आध्यात्मिक स्थान

ऋषिकेश (Rishikesh) शांति और सुकून का जहाँ संगम है 

उत्तराखंड पर्यटन(यात्रा ) में स्तिथ ऋषिकेश में आध्यात्मिक ,शांति और सुकून का जहाँ अनूठा संगम है यहाँ पर्यटन बहुत ही तेजी से बढ़ रह है। जिसमे की आप देख सकते है मंदिर पर्यटन बहुत ही प्रसिद्द है। साथ ही यहाँ कई सारी पहाड़ियाँ मिलेंगी जो आपको आध्यात्मिक यात्रा की तरफ ले जाती है। मन को बहुत ही शांति मिलती है। ऋषिकेश एक ऐसी जगह है जो न केवल आध्यात्मिक आकर्षण प्रदान करता है, बल्कि यात्रियों को प्रकृति( nature) के बीच कायाकल्प करने की भी अनुमति देता है।

अगर आप ऋषिकेश जाते है तो इन प्राचीन मंदिरों के दर्शन करने से नहीं चूकिए।

ऋषिकेश में 12 प्रसिद्ध मंदिर (12 Famous Temples In Rishikesh):-

नीचे सूचीबद्ध (list) ऋषिकेश शहर के कुछ सबसे अद्भुत मंदिर दिए गए हैं।  जो इस स्थान का सार  या जो इस जगह की खूबियों को दर्शाते हैं। सुनिश्चित करें कि आप उत्तराखंड के इस शहर में अपनी यात्रा के दौरान इनमें से अधिकांश मंदिरों को कवर  कर सके।

  1. शत्रुघ्न मंदिर ( Shatrughna Temple )
  2. श्री भरत मंदिर ( Shri Bharat Mandir  )
  3. कुंजापुरी देवी मंदिर ( Kunjapuri Devi Temple )
  4. नीलकंठ महादेव मंदिर ( Neelkanth Mahadev Temple )
  5. भूतनाथ मंदिर ( Bhootnath Temple )
  6. त्रयंबकेश्वर मंदिर (Trayambakeshwar Temple )
  7. लक्ष्मण मंदिर ( Lakshman Temple )
  8. परमार्थ निकेतन (Parmarth Niketan )
  9. गीता भवन ( Gita Bhawan )
  10. स्वर्ग निवास (Swarg Niwas)
  11. रघुनाथ मंदिर ( Raghunath Temple )
  12. हनुमान मंदिर (Hanuman Mandir)

शत्रुघ्न मंदिर ( Shatrughna Temple ) :-

श्री भरत मंदिर ( Shri Bharat Mandir  ):-

कुंजापुरी देवी मंदिर ( Kunjapuri Devi Temple ) :-

नीलकंठ महादेव मंदिर ( Neelkanth Mahadev Temple ) :-

भूतनाथ मंदिर ( Bhootnath Temple ) :-

त्रयंबकेश्वर मंदिर (Trayambakeshwar Temple ) :-

लक्ष्मण मंदिर ( Lakshman Temple ):-

परमार्थ निकेतन (Parmarth Niketan ):-

गीता भवन ( Gita Bhawan ):-

स्वर्ग निवास (Swarg Niwas) :-

रघुनाथ मंदिर ( Raghunath Temple ):-

हनुमान मंदिर (Hanuman Mandir):-

पांच हज़ार से अधिक वर्ष पूर्व का महाभारत कालीन वट वृक्ष

अक्षवत वृक्ष(Akshavat Vriksh  – SHUKARTAAL) मोरना (मुजफ्फरनगर) में आज भी अपनी विशाल जटाओं को फैलाये खड़ा है. अद्भुत रूप से फैली यह जटाएं श्रद्धालु लोग पूजते हैं और स्वयं के मोक्ष की अपेक्षा में समय-समय पर आयोजित होने वाली भागवत कथाओं के आयोजन में सम्मिलित होते हैं. पूरा परिसर एक तीर्थ के रूप में जाना जाता है जहाँ अन्य प्राचीन मंदिर, धर्मशालायें, समागम स्थल स्थापित हैं. उस समय नदी का प्रवाह निकट ही था परन्तु वर्तमान में इसने अपना रास्ता बदल लिया है और नदी वहां से काफी दूर हो गई है. मंदिर में जाने के लिए काफी सीढ़ियां चढ़कर ऊपर जाना होता है.

श्री शुकदेव मुनि जी ने श्रीमदभागवत कथा सुनाई:-

शुक्रताल उत्तर भारत की ऐतिहासिक पौराणिक तीर्थ नगरी रही है। यहां पर करीब छह हजार साल पहले महाभारत काल में हस्तिनापुर के तत्कालीन महाराज पांडव वंशज राजा परीक्षित को श्राप से मुक्ति दिलाकर मोक्ष प्रदान करने के लिए गंगा किनारे प्राचीन अक्षवत वृक्ष(Akshavat Vriksh ) के नीचे बैठकर 88 हजार ऋषि मुनियों के साथ श्री शुकदेव मुनि जी ने श्रीमदभागवत कथा सुनाई थी ।शुक्रताल उत्तर भारत की ऐतिहासिक पौराणिक तीर्थ नगरी रही है। यहां पर करीब छह हजार साल पहले महाभारत काल में हस्तिनापुर के तत्कालीन महाराज पांडव वंशज राजा परीक्षित को श्राप से मुक्ति दिलाकर मोक्ष प्रदान करने के लिए गंगा किनारे प्राचीन अक्षय वट के नीचे बैठकर 88 हजार ऋषि मुनियों के साथ श्री शुकदेव मुनि जी ने श्रीमदभागवत कथा सुनाई थी ।
Akshay Vat

पौराणिक वट वृक्ष के बारे में मान्यता :-

यह वट वृक्ष आज भी भक्ति सागर से ओतप्रोत हरा-भरा अपनी विशाल बाहें फैलाए अडिग खड़ा अपनी मनोहारी छटा बिखेर रहा है। पौराणिक वट वृक्ष के बारे में मान्यता है कि पतझड़ के दौरान इसका एक भी पत्ता सूखकर जमीन पर नहीं गिरता अर्थात इसके पत्ते कभी सूखते नहीं है और इसका एक विशेष गुण यह भी है कि इस विशाल वृक्ष में कभी जटाएं उत्पन्न नहीं हुई।

पांच हज़ार वर्ष आयु वाला:-

की आयु वाला ये वट वृक्ष आज भी युवा है। इस वृक्ष से 200 मीटर दूरी पर एक कुंआ है, जिसे पांडवकालीन कहा जाता है। क्षेत्रीय लोगों का कहना है कि वट वृक्ष जैसी धरोहर के प्रचार-प्रसार को शासन स्तर पर गंभीरता का अभाव है।
हालांकि आश्रम के पीठाधीश्वर स्वामी ओमानंद महाराज बताते हैं कि देश के कोने-कोने से अनेक श्रद्धालु तीर्थ नगरी में आते हैं और एक सप्ताह तक रहकर श्रीमद भागवत कथा का आयोजन कराते हैं। इसके अलावा अनेक श्रद्धालु सत्यनारायण भगवान की कथा का आयोजन भी प्राचीन वट वृक्ष के नीचे बैठकर कराते हैं। मान्यता है कि जो भी श्रद्धालु सच्चे मन से प्राचीन अक्षय वट वृक्ष पर धागा बांधकर मनौती मांगते हैं। उनकी मनोकामना अवश्य पूर्ण होती है।

