आपने देखा नहीं। तो फिर बोलिए, दुर्भाग्य किसका है!

ambernath shiv mandir कहाँ है ?

महाराष्ट्र

अंबरनाथ शिव मंदिर क्यों प्रसिद्द है ?

यह मंदिर प्राचीन हिन्दू शिल्पकला की ज्वलंत मिसाल है। वहां के स्थानीय निवासी इस मंदिर को पांडवकालीन मानते हैं।

अंबरनाथ शिव मंदिर की विशेष खूबी क्या है ?

एक रात में बना मंदिर

लेपाक्षी मंदिर

आंध्र प्रदेश के अनंतपुर जिले का लेपाक्षी मंदिर(lepakshi temple-Sri Veerabhadra Temple) हैंगिंग पिलर्स (हवा में झूलते पिलर्स) के लिए पूरी दुनिया में मशहूर है। इस मंदिर के 70 से ज्यादा पिलर बिना किसी सहारे के खड़े हैं और मंदिर को संभाले हुए हैं। मंदिर के ये अनोखे पिलर हर साल यहां आने वाले लाखों टूरिस्टों के लिए बड़ी मिस्ट्री हैं। मंदिर में आने वाले भक्तों का मानना है कि इन पिलर्स के नीचे से अपना कपड़ा निकालने से सुख-समृद्धि मिलती है। अंग्रेजों ने इस रहस्य को जानने के लिए काफी कोशिश की, लेकिन वे कामयाब नहीं हो सके।

Hanging-pillar-lepakshi
भारत के गर्भ में कई ऐसे रहस्य छुपे हैं जिनके बारे आजतक कोई जान नहीं पाया। ऐसा ही रहस्य समेटे हुए है आंध्र प्रदेश का लेपाक्षी मंदिर। लेपाक्षी मंदिर को हैंगिंग पिलर टेम्पल के नाम से भी जाना जाता है। यह मंदिर कुल 70 खम्भों पर खड़ा है जिसमे से एक खम्भा जमीन को छूता नहीं है बल्कि हवा में ही लटका हुआ है। जानिए क्या है इस मंदिर का रहस्य-

(1) कैसे पड़ा ‘लेपाक्षी'(lepakshi) नाम:-

वनवास के दौरान भगवान श्रीराम, लक्ष्मण और माता सीता यहां आए थे। सीता का अपहरण कर रावण अपने साथ लंका जा रहा था, तभी पक्षीराज जटायु ने रावण से युद्ध किया और घायल हो कर इसी स्थान पर गिरे थे। जब श्रीराम सीता की तलाश में यहां पहुंचे तो उन्होंने ‘ले पाक्षी’ कहते हुए जटायु को अपने गले लगा लिया। ले पाक्षी एक तेलुगु शब्द है जिसका मतलब है ‘उठो पक्षी’।
साथ ही यह भी कहा जाता है कि  मंदिर को सन् 1583 में विजयनगर के राजा के लिए काम करने वाले दो भाईयों विरुपन्ना और वीरन्नाने बनाया था। वहीं, पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक इसे ऋषि अगस्त ने बनाया था।

(2) अंग्रेजों ने की थी मिस्ट्री जानने की कोशिश :-

6वीं सदी में बने इस मंदिर के रहस्य को जानने के लिए अंग्रेजों में इसे शिफ्ट करने की कोशिश की, लेकिन वे नाकाम रहे। जब एक अंग्रेज इंजीनियर ने इसके रहस्य को जानने के लिए मंदिर को तोड़ने का प्रयास किया तब यह पता चला की इस मंदिर के सभी पिलर हवा में झूलते हैं।

(3) रामपदम् :-

दूसरी ओर, मंदिर में रामपदम (मान्यता के मुताबिक श्रीराम के पांव के निशान) स्थित हैं, जबकि कई लोगों का मानना है की यह माता सीता के पैरों के निशान हैं।

ये जानकारी आपको कैसी लगी कृपया कमेंट जरूर करे अगर आप कुछ और जानते है इस टेम्पल के बारे में तो हमें जरूर भेजे उसके बारे में।

निधिवन प्रेम भरी रहस्यमयी जगह(nidhivan is the most lovable but mysteries place)