अगर हम अपने सांस्कृतिक विरासतों से दूर होते जायेंगे :-

आज हमारे देश की विरासत, धरोहर जो अपने अंदर अननत शक्तियों को लेके विराजमान है उनका कोई प्रचार प्रसार नहीं होता। जिसकी वजय से आने वाली पीढ़िया इन सबके बारे में नहीं जान पाती। अब आप सोच रहे होंगे जान कर क्या होगा। अगर हम अपने सांस्कृतिक विरासतों से दूर होते जायेंगे तो आने वाली युवा  पीढ़ी तक हम इस खूबसूरती को नहीं पंहुचा पाएंगे।
जिससे हमारे देश की नीव कमज़ोर हो जाएगी। भारत देश अपने आध्यात्मिक शक्ति ,मंदिरो ,संतो, किसानो ,और सांस्कृतिक विरासतों की वजय से ही पुरे विश्व में प्रसिद्द है। इसलिए अपने देश की विरासतों से प्यार करे उसकी खूबसूरती आध्यात्मिकता को सब तक पहुचाये। और खुद जाकर देखे जगहों की खूबसूरती को जो अपने अंदर कितने रहस्य को छिपा कर बैठे है।

आज दिलो को जरुरत है सुकून की और वो सिर्फ हमें सचाई से सच से जुड़ कर मिलेगी। जो हमारी देश की विरासतों में है। जो कई युगो से है।

कैसे शुक्रताल एक तीर्थ स्थल के रूप में जाने जाना लगा

माँ छिन्नमस्तिका मंदिर

असम में कामाख्या मंदिर के बाद इसे दूसरा तीर्थ स्थल के रूप में काफी लोकप्रिय माना जाता है। झारखंड की राजधानी रांची से लगभग 80 किलोमीटर की दूरी पर माँ छिन्नमस्तिका या रजरप्पा(Rajrappa Temple) का यह मंदिर है। रजरप्पा के भैरवी-भेड़ा और दामोदर नदी के संगम पर स्थित मां छिन्नमस्तिके मंदिर आस्था की धरोहर और सांस्कृतिक विरासत(virasat)  है।
रजरप्पा का यह सिद्धपीठ केवल एक मंदिर के लिए ही विख्यात/प्रसिद्द नहीं है। छिन्नमस्तिके मंदिर के अलावा यहां कई प्रसिद्द मंदिर और है।

विराट रूप मंदिर के नाम से कुल 7 मंदिर हैं। पश्चिम दिशा से दामोदर तथा दक्षिण दिशा से कल-कल करती भैरवी नदी का दामोदर में मिलना मंदिर की खूबसूरती में चार चांद लगा देता है।

दामोदर और भैरवी के संगम स्थल के समीप ही मां छिन्नमस्तिके का मंदिर(Rajrappa Temple) स्थित है। मंदिर की उत्तरी दीवार के साथ रखे एक शिलाखंड पर दक्षिण की ओर मुख किए माता छिन्नमस्तिके का दिव्य रूप अंकित है। मंदिर के निर्माण काल के बारे में पुरातात्विक विशेषज्ञों में मतभेद है। किसी के अनुसार मंदिर का निर्माण 6,000 वर्ष पहले हुआ था तो कोई इसे महाभारत युग का मानता है। यह दुनिया के दूसरे सबसे बड़े शक्तिपीठ के रूप में जाना जाता है।

राजपप्पा मंदिर का समय-Timing of Rajrappa Temple

मंदिर में प्रातःकाल 4 बजे माता का दरबार सजना शुरू होता है। भक्तों की भीड़ भी सुबह से पंक्तिबद्ध खड़ी रहती है, खासकर शादी-विवाह, मुंडन-उपनयन के लगन और दशहरे के मौके पर भक्तों की 3-4 किलोमीटर लंबी लाइन लग जाती है। इस भीड़ को संभालने और माता के दर्शन को सुलभ बनाने के लिए कुछ माह पूर्व पर्यटन विभाग द्वारा गाइडों की नियुक्ति की गई है। आवश्यकता पड़ने पर स्थानीय पुलिस भी मदद करती है।

मन्नतें मांगने के लिए:-

मां के मंदिर में मन्नतें मांगने के लिए लोग लाल धागे में पत्थर बांधकर पेड़ या त्रिशूल में लटकाते हैं।

मंदिर के आसपास ही फल-फूल, प्रसाद की कई छोटी-छोटी दुकानें हैं। आमतौर पर लोग यहां सुबह आते हैं और दिनभर पूजा-पाठ और मंदिरों के दर्शन करने के बाद शाम होने से पूर्व ही लौट जाते हैं। ठहरने की अच्छी सुविधा यहां अभी उपलब्ध नहीं हो पाई है।

मां छिन्नमस्तिका स्वरुप

मंदिर के अंदर स्थित शिलाखंड में मां की 3 आंखें हैं। बायां पांव आगे की ओर बढ़ाए हुए वे कमल पुष्प पर खड़ी हैं। पांव के नीचे विपरीत रति मुद्रा में कामदेव और रति शयनावस्था में हैं। मां छिन्नमस्तिके का गला सर्पमाला तथा मुंडमाल से सुशोभित है। बिखरे और खुले केश, जिह्वा बाहर, आभूषणों से सुसज्जित मां नग्नावस्था में दिव्य रूप में हैं। दाएं हाथ में तलवार तथा बाएं हाथ में अपना ही कटा मस्तक है। इनके अगल-बगल डाकिनी और शाकिनी खड़ी हैं जिन्हें वे रक्तपान करा रही हैं और स्वयं भी रक्तपान कर रही हैं। इनके गले से रक्त की 3 धाराएं बह रही हैं।

 मां करती है रात में यहां विचरण!

Rajrappa Temple

मां छिन्नमस्तिके की महिमा की पौराणिक कथाएं

मां छिन्नमस्तिके की महिमा की कई पुरानी कथाएं प्रचलित हैं। प्राचीनकाल में छोटा नागपुर में रज नामक एक राजा राज करते थे। राजा की पत्नी का नाम रूपमा था। इन्हीं दोनों के नाम से इस स्थान का नाम रजरूपमा पड़ा, जो बाद में रजरप्पा हो गया।

एक कथा के अनुसार एक बार पूर्णिमा की रात में शिकार की खोज में राजा दामोदर और भैरवी नदी के संगम स्थल पर पहुंचे। रात्रि विश्राम के दौरान राजा ने स्वप्न में लाल वस्त्र धारण किए तेज मुख मंडल वाली एक कन्या देखी।
उसने राजा से कहा- हे राजन, इस आयु में संतान न होने से तेरा जीवन सूना लग रहा है। मेरी आज्ञा मानोगे तो रानी की गोद भर जाएगी।
राजा की आंखें खुलीं तो वे इधर-उधर भटकने लगे। इस बीच उनकी आंखें स्वप्न में दिखी कन्या से जा मिलीं। वह कन्या जल के भीतर से राजा के सामने प्रकट हुई। उसका रूप अलौकिक था। यह देख राजा भयभीत हो उठे।
राजा को देखकर देख वह कन्या कहने लगी- हे राजन, मैं छिन्नमस्तिके देवी हूं। कलियुग के मनुष्य मुझे नहीं जान सके हैं जबकि मैं इस वन में प्राचीनकाल से गुप्त रूप से निवास कर रही हूं। मैं तुम्हें वरदान देती हूं कि आज से ठीक नौवें महीने तुम्हें पुत्र की प्राप्ति होगी।
देवी बोली- हे राजन, मिलन स्थल के समीप तुम्हें मेरा एक मंदिर दिखाई देगा। इस मंदिर के अंदर शिलाखंड पर मेरी प्रतिमा अंकित दिखेगी। तुम सुबह मेरी पूजा कर बलि चढ़ाओ। ऐसा कहकर छिन्नमस्तिके अंतर्ध्यान हो गईं। इसके बाद से ही यह पवित्र तीर्थ रजरप्पा के रूप में विख्यात हो गया।

कैसे पहुंचा जाये:(How to Reach:)

हवाईजहाज से (By Air)
निकटतम हवाई अड्डा रांची (70 किमी (43 मील)) है।
ट्रेन से (By Train)
निकटतम रेलवे स्टेशन रामगढ़ कैंट स्टेशन (28 किमी (17 मील)) हैं,
रास्ते से (By Road)
रामगढ़ छावनी पर उतर जाओ और राजपप्पा मंदिर पहुंचने के लिए ट्रेकर या जीप लें। सुबह से लेकर शाम तक ट्रेकर या जीप पुराने बस स्टैंड पर उपलब्ध हैं।
रहना (Stay)
रामगढ़ कैंट में कम और मध्यम बजट होटल उपलब्ध हैं। झारखंड पर्यटन विभाग ने राजपप्पा मंदिर में पर्यटक के लिए एक नया मेगा-कॉम्प्लेक्स बनाया है जिसमें शामिल हैं: धर्मशाला (आराम घर) में 16 डीलक्स कमरे हैं। विवाह और अन्य समारोह के उद्देश्य के लिए एक मंच भी बनाया गया है। परिसर जनता के लिए तैयार और खुला है

सीता गुफा-(Sita Gufa)

ऐसा माना जाता है कि भगवान राम के 14 वर्षों के दौरान, लक्ष्मण और maa सीता नासिक के पंचवटी( panchavati nashik ) क्षेत्र में रहे। पूरे पंचवटी क्षेत्र लगभग 5 किमी है। पंचवटी(panchavati) का शाब्दिक अर्थ 5 (पंच) बरगद के पेड़ (वट पेड़) है। ये पांच प्राचीन बरगद के पेड़ अभी भी सीता गुफा के आसपास स्थित हैं और संख्याओं के साथ चिह्नित हैं, ताकि आप उन्हें आसानी से पहचान सकें। नीचे एक बरगद के पेड़ की तस्वीर है जो सीता गुफा(Sita gufa) / गुफा मंदिर के ठीक सामने है।

सीता गुफा / गुफा मंदिर बहुत छोटा है।:-

आप आसानी से इस मंदिर को पहचान सकते हैं। यह मंदिर ज्यादा बड़ा तो नहीं लेकिन यह आध्यात्मिक ऊर्जा से परिपूर्ण है क्योंकि सीता मैया ने यहां पर तपस्या,आराधना बनवास के समय में   की थी।  इसीलिए एक अलग तरीके की आध्यात्मिक ऊर्जा आपको महसूस करने को मिलेगी जो कि आपके मन में भक्ति और प्रेम का प्रवाह कर देगी। यह सीता गुफा नासिक में पंचवटी क्षेत्र के अंदर ही आता है। गुफा के अंदर जाने में 20 मिनट से एक घंटे लग सकते हैं।

सीता गुफा(Sita gufa) के अंदर:-

आपको इसके अंदर जाने के लिए नीचे झुकना होगा। और आपको एक बराबर गुफा की छत नहीं मिलेगी कही आपको ऊपर तो कही निचे ऐसी मिलेगी।  इसलिए ज्यादातर लोग कदम पर बैठते हैं और गुफा के अंदर जाते हैं। गुफा की ऊंचाई लगभग 2.5 से 3 फीट है और जब आप अंदर जाते हैं तो यह छोटा  होते जाता है। बहुत मोटे लोगों या जिन  लोगों को सांस लेने में गुफा का दौरा करते  समय में समस्या हो सकती है।

जगह को और अधिक देखभाल और सुरक्षा की जरूरत है। आपके चप्पल को उतारने के लिए कोई विशष स्थान नहीं है। तो आप इसे बाहर छोड़ सकते हैं। गुफा परिसर के पीछे, थाली भोजन लगभग 60 आईएनआर में परोसा जाता है।

क्यों पड़ा कालाराम नाम भगवान् श्रीराम का और बनवास के समय कहाँ थी उनकी कुटिया?

सीता गुफा की कहानी:

जब लक्ष्मण ने सुरपानखा की नाक काट दिया तो 10,000 राक्षस भगवान राम और लक्ष्मण से लड़ने आए। उस समय पंचवटी एक घने जंगल थे। इसलिए मा सीता, राम और लक्ष्मण को छुपाने के लिए एक रात में यह गुफा बनाया गया। एक पहचान चिह्न के रूप में उन्होंने इन 5 बरगद के पेड़ लगाए।

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प्रभु राम की तपो भूमि का मान मिला इस नगरी को जिसे नासिक कहते है। नासिक में पंचवटी(panchavati) क्षेत्र में काला राम मंदिर है। और नासिक ही वह नगरी है जहा गोदा कहते है गंगा को। जो गोदावरी मैया तट पर स्तापित नासिक क्षेत्र है। भारतवर्ष के प्राचीन धार्मिक तथा सांस्कृतिक कार्य के लिए शहर प्रसिद्ध है। कालाराम मंदिर नासिक में पंचवटी नाम से प्रसिद्ध है और ये अत्यंत पवित्र स्थल है।  जहां नासिक के सर्वश्रेष्ठ मंदिर में काला राम मंदिर दर्शन मात्र से यात्रियों को दुगना आनंद प्राप्त होता है।  प्रभु श्री रामचंद्र ने अपने 14 वर्ष के वनवास में यहां कुछ वर्ष यहाँ निवास किया।  जहां पर उन की कुटिया होती थी वहीं पर इस मंदिर का निर्माण किया गया है।  सतयुग में दंडकारन नाम से जाना जाता था।

क्यों पड़ा कालाराम नाम भगवान् श्री राम का ?:-

यहां पर कई राक्षसों ने कई ऋषि मुनियों लोगों को अपनी शक्तियों से भयभीत कर रखा था।  जब प्रभु श्री रामचंद्र वनवास के समय यहां आए तब उन्होंने ऋषि मुनियों के प्रार्थना को स्वीकार करके अपना काला रूप धारण किया और यहां के जीव सृष्टि को उन राक्षसों से मुक्ति दिलाई। इसी कारण यहां पर प्रभु श्री रामचंद्र को कालाराम के नाम से जाना जाता है।

जहां थी श्रीराम जी की कुटिया:-

कालाराम मंदिर जो पंचवटी(panchavati) के नाम से भी प्रसिद्द है।  यही वह जगह है जहां थी  श्रीराम जी  की कुटिया हुआ करती थी। राम लखन सीता देवी की परम छवि यहां बस्ती थी। और आज भी यहाँ दिव्य छवि उनकी बस्ती है। जिनकी नज़रो में भक्ति और दिल में भाव है उनके लिए ही आज भी खुला उस दिव्य कुटिया का द्वार है।

कब बनी ये मंदिर ?