निधिवन एक अत्यन्त पवित्र, रहस्यमयी धार्मिक स्थान और  निधिवन प्रेम भरी रहस्यमयी जगह(nidhivan is the most lovable but mysteries place) भी  है। भारत में कई ऐसी जगह है जो अपने दामन में कई रहस्यों को समेटे हुए है ऐसी ही एक जगह है वृंदावन स्तिथ  निधि वन जिसके बारे में मान्यता है की यहाँ आज भी हर रात कृष्ण गोपियों संग रास रचाते है।  रास के बाद निधिवन परिसर में स्थापित रंग महल में शयन करते हैं। रंग महल में आज भी प्रसाद (माखन मिश्री) प्रतिदिन रखा जाता है। शयन के लिए पलंग लगाया जाता है। सुबह बिस्तरों के देखने से प्रतीत होता है कि यहां निश्चित ही कोई रात्रि विश्राम करने आया तथा प्रसाद भी ग्रहण किया है। लगभग दो ढ़ाई एकड़ जगह में फैले निधिवन के वृक्षों की खासियत यह है कि इनमें से किसी भी वृक्ष के तने सीधे नहीं मिलेंगे तथा इन वृक्षों की डालियां नीचे की ओर झुकी तथा आपस में गुंथी हुई प्रतीत हाते हैं। यहाँ आज भी हर रात कृष्ण गोपियों संग रास रचाते है। यही कारण है की सुबह खुलने वाले निधिवन को संध्या आरती के पश्चात बंद कर दिया जाता है। उसके बाद वहां कोई नहीं रहता है यहाँ तक की निधिवन में दिन में रहने वाले पशु-पक्षी भी संध्या होते ही निधि वन को छोड़कर चले जाते है।
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निधिबन

निधिवन परिसर में ही संगीत सम्राट श्री स्वामी हरिदास जी की जीवित समाधि

निधिवन परिसर में ही संगीत सम्राट श्री स्वामी हरिदास जी की जीवित समाधि, रंग महल, बांके बिहारी जी का प्राकट्य स्थल, राधारानी बंशी चोर आदि दर्शनीय स्थान है। निधिवन दर्शन के दौरान वृन्दावन के पंडे-पुजारी, गाईड द्वारा निधिवन के बारे में जो जानकारी दी जाती है

जो भी देखता है प्रेम-लीला वो राधा कृष्णा में समा जाता या  पागल है

वैसे तो शाम होते ही निधिवन बंद हो जाता है और सब लोग यहाँ से चले जाते है। लेकिन फिर भी यदि कोई छुपकर रासलीला देखने की कोशिश करता है तो पागल हो जाता है। पंडे-पुजारी अनुसार निधिवन में प्रतिदिन रात्रि में होने वाली श्रीकृष्ण की रासलीला को देखने वाला अंधा, गूंगा, बहरा, पागल और उन्मादी हो जाता है ताकि वह इस रासलीला के बारे में किसी को बता ना सके। उनके अनुसार यहां जो भी रात को रुक जाते है वह सांसारिक बन्धन से मुक्त हो जाते हैं और जो मुक्त हो गए हैं, उनकी समाधियां परिसर में ही बनी हुई है। prem lila

रंगमहल में सज़ती है सेज़ :

इसी के साथ गाईड यह भी बताते हैं कि निधिवन में जो आपस में गुंथे हुए वृक्ष आप देख रहे हैं, वही रात में श्रीकृष्ण की 16000 रानियां बनकर उनके साथ रास रचाती हैं। रास के बाद श्रीराधा और श्रीकृष्ण परिसर के ही रंग महल में विश्राम करते हैं। सुबह 5:30 बजे रंग महल का पट खुलने पर उनके लिए रखी दातून गीली मिलती है और सामान बिखरा हुआ मिलता है जैसे कि रात को कोई पलंग पर विश्राम करके गया हो। रंगमहल में भक्त केवल श्रृंगार का सामान ही चढ़ाते है और प्रसाद स्वरुप उन्हें भी श्रृंगार का सामान मिलता है। Radha rani sringar

यहाँ  तुलसी के पेड़ बनते है गोपियाँ :