साधुओं को अरुणा-वरुणा नदियों पर प्रभु की मूर्ति प्राप्त हुई थी।  और साधुओं ने इसे लकड़ी के मंदिर में विराजित किया था। तत्पश्चात 1780 में माधवराव पेशवा की मातोश्री गोपिकाबाई की सूचना पर इस मंदिर का निर्माण करवाया गया। उस काल के दौरान मंदिर निर्माण में 23 लाख का खर्च अनुमानित बताया जाता है।

वार्षिक कार्यक्रम और उत्सव:-

चैत्र श्री राम नवरात्र और रामनवमी के महीने में मणिन उत्सव हैं। एकादशी पर शहर के माध्यम से ग्रैंड जुलूस, चैत्र के 11 वें दिन वर्ष की मुख्य और महत्वपूर्ण उत्सव हैं। यह रथ यात्रा मुख्य उत्सव है और इसे रामनवमी महोत्सव भी कहते है। अश्विन के 0 वें दिन “दशहरा” को भगवान राम  को  एक सिल्वर  की पालकी में बिठाया जाता है जो की एक उत्सव के रूप में मनाया जाता है।  और उत्साह के साथ मनाया जाता है।

रोज की पूजा , आरती, मंदिर खुलने का समय(Kalaram temple timing) :-

-> जाने एक ऐसा गुफा जो माँ सीता के बनवास काल से जुड़ा है CLICK HERE

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एक ऐसी अद्भुत जगह जहां श्री कृष्ण जी पर्वत के रूप विराजमान  है

श्री गोवर्धन(Govardhan Hill )महाराज :-

श्री गोवर्धन सिर्फ पर्वत नहीं है ये श्री कृष्ण जी का स्वरुप है जो कलयुग में प्रत्यक्ष है। हर कोई अपनी आँखों से देख सकता है यहाँ आकर एक अद्भुत शांति की प्राप्ति होती है।
मथुरा नगर के पश्चिम में लगभग 21 किमी की दूरी पर यह पहाड़ी स्थित है। यहीं पर गिरिराज पर्वत है जो 4 या 5 मील तक फैला हुआ है। इस पर्वत पर अनेक पवित्र स्थल है। पुलस्त्य ऋषि के श्राप के कारण यह पर्वत एक मुट्ठी रोज कम होता जा रहा है। कहते हैं इसी पर्वत को भगवान कृष्ण ने अपनी छोटी अँगुली पर उठा लिया था। गोवर्धन पर्वत को गिरिराज पर्वत(Govardhan Hill )भी कहा जाता है।

श्री गोवर्धन महाराज की भव्यता:-

श्री गोवर्धन महाराज सत्य घटना:-

भगवान श्री कृष्ण(shri krishna) की लीलाओं में विशेष लीला वृंदावन(vrindavan) में हुई वह अद्भुत लीला थी जिस लीला के कारण श्री कृष्ण का वह चमत्कार(miracle) देख आज हजारों लाखों लोगों  आकर्षित होते हैं भगवान श्री कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत(Govardhan Hill )उठा लिया था यह लीला कुछ इस प्रकार घटित हुई कृष्ण बलराम रोज की तरह गायों को चराने गए जब गाय चढ़ाकर भगवान वापस आए तो उन्होंने देखा पूरा का पूरा वृंदावन सभी कुछ विशेष सामग्री पूजा की थाली लेकर नंद बाबा के कहने पर बड़े पूजा की तैयारी कर रहे थे .
श्री कृष्ण छोटे थे वो पूछने  अलगे यज्ञ तैयारी और किस लिए वह सवाल करने लगे नंदबाबा से।  श्री कृष्ण(Shri krishna) जानते तो सब कुछ थे फिर भी नंद जी से पूछते हैं बाबा यह हम सब किनकी  पूजा की तैयारी कर रहे हैं फिर क्या था नंद बाबा ने बालक समझकर कृष्ण को कहा यह तो हम लोग हर साल करते हैं उसी  पूजा की तैयारी है।  नहीं बाबा मुझे बताइए यह किस भगवान के लिए पूजा(puja) की जा रही है पहले नंद बाबा ने टालने की कोशिश की लेकिन फिर नंद बाबा ने कहा हम लोग इंद्र की पूजा कर रहे हैं क्योंकि इंद्र हमें  वर्षा प्रदान करते हैं वर्षा के कारण हमारा खेत अच्छे से फलता-फूलता है कृष्ण जी ने कहा वर्षा तो हर जगह होती है वर्षा होती है तो खेतों पर भी होती है खेतों पर होती है समुद्र में भी होती हर जगह होती है लेकिन सभी लोग तो इंद्र जी की पूजा नहीं करते बारिश तो हर जगह होती है इस प्रकार से तर्क दिया तो नंद बाबा कुछ बोल नहीं पाए उन्होंने कहा कि यह पूजा कई पीढ़ियों से चली आ रही है तो इसीलिए हम भी कर रहे हैं क्या इसका शास्त्रों में वर्णन है यह हम लोग कई पीढ़ियों से  करते आ रहे हैं।  हम बरसों से बस करते चले आ रहे हैं।
श्री कृष्णा जी ने कहा  हमें  विशाल गोवर्धन की पूजा करनी चाहिए क्योंकि हम गोवर्धन की पूजा करेंगे तो गोवर्धन ही तो हमारी  गायों को भोजन देती है जिससे कि गायों की  भरपूर दूध से हम सबकी  सेवा होती  है।  हमें चाहिए कि हम गोवर्धन की पूजा करें। तर्क देने के बाद वास्तव में भगवान श्री कृष्ण लीला के द्वारा यह समझाना चाह रहे हैं देवता तो बहुत सारे हैं मुख्य देवता 33 है लेकिन संख्या में 33 करोड़ देवता हैं  सारे पृथ्वी से ऊपर के लोग में रहते हैं एक ब्रह्मांड की 14 लोक है पृथ्वी के नीचे सात लोक हैं भगवान कृष्ण अर्जुन को भगवत गीता में बोलते हैं हे अर्जुन यह जो ब्राह्मण है इसमें जितने लोग हैं चाहे ऊपर जाएं या मृत्यु के पश्चात नीचे जाए इन सब लोगों में दुख है और मृत्यु है और फिर से जन्म होता है यहां तो कई बार हम यह सोचते कि दुखों के कारण अपना घर बदलते बदलते हैं देश बदलते और यह सोचते हैं कि हमारे दुख कम हो जाएगा लेकिन दुख खत्म नहीं होता मानसिक चिंताएं खत्म नहीं होती

श्री कृष्णा ने कहा हमें देवताओं की पूजा नहीं करनी चाहिए हमें कर्म की पूजा करनी चाहिए हमें भगवान की पूजा करनी चाहिए और गोवर्धन पर्वत साक्षात भगवान का स्वरुप है क्योंकि वह हम सभी को छाया प्रदान करते हैं हम सभी के गायो को अन धन प्रदान करते हैं इसीलिए हम सभी को गोवर्धन महाराज के शरण में जाना चाहिए वह हम सब की पूजा जरूर स्वीकार करेंगे बस इतना ही सुनना था नंद बाबा ने कन्हैया की बात मान ली और सभी ग्वाल-बाल गैया मैया सभी को साथ लेकर सब बड़ी ही मस्त से होकर गोवर्धन महाराज की पूजा करने गए उन्होंने छप्पन भोग गोवर्धन महाराज को लगाया और खूब खूब अच्छे से उनकी पूजा सेवा की बस इतना देखते ही इंद्र देवता क्रोधित हो गए और उन्होंने बहुत ही मूसलाधार बारिश कि जिससे कि पूरा ब्रज गांव में जल ही जल हो गया था पूरा ब्रज गांव डूबने लगा था
तब सभी कहने लगे कन्हैया अब हम क्या करें हमें कौन बचाएगा तुमने ही कहा था इंद्र की पूजा मत करो अब इंद्र जी हम लोगो से क्रोधित हो गए हम कैसे उन्हें शांत करें। तो श्री कृष्ण जी ने कहा नंद बाबा हमें डरने की जरूरत नहीं हमने गोवर्धन भगवान की पूजा की है तो हमें सिर्फ अब उनकी शरण में जाना चाहिए तो सभी गोवर्धन पर्वत के अंदर प्रवेश करने लगे। गुफा में जगह कम होने के कारण सभी अंदर न जा सके ग्वाल बाल गाय सब बाहर खड़े थे तो देखते ही देखते श्री कृष्ण भगवान ने अपने कनिष्ठ उंगली पर श्री गोवर्धन महाराज को उठा लिया और सभी को कहा इस के अंदर आ जाओ पूरा ब्रज लोक पूरे बृजवासी सभी गोवर्धन के नीचे आ गए और जिससे उनकी रक्षा हो गई

source: isha

ह सब देख कर इंद्र देवता को लगा कि उन्होंने कुछ गलत किया है तो वह कृष्ण भगवान से क्षमा मांगने लगे ऐसा नहीं करना चाहिए तभी उनका नाम गोविंद नाम पड़ा गोवर्धनधारी नाम पड़ा। श्री. कृष्ण कहते हैं जब हमें अपने दुखों के पहाड ना उठे तो  एक बार सच्चे मन से जो उनकी शरण में  जाए तो वो  सभी के दुखों का पहाड़ जरूर उठाएंगे पर विश्वास और श्रद्धा होना चाहिए। जैसे ब्रजवासी सीधा गोवर्धन भगवान की शरण में ही गए।   श्री कृष्ण जी के ऊपर अपनी श्रद्धा भाव दिखाया आंख बंद करके उनके शरण में चले गए इस प्रकार आज भी गोवर्धन पर्वत हम सभी की इच्छाओं को पूरा करते हैं श्रद्धा और भक्ति भावना चाहिए। आज बहुत से लोगों की श्रद्धा गोवर्धन महाराज से जुड़ी हुई है हर महीने लोग यहां पर परिक्रमा के लिए आते हैं और अपने दुखों को बांटते हैं और उनको दुख कम करने का वर मांगते है और उनकी इच्छाएं पूरी होती है कलयुग में साक्षात प्रकट है श्री कृष्ण जी का स्वरुप।  श्री. गोवर्धन महाराज  की जय हो जय हो श्री गोवर्धन महाराज महाराज नित्य आया करो।

 श्री. गोवर्धन महाराज  की जय हो

श्री मथुरा जी की परिक्रमा

श्री मथुरा जी की परिक्रमा  10  किमी (6.2 mi) है। श्री मथुरा जी की परिक्रमा को पूरा करने में 3 घंटे का समय लगता है। मथुरा जी की ये परिक्रमा मुख्यतः एकादशी के दिन लगाई जाती है। श्री मथुरा जी की परिक्रमा में  आने वाले स्थानों के नाम है।

श्री मथुरा जी की परिक्रमा  में निम्न ये स्थान आते है जो की बहुत ही पवन है बहुत ही आराम से आप इनकी परिक्रमा आप कर सकते है।

  1. कंस किला  2. स्वामी घाट 3.  विश्राम घाट 4. श्री पुपलेश्वर महादेव 5. श्री दाउ जी घाट 6. श्री वटुकभेरब जी 7. बंगाली घाट 8. (धुर्व) घाट 9. ऋषि घाट 10. श्री रंगेश्वर महादेव मंदिर 11. पुराना बस स्टैंड 12. पुरातत्व (संघ्रालाये) 13. के. आर. डिग्री कॉलेज से होते हुये। 14.कंकाली टीले पर 15.श्री कंकाली देवी मंदिर 16. श्री जन्गनाथ बलभद्र कुण्ड 17. श्री कृष्ण बलराम मंदिर 18. श्री भुतेश्वर महादेव मंदिर 19. श्री गन्धेश्वर कुण्ड 20.पोतरा कुण्ड 21. श्री कृष्ण जन्मभूमि 22. श्री महाविधा देवी मंदिर 23. श्री सरस्वती देवी मंदिर एवं कुण्ड 24.रामलीला मैदान  25. श्री चामुंडा देवी मंदिर 26. श्री गायत्री तपोभूमि 27. श्री गोकरण महादेव मंदिर 28. श्री नीलकंठ महादेव मंदिर 29. वामनदेव घाट 30.चक्रतीर्थ एवं  31. चक्रेश्वर महादेव मंदिर 32. अमवरिश घाट, 33.कृष्ण गंगा घाट 34.  श्री राधा मदन 35.गोपाल जी मंदिर 36. कंस घाट 37.चिन्ताहरण महादेव मंदिर 38.श्री कन्सेश्वर महदेव मंदिर

यह परिकर्मा किसी भी स्थान से किसी समय प्रारंभ सकते है। लेकिन जिस स्थान से परिक्रमा प्रारंभ होती है। पुनः उसी स्थान पर परिक्रमा समाप्त करनी चाहिऐ।

श्री कृष्ण के प्यारो की नगरी

मथुरा श्री कृष्णा जी की जन्म भूमि है।  जहा श्री कृष्णा जी का जन्म हुआ और ये एक तीर्थ स्थान है। मथुरा वृंदावन(mathura) का हर एक कण कण खास है जहाँ श्री कृष्णा जी की हर एक छवियों का स्वरुप आपको देखने क लिए मिलेगा। पर्यटक का भी ये आकर्षण का केंद्र है. मथुरा भगवान श्री कृष्ण का निवासस्थान है और हिन्दू समाज में इसका बड़ा धार्मिक महत्त्व रखता है। यहाँ का इतिहास बहुत ही पुराना  है। यहाँ तक कि महाग्रंथ रामायण में भी मथुरा का उल्लेख  मिलता है।

मथुरा क्यों है इतना खास है ?:-

मथुरा वृंदावन खास कैसे न हो जंहा खुद श्री कृष्णा जी का जन्म हुआ था। इस पूरे क्षेत्र में भव्य मंदिर निर्मित हैं जो श्री कृष्ण के जीवन के विभिन्न पहलुओं को दर्शाते हैं। मथुरा और वृंदावन के जुड़वा शहर, जहां श्री कृष्ण का जन्म और लालन पालन हुआ, आज भी उनकी लीला और उनकी जादुई बांसुरी की ध्वनि से गुंजित रहते हैं।

मथुरा में प्रसिद्ध स्थान :

मथुरा में बहुत से प्रसिद्ध जगह है जो की ऐतिहासिक जगहों में से एक है यहां प्रमुख मंदिर है जो किस श्री कृष्णा जी के जीवन कल से ही अपने अंदर कई सारे रहस्य को समेटा बैठा है।

मथुरा की भाषा :-

मथुरा की भाषा ब्रज भाषा है।  जो की बहुत ही मीठी भाषा है ब्रज भाषा ही श्री कृष्णा जी बोलते थे। वृन्दावन में भी ब्रज भाषा बोली जाती है। मीठी से नोक झोक ब्रज भाषा में बहुत ही प्यारी लगती है। गोपियों का बर्तालाप कन्हैया से बहुत ही अद्भुत है जो श्रीमद भगवत जी में देखने को मिलता है।

जब भी इस तरफ तरह आये तो मथुरा आना न भूले। श्री कृष्णा जी की अनुभूतियों का स्थल है श्री मथुरा जी।