निधि वन की एक अन्य खासियत यहाँ के तुलसी के पेड़ है।  निधि वन में तुलसी का हर पेड़ जोड़े में है।  इसके पीछे यह मान्यता है कि जब राधा संग कृष्ण वन में रास रचाते हैं तब यही जोड़ेदार पेड़ गोपियां बन जाती हैं। जैसे ही सुबह होती है तो सब फिर तुलसी के पेड़ में बदल जाती हैं। साथ ही एक अन्य मान्यता यह भी है की इस वन में लगे जोड़े की वन तुलसी की कोई भी एक डंडी नहीं ले जा सकता है। लोग बताते हैं कि‍ जो लोग भी ले गए वो किसी न किसी आपदा का शिकार हो गए। इसलिए कोई भी इन्हें नहीं छूता। nidhivan mysteries place

यहाँ  वन के आसपास बने मकानों में नहीं हैं खिड़कियां :

वन के आसपास बने मकानों में खिड़कियां नहीं हैं। यहां के निवासी बताते हैं कि शाम सात बजे के बाद कोई इस वन की तरफ नहीं देखता। जिन लोगों ने देखने का प्रयास किया या तो अंधे हो गए या फिर उनके ऊपर दैवी आपदा आ गई। जिन मकानों में खिड़कियां हैं भी, उनके घर के लोग शाम सात बजे मंदिर की आरती का घंटा बजते ही बंद कर लेते हैं। कुछ लोग तो अपनी खिड़कियों को ईंटों से बंद भी करा दिया है।

यहाँ वंशी चोर राधा रानी का भी है मंदिर :

निधि वन में ही वंशी चोर राधा रानी का भी मंदिर है। यहां के महंत बताते हैं कि जब राधा जी को लगने लगा कि कन्हैया हर समय वंशी ही बजाते रहते हैं, उनकी तरफ ध्यान नहीं देते, तो उन्होंने उनकी वंशी चुरा ली। इस मंदिर में कृष्ण जी की सबसे प्रिय गोपी ललिता जी की भी मूर्ति राधा जी के साथ है। bansi-chor-radharani

विशाखा कुंड :

निधिवन में स्थित विशाखा कुंड के बारे में कहा जाता है कि जब भगवान श्रीकृष्ण सखियों के साथ रास रचा रहे थे, तभी एक सखी विशाखा को प्यास लगी। कोई व्यवस्था न देख कृष्ण ने अपनी वंशी से इस कुंड की खुदाई कर दी, जिसमें से निकले पानी को पीकर विशाखा सखी ने अपनी प्यास बुझायी। इस कुंड का नाम तभी से विशाखा कुंड पड़ गया। vishakha kund

 बांकेबिहारी जी का प्राकट्य स्थल :

विशाखा कुंड के साथ ही ठा. बिहारी जी महाराज का प्राकट्य स्थल भी है। कहा जाता है कि संगीत सम्राट एवं धु्रपद के जनक स्वामी हरिदास जी महाराज ने अपने स्वरचित पदों का वीणा के माध्यम से मधुर गायन करते थे, जिसमें स्वामी जी इस प्रकार तन्मय हो जाते कि उन्हें तन-मन की सुध नहीं रहती थी। बांकेबिहारी जी ने उनके भक्ति संगीत से प्रसन्न होकर उन्हें एक दिन स्वप्न दिया और बताया कि मैं तो तुम्हारी साधना स्थली में ही विशाखा कुंड के समीप जमीन में छिपा हुआ हूं। स्वप्न के आधार पर हरिदास जी ने अपने शिष्यों की सहायता से बिहारी जी को वहा से निकलवाया और उनकी सेवा पूजा करने लगे। ठा. बिहारी जी का प्राकट्य स्थल आज भी उसी स्थान पर बना हुआ है। जहा प्रतिवर्ष ठा. बिहारी जी का प्राकट्य समारोह बड़ी धूमधाम के साथ मनाया जाता है। कालान्तर में ठा. श्रीबांकेबिहारी जी महाराज के नवीन मंदिर की स्थापना की गयी और प्राकट्य मूर्ति को वहा स्थापित करके आज भी पूजा-अर्चना की जाती है। जो आज बाकेबिहारी मंदिर के नाम से प्रसिद्ध है।

वास्तव में, निधिवन एक रहस्यमय जगह है जो दुनिया भर के सभी प्रकार के यात्रियों का ध्यान आकर्षित करता है। हालांकि, इस जगह के बारे में अधिक जानने में असंभव लगता है, यह अब भी एक ऐसा गंतव्य है जो अधिक खोज की इंतजार कर रहा है!

Nidhivan opening Timing: गर्मी में समय :05:00AM to 08:00PM ठण्ड में समय:06:00AM to 7:00PM