एक वीर योद्धा की जन्मभूमि

सरयू नदी के किनारे पर  पवित्र शहर अयोध्या(Ayodhya) है। यह भगवान विष्णु के सातवें अवतार के रूप में माना जाता है, जो कि श्री राम जी का जन्मस्थान है। अयोध्या एक प्रमुख तीर्थ स्थान है यहाँ मंदिरों(temple) का अयोध्या में कई धर्मों ने बड़े पैमाने पर और साथ-साथ कई बार समयावधि में भी विकास किया है। हिन्दू धर्म, बौद्ध धर्म, जैन धर्म के अवशेष, अब भी अयोध्या में पाये जा सकते हैं। रामायण में अयोध्या के बारे में उल्लेख है कि शहर की स्थापना हिंदुओं के विधायक मनु ने की थी। अयोध्या को शुरूआती कोसल देश  के नाम से जाना जाता था और सत्ताधारी राजवंश के रूप में जाना जाता था। श्री राम जी सूर्यवंश राजवंश के थे।

अयोध्या पुण्यनगरी है। अयोध्या श्रीरामचन्द्रजी की जन्मभूमि होने के नाते भारत के प्राचीन साहित्य व इतिहास में सदा से प्रसिद्ध रही है। अयोध्या की गणना भारत की प्राचीन सप्तपुरियों में प्रथम स्थान पर की गई है। अयोध्या के श्री राम, राम जू की अजोध्या …! त्रेता, द्वापर और अब कलयुग…लाखों वर्ष बाद, आज भी राम अचल हैं अविनाशी हैं. जब तक राम हैं तभी तक अयोध्या का महत्व रहेगा और जब तक अयोध्या रहेगी तब तक प्रभु श्री राम करोड़ों हृदयों में वास करते रहेंगे . लाखों वर्ष से मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु श्री राम पाप पुण्य की कसौटी पर अपने भक्तों पर कृपा बरसाते रहे हैं. उनके कृपा पात्र भक्त, साधो, सन्यासी उनके दर्शन को सदैव लालायित रहते हैं. उनकी राम के प्रति भक्ति, प्रेम और उन्हें महसूस करने की लालसा दूरी नहीं देखती. इस पावन धरती पर पहुँचने का संघर्ष नहीं देखती, समय नहीं देखती. वो दीन दुनिया भूल के अपने राम के सानिध्य में कुछ समय बिताने के लिए यहाँ आते हैं. वो उन पवित्र स्थानों पर बने मंदिरों में राम को, उसी रूप में देखते हैं. जिस रूप में कभी राम ने जन्म लिया होगा, कहीं सखाओं के साथ खेले होंगे, कहीं विवाहोपरांत सीता माता के साथ पहले कदम रखें होंगे, कहीं लंका विजय के बाद अपनी प्रजा के साथ उत्सव मनाया होगा. कभी लोक कल्याणी प्रभु श्री राम के कदमों से धन्य हुयी अयोध्या मोक्ष दायनी सरयू नदी के आचमन से जिवंत रहती है. अथर्व वेद में इसे देवों द्वारा निर्मित स्वर्ग नगरी कहा गया है.

गंगा बड़ी गोदावरी,

तीरथ बड़ो प्रयाग,

सबसे बड़ी अयोध्यानगरी,

जहँ राम लियो अवतार।

अयोध्या शब्द का अर्थ :-

अयोध्या(Aayodhya) शब्द का स्पष्ट अर्थ है “जो हराया नहीं जा सकता” इस तीर्थस्थान में कई मंदिर हैं। और अधिकतर मंदिर भगवान राम और उनके परिवार और मित्रो को समर्पित हैं।

अयोध्या भगवान राम जन्मभूमि:-

प्राचीन समय के दौरान अयोध्या को  कोशल  देश  के नाम से जाना जाता था अथर्ववेद ने इसे “देवता द्वारा बनाया गया शहर और स्वर्ग के रूप में समृद्ध होने” के रूप में वर्णन किया सूर्यवंश इस शानदार और मशहूर कोशल देश का शासक वंश था।
अयोध्या श्री राम जन्मभूमि(shri ram janam bhoomi) है, जहां भगवान राम जी का जन्म हुआ था।  यहां एक छोटा सा भगवान राम मंदिर है।  वहां बाबरी मस्जिद का इस्तेमाल हुआ था, जो 15 वीं सदी में मुग़ल द्वारा निर्मित किया गया था। बाद में 1992 में मस्जिद थोड़ी नष्ट हो गई थी, और वर्तमान समय में एक भव्य राम मंदिर का निर्माण करने की योजना है।

सर्वधर्म नगरी:-

अयोध्या हिन्दू धर्म के आस्था का केंद्र है . अयोध्या को प्रभु श्री राम की जन्मस्थली के रूप में प्रसिद्धि मिली. पर यह धरती कई धर्मों के लिए महत्पूर्ण रही है. इस धरती पर सिख, बौध, जैन, सूफ़ी धर्म गुरुओं ने अपनी अपनी तरीके से अध्यात्म का यश फैलाने पर काम किया है. जिसकी खुशबू यहाँ के सौहार्दपूर्ण  वातावरण में महसूस होती है.  अयोध्या में भगवा ध्वजमालाएंप्रसाद बनाने वाले आधे से अधिक कारीगर मुसलमान हैं।
यहाँ कुछ प्रमुख स्थान है जहां प्रसिद्ध मंदिर और ऐतिहासिक जगह है 

कनक भवन:-

कनक भवन अयोध्या का एक महत्वपूर्ण मंदिर है। यह मंदिर सीता और राम के सोने के मुकुट पहने प्रतिमाओं के लिए लोकप्रिय है. मुख्य मंदिर आतंरिक क्षेत्र में फैला हुआ है, जिसमें रामजी का भव्य मंदिर स्थित है। यहां भगवान राम और उनके तीन भाइयों के साथ देवी सीता की सुंदर मूर्तियां स्थापित हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार राम विवाह के पश्‍चात् माता कैकई के द्वारा सीता जी को कनक भवन मुंह दिखाई में दिया गया था। जिसे भगवान राम तथा सीता जी ने अपना निज भवन बना लिया

गुप्तर घाट:-

अयोध्या मुख्य रूप से मंदिरों का एक पवित्र तीर्थस्थान है। पूजा के सभी स्थान यहां हैं, जिनमें हिंदू धर्म भी शामिल है। उत्तर प्रदेश के एक महत्वपूर्ण धार्मिक केंद्र होने के दौरान अयोध्या सबसे पवित्र रहा है। जब भगवान पृथ्वी पर उपस्थित थे, अयोध्या उनकी गतिविधियों का केंद्र था।
गुप्तर घाट में अच्छे मंदिरों का एक गुच्छा है और इसके पास एक अच्छा पार्क है। गुप्तर को गायब होने के रूप में परिभाषित किया गया है यह वह स्थान है जहां राम ने अपना शरीर छोड़ दिया। यहां कुछ अच्छे मंदिर मौजूद हैं, जिसे चक्र हरजी विष्णु, गुप्त हरजी और अन्य राजा मंदिर कहते हैं। चक्र हरजी विष्णु मंदिर में बहुत से देवता हैं, जिसमें बहुत पुराने नक्काशीदार चक्र हरजी विष्णु देवता प्रतीत होता है। यहां श्री राम के पैर की एक छाप भी है। 1 9वीं शताब्दी में राजा दशरथ सिंह ने मंदिर और छोटे महल का निर्माण किया। Read More…

रामकोट :-

जन्मभूमि अयोध्या में पूजा के प्रमुख और महत्वपूर्ण स्थान रामकोट के प्राचीन गढ़ की जगह है, जो शहर के पश्चिमी भाग में एक ऊचे भूमि पर खड़ा है। यह पवित्र स्थान पूरे भारत और विदेश से भक्तों को आकर्षित कर रहा है, भगवान के जन्म के दिन ‘रामानवमी’ पर, इस जगह को उमंग फूलों से सजाया जाता है और बहुत ही धूमधाम के साथ मनाया जाता है जो की  चैत्र (मार्च-अप्रैल) के हिंदू माह में। Read More…

हनुमान गढ़ी:-

यहाँ  श्री  हनुमान जी वास करते हैं।  अयोध्‍या आकर भगवान राम के दर्शन के लिए भक्तों को हनुमान जी Hanuman Aarti के दर्शन कर उनसे आज्ञा लेनी होती है. 76 सीढ़ियों का सफर तय कर भक्त पवनपुत्र के सबसे छोटे रूप के दर्शन करते हैं.अयोध्या नगरी में आज भी भगवान श्रीराम का राज्य चलता है. मान्यता है कि भगवान राम जब लंका जीतकर अयोध्या लौटे, तो उन्होंने अपने प्रिय भक्त हनुमान को रहने के लिए यही स्थान दिया. साथ ही यह अधिकार भी दिया कि जो भी भक्त यहां दर्शन के लिए अयोध्या आएगा, उसे पहले हनुमान का दर्शन-पूजन करना होगा…Read More….

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त्रेता के ठाकुर:-

त्रेता के ठाकुर का यह विशेष स्थान है, जहां पर श्री राम ने अश्वमेधा यज्ञ का प्रदर्शन किया है। अश्वमेधा यज्ञ इस रीति से किया गया था, हर तरफ घूमने के लिए घोड़ों को छोड़ दिया गया था। उन स्थानों पर जहां घोड़े जायेंगे, वे यज्ञ कलाकार के शासनकाल में आएंगे।
लगभग 300 साल पहले कुल्लू के राजा ने यहां एक नया मंदिर बनाया था, जो इंदौर के अहिल्याबाई होलकर ने 1784 की अवधि में सुधार किया था। इसी समय, अन्य सटे घाट भी बनाए गए थे। काले बलुआ पत्थर की प्रारंभिक मूर्तियां सरयू से बरामद की गईं और नए मंदिर में रखीं, जो अब कलरम का मंदिर के रूप में प्रसिद्ध हैं। Read More..

नागेश्वरनाथ मंदिर  :-

शिव पुराण के अनुसार, एक बार नौका बिहार करते समय उनके हाथ का कंगन पवित्र सरयू में गिर गया, जो सरयू में वास करने वाले कुमुद नाग की पुत्री को मिल गया। यह कंगन वापस लेने के लिए राजा कुश तथा नाग कुमुद के मध्य घोर संग्राम हुआ। जब नाग को यह लगा कि वह यहां पराजित हो जायेगा तो उसने भगवान शिव का ध्यान किया। भगवान ने स्वयं प्रकट होकर इस युद्ध को रुकवाया। Read More

कालेराम मन्दिर :-

काले राम मंदिर राम की पैड़ी के पास स्थित नागेश्वर नाथ मंदिर के ठीक पीछे है, यह मन्दिर भी प्राचीन मन्दिरों में गिना जाता है. मन्दिर के महंत के अनुसार के राजा दर्शन सिंह के समय लगभग  1748 में भारत के महाराष्ट्रिय ब्राह्ममण योगी पं0 श्री नरसिंह राव मोघे को  एक स्वप्न में हुए आदेश के अनुसार Read More

छोटी देव काली जी का स्थान :-

मान्यता है कि छोटी  देवकाली की प्रतिष्ठा माता जानकी की ग्राम देवी या कुल देवी के रूप में हुयी. जगत जननी माँ सीता जी विवाहोपरांत अपने पितृ गृह जनकपुरी से जब  अयोध्या के लिए चलीं, तो अपनी कुल देवी जो कि  गौरी मंगला के रूप में थीं, अपने साथ ले आयीं. इसके पश्चात Read More

क्षीरेश्वर मन्दिर:-

क्षीरेश्वर मन्दिर अयोध्या के प्राचीन मन्दिरों में से एक है. इस मन्दिर में स्वयंभू शिवलिंग का प्राकट्य इस मन्दिर को विशेष बनाता है. मन्दिर के पुजारी के अनुसार मन्दिर के गर्भ गृह में स्वम्भू शिवलिंग, 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक उज्जैन के महाकालेश्वर में शिवलिंग के समान है.  क्षीरेश्वर मन्दिर अयोध्या फैजाबाद मार्ग पर श्री राम हॉस्पिटल के ठीक सामने स्थित है. मुख्य मार्ग पर स्थित होने के कारण मन्दिर के दर्शन सुगम हो जाते हैं. क्षीरेश्वर मन्दिर महादेव का मन्दिर है. ऐसी मान्यता है कि जो भी भक्त इस मन्दिर में स्थापित शिवलिंग की पूरे विधि विधान से पूजा करता है उसकी हर मनोकामना पूर्ण होती है.

विजय राघव मन्दिर:-

अयोध्या को मन्दिरों की नगरी भी कहा जाता है, यहाँ करीबन 7000 से अधिक मन्दिर हैं. पर विजय राघव मन्दिर अपने आप में निराला मन्दिर है.  यह रामानुज सम्प्रदाय का प्राचीन एवं प्रमुख मन्दिर   है. जो कि विभीषण कुण्ड के सामने स्थित है. मन्दिर की स्थापना 1904 के लगभग स्वामी बलरामाचारी द्वारा की गयी थी. इस मन्दिर में स्थापित प्रभु राम के विगृह को दक्षिण भारत से ही लाया गया था. यह मन्दिर रामानुज सम्प्रदाय के अत्यंत महत्व वाला मन्दिर है. वैष्णवों के लिए यह स्थान किसी तीर्थ से कम नहीं है. इस मन्दिर में अनुशासन के साथ गुरुकुल एवं वैदिक परम्पराओं का अनुसरण किया जाता है

लवकुश मन्दिर:-

यह मन्दिर अयोध्या के ह्रदय कहे जाने वाले रामकोट में राम जन्म भूमि के निकट स्थित है. यह स्थाम यूँ तो श्री राम के पुत्र लव कुश जी का  है, पर यहाँ सावन झूला महोत्सव और तुलसी शालिगराम विवाह अत्यंत प्रचलित है. राम जन्म भूमि के दर्शन के लिए आने वाले श्रद्धालु भगवान श्री राम के पुत्रगण लव कुश के दर्शन अवश्य करते हैं.

रंगमहल:-

अयोध्या के रामकोट मोहल्ले में राम जन्म भूमि के निकट भव्य रंग महल मन्दिर स्थित है. ऐसा माना जाता है कि जब सीता माँ विवाहोपरांत अयोध्या की धरती पर आयीं. तब कौशल्या माँ को सीता माँ का  स्वरुप इतना अच्छा लगा कि उन्होंने रंग महल सीता जी को मुँह दिखाई में दिया. विवाह के बाद भगवान श्री राम कुछ 4 महीने इसी स्थान पर रहे. और यहाँ सब लोगों ने मिलकर होली  खेली थी. तभी से इस स्थान का नाम रंगमहल हुआ. इस मन्दिर में आज भी होली का त्यौहार हर्षोल्लास से मनाया जाता है. फाल्गुन माह में यहाँ होली खेलने का विशेष इंतजाम होता है.

रत्न सिंहासन/ राजगद्दी:-

रत्न सिंहासन या राजगद्दी वह स्थान है जहाँ श्री राम भगवान ने 11000 वर्ष बैठ के राज किया. उन्होंने यहाँ बैठ के ही अपनी प्रजा का न्याय किया. जब मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम लंका के राजा रावण का वध करके पहली बार अयोध्या वापस आये, तब उनका राज्याभिषेक इसी सिंहासन पर किया गया. हर्षित होकर देवताओं ने फूल बरसाए, इंद्र कुबेर ने सोने चांदी एवं मणियों से सवा प्रहर तक राज्याभिषेक किया. पूरे अयोध्या को दीपों से सजाया गया. इस मन्दिर के गर्भ गृह में  प्रभु श्री राम जी हैं, दाहिने तरफ लक्ष्मण जी और बाएं तरफ जगत माता सीता जी विराजमान हैं . उनके पीछे अत्यंत प्राचीन विग्रह हैं

मणि पर्वत:-

मणि पर्वत मन्दिर  लगभग 200 फीट ऊँचे टीले पर स्थित है. इसकी छत से पुरे अयोध्या के दर्शन होते हैं. भगवान श्री राम के विवाह के पश्चात से यहाँ झूले की परंपरा चली आ रही है. मान्यता है कि झुला महोत्सव के रूप में मनाये जाने वाले इस अवसर पर अयोध्या में विराजमान समस्त भगवान यहाँ झूला झूलने आते हैं. सावन के महीने में माता सीता ने जी ने इस स्थान पर पंचमी मनाई थी, झूला झूली थी. तभी से यहाँ झूला उत्सव मनाया जाता है.

ऐतिहासिक गुरुद्वारा ब्रम्हकुण्ड:-

यह तीर्थ सिखों के लिए अत्यंत पवित्र है. सिखों के प्रथम नवं एवं दसम गुरुओं ने इस धरती पर अपने श्री चरण रखे. गुरुओं के आने और यहाँ प्रवचन देने से इस स्थान की महत्ता और बढ़ गयी.  उसके पूर्व से यह स्थान ब्रम्ह कुण्ड के नाम से जाना जाता था. बताया जाता है जब श्री राम अयोध्या पूरी को आये थे, उस समय सारे देवता यहाँ आये थे राजतिलक देने के लिए. राजतिलक में ब्रम्हा जी भी आये थे. राज्याभिषेक होने के बाद ब्रम्हा जी ने राम चन्द्र जी से कहा कि  मेरा भी उद्धार करो, तब श्री राम चन्द्र जी ने कहा कि तुम तप करो. पहले इस जगह का प्राचीन नाम तीर्थराज था

कोरिया की रानी ‘हो’ का स्मृति स्थल:-

यह कम अचरज की बात नहीं है कि हमारे देश विभिन्न धर्मों के गुरुओं ने अयोध्या की पावन धरती को भक्ति भाव से अभिसिंचित किया है. तब और आश्चर्य होता है जब यह पता चलता है कि यहाँ से हजारों किलोमीटर दूर  दक्षिण कोरिया के लिए भी यह स्थान उतना ही महत्वपूर्ण है जितना हम भारतियों के लिए . कोरिया की पुरातन इतिहास गाथा के अनुसार प्राचीन कोरियाई कारक राज्य के संस्थापक राजा सूरो की धर्मपत्नी रानी हो का जन्म अयोध्या नगर में हुआ था.

अयोध्या आये  तो इन सभी स्थानो पे जरूर जाये।

जय श्री राम 

जगन्नाथ मन्दिर(jagannathpuri-temple)

हे जगन्नाथ प्रभु एक झलक आपकी वो बिसरत नहीं
चाह फिर से देखु तुम्हे मन से ये चाह जाती नहीं।

पुरी का श्री जगन्नाथ मंदिर(jagannathpuri temple) जो भगवान जगन्नाथ (श्रीकृष्ण) को समर्पित है। जगन्नाथ शब्द का अर्थ जगत के स्वामी होता है। इस मंदिर को हिन्दुओं के चार धाम में से एक गिना जाता है। यह वैष्णव सम्प्रदाय का मंदिर है, जो भगवान विष्णु के अवतार श्री कृष्ण को समर्पित है। कहते हैं जगन्नाथपुरी एक इकलौता ऐसा मंदिर है जिसमें श्री कृष्ण भगवान अपने भाई बलराम और बहन सुभद्रा के साथ विराजित हैं यह अपने आप में ही एक अद्भुत दृश्य है ।

क्यों आज भी अधूरी है पुरी के जगन्‍नाथ की मूर्ति?

जगन्नाथ पुरी मंदिर से जुड़े  रोचक तथ्य:-

(1) नीम की लकड़ी से बना इनका व‌िग्रह

पुरी की सबसे खास बात तो स्वयं भगवान जगन्नाथ हैं ज‌िनका अनोखा रूप कहीं अन्य स्‍थान पर देखने को नहीं म‌िलता है। नीम की लकड़ी से बना इनका व‌िग्रह अपने आप में अद्भुत है ज‌िसके बारे में कहा जाता है क‌ि यह एक खोल मात्र है। इसके अंदर स्वयं भगवान श्री कृष्‍ण मौजूद होते हैं।

(2) हवा के विपरीत दिशा में:-

जगन्‍नाथ मंदिर के शिखर पर लहराता झंडा हमेशा हवा के विपरीत दिशा में रहता है।

(3) सुदर्शन चक्र :-

जगन्नाथ पुरी मंदिर की सबसे खास बात मंदिर के सबसे ऊपर लगा सुदर्शन चक्र को आप जिस भी तरफ से देखेंगे वह आपको अपनी तरफ ही दिखाई देगा यह अपने आप में ही अद्भुत है

(5) महाप्रसाद:-

यह है जगन्‍नाथ जी का महाप्रसाद। मंदिर में प्रसाद बनाने के लिए सात बर्तन एक दूसरे पर रखा जाते हैं। और प्रसाद लकड़ी जलाकर पकाया जाता है। इस प्रक्रिया में लेकिन सबसे ऊपर के बर्तन का प्रसाद पहले पकता है।

(6) हवाओं में चमत्कार

समुद्र तट पर दिन में हवा जमीन की तरफ आती है, और शाम के समय इसके विपरीत, लेकिन पुरी में हवा दिन में समुद्र की ओर और रात को मंदिर की ओर बहती है।

(8) मुख्य गुंबद की छाया किसी भी समय जमीन पर नहीं पड़ती।
(9) मंदिर में कुछ हजार लोगों से लेकर 20 लाख लोग भोजन करते हैं। फिर भी अन्न की कमी नहीं पड़ती है। हर समय पूरे वर्ष के लिए भंडार भरपूर रहता है।
(10) एक पुजारी मंदिर के 45 मंजिला शिखर पर स्थित झंडे को रोज बदलता है। ऐसी मान्यता है कि अगर एक दिन भी झंडा नहीं बदला गया तो मंदिर 18 वर्षों के लिए बंद हो जाएगा।
(11) मन्दिर का रसोई घर दुनिया का सबसे बड़ा रसोइ घर है।  विशाल रसोई घर में भगवान जगन्नाथ को चढ़ाने वाले महाप्रसाद को बनाने 500 रसोईये एवं 300 उनके सहयोगी काम करते है।
(12) सिंहद्वार में प्रवेश करने पर आप सागर की लहरों की आवाज को नहीं सुन सकते। लेकिन कदम भर बाहर आते ही लहरों का संगीत कानों में पड़ने लगता है